"जिस दिन दुनिया से युद्ध समाप्त होंगे, उस दिन राजनीति का भाव भी समाप्त हो जाएगा।"🌹
जिस दिन दुनिया से युद्ध समाप्त होंगे, उस दिन राजनीति का भाव भी समाप्त हो जाएगा।
इसलिए यह बहुत स्वाभाविक है कि राजनीतिज्ञ युद्ध को जारी रखे, युद्ध को बनाए रखे, उसे जिंदा रखे।
इस संबंध में विचार करना इसलिए बहुत-बहुत आवश्यक हो गया है, क्योंकि पिछले दिनों में राजनीतिज्ञ युद्ध से जो नुकसान पहुंचा सकते थे, इतने बड़े नहीं थे, लेकिन अब तो वे पूरी मनुष्य-जाति को नष्ट कर सकते हैं।
एक बहुत बड़े महल के बाहर बड़ी भीड़ थी। भीतर कुछ हो रहा था, उसे जानने की सैकड़ों बड़ी भीड़ इकट्ठे थे।
लेकिन वे साधारण जन नहीं थे। जो बाहर इकट्ठे थे, वे स्वर्ग के देवी और देवता थे और जो महल था वह खुद भगवान का महल था।
भीतर वहां कोई बात चली थी, जिसको सुनने के लिए सारे लोग उत्सुक थे। उस बात पर बहुत कुछ निर्भर था।
मैंने कहाः कहानी बिलकुल झूठी है, फिर भी बहुत अर्थपूर्ण है। भीतर ईश्वर का दरबार लगा हुआ था। और तीन आदमी दरबार में खड़े थे।
ईश्वर ने उन तीन आदमियों से पूछाः मैं बहुत हैरान हो गया हूं, मनुष्य को बना कर मैं बहुत परेशान हो गया हूं। मैंने सोचा था, मनुष्य को बना कर दुनिया में एक आनंद, एक शांति, एक संगीत पूर्ण विश्व का जन्म होगा। जमीन एक स्वर्ग बनेगी। लेकिन मनुष्य को बना कर भूल हो गई।
जमीन एक स्वर्ग बनेगी। लेकिन मनुष्य को बना कर भूल हो गई। जमीन रोज नरक के करीब होती जा रही है और ऐसा वक्त आ सकता है, नर्क में जो लोग पाप करें, उन्हें हमें जमीन पर भेजना पड़े।
इसलिए ईश्वर ने कहाः मैं बहुत परेशान हूं और तुम्हें इसलिए बुलाया है कि मैं तुमसे पूछ सकूं कि क्या कोई उपाय मैं कर सकता हूं जिससे कि दुनिया ठीक हो जाए?
वे तीन लोग तीन बड़े देशों के प्रतिनिधि थे--अमरीका, रूस और ब्रिटेन के। अमरीका के प्रतिनिधि ने कहा, दुनिया अभी ठीक हो जाए। एक छोटी सी आकांक्षा हमारी पूरी कर दें। ईश्वर ने उत्सुकता से कहाः कौन सी आकांक्षा?
अमरीका के प्रतिनिधि ने कहाः हे परमात्मा, जमीन तो रहे, लेकिन जमीन पर रूस का कोई निशान न रह जाए।
इतनी सी आकांक्षा पूरी हो जाए, फिर और कोई तकलीफ नहीं, फिर और कोई कष्ट नहीं, फिर सब ठीक हो जाएगा और जैसा चाहा है दुनिया वैसी हो सकेगी।
ईश्वर ने बहुत वरदान दिए थे।
ऐसे वरदान देने का उसे कोई मौका नहीं आया था। उसने रूस की तरफ देखा, रूस के प्रतिनिधि ने कहा कि महानुभाव, एक तो हम मानते नहीं कि आप हैं।
उन्नीस सौ सत्रह के बाद हमने अपने मंदिरों और मस्जिदों और चर्चों से निकाल कर आपको बाहर कर दिया है। लेकिन हम पुनः आपकी पूजा शुरू कर देंगे और फिर आपके मंदिरों में दीये जलाएंगे और फूल चढ़ाएंगे।
एक छोटी सी आकांक्षा अगर पूरी हो जाए तो वही प्रमाण होगा ईश्वर के होने का। ईश्वर ने कहाः कौन सी आकांक्षा? उसने कहा, हम चाहते हैं कि जमीन का नक्शा तो रहे, लेकिन अमरीका के लिए कोई रंग न रह जाए।
ईश्वर ने हैरानी में और घबड़ा कर ब्रिटेन की तरफ देखा। ब्रिटेन के प्रतिनिधि ने कहा हे परम पिता, हमारी अपनी कोई आकांक्षा नहीं। इन दोनों की आकांक्षाएं एक साथ पूरी हो जाए तो हमारी आकांक्षा पूरी हो जाए।
यह तो बिलकुल ही झूठी कहानी मैंने आपसे कहीं। लेकिन दुनिया की स्थिति करीब-करीब ऐसी हो गई है।
सारी दुनिया के राजनीतिज्ञ एक दूसरे के विनाश के लिए उत्सुक हैं। सारे दुनिया में लोग एक दूसरे की हत्या के लिए तत्पर हैं।
सारी दुनिया की शक्ति--इतनी बड़ी शक्ति जिससे हम जमीन को न मालूम क्या बना सकते थे! जिससे जमीन की सारी दरिद्रता मिट सकती थी, सारी अशिक्षा मिट सकती थी, सारे दु:ख और बीमारियां मिट सकते थे, जिससे मनुष्य एक अदभुत रूप से स्वस्थ, शांत और सुखी संसार का निर्माण कर सकता था। वह सारी शक्ति इस बात में लगी है कि हम एक दूसरे को कैसे नष्ट कर दें।
वह सारी शक्ति इस बात में लगी है कि एक मनुष्य दूसरे मनुष्य की हत्या करने में कैसे समर्थ हो जाए।
यह कहानी तो झूठी है, लेकिन यह कहानी करीब-करीब हमारी दुनिया के संबंध में सच हो रही है।
हम सारे लोग विनाश के लिए तत्पर हैं। क्यों? इसका जिम्मा, इसका उत्तरदायित्व किस पर है?
और यह सारे राजनीतिज्ञों शांति की बातें भी करते हैं।
यह भी आपको पता होगा, दुनिया के सारे युद्ध शांति के नाम पर हुए हैं। इसलिए शांति संबंध में भी विचार करना बहुत जरूरी है।
शांति के लिए भी युद्ध हो सकता है। और जब भी कोई लड़ता है तो शांति के लिए ही लड़ता है।
अच्छे नाम, बुरे कामों को करने का कारण बन जाते हैं। अच्छे नामों की ओट में दुनिया में बुरे से बुरे पाप, बुरे से बुरे काम हुए हैं। धर्मों की ओट में हत्याएं हुए हैं।
शांति के नाम पर युद्ध हुए हैं। इसलिए राजनीतिज्ञ जब शांति की बातें करता हो तो बहुत विचार करना जरूरी है।
हो सकता है, शांति की आवाजें उठा कर वह केवल युद्ध की तैयारियां करवाना चाहता हो। अंत में वह कहेगा अब तैयार हो जाओ, शांति के लिए लड़ना जरूरी है। शांति की रक्षा के लिए युद्ध आवश्यक हो गया है।
यह जो सारे राजनीति की भाषा में सोचने वाले लोग हैं, यदि मनुष्य इस भाषा से, इस वृत्ति से सचेत नहीं होता है तो युद्ध से नहीं बचा जा सकेगा।
मेरी दृष्टि में कोई राजनीतिक उपाय स्थायी रूप से शांत विश्व को जन्म देने में असमर्थ है।
इसलिए असमर्थ है कि राजनीति मूलतः आकांक्षा है, एम्बीशन है।
जहां राजनीति है, वहां दूसरे से आगे निकलने की होड़ है। प्रतिद्वंद्विता है और जहां आगे निकलने की दौड़ है, वहां आज नहीं कल, युद्ध अवश्यंभावी है।
जब एक राष्ट्र दूसरे राष्ट्र से आगे निकलना चाहे, एक राष्ट्र से ऊपर निकलना चाहे तो अंत में युद्ध आ जाना स्वाभाविक है।
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