जिन्हें कुछ नहीं है जिनके पास, वे ज्यादा दुखी नहीं होते। क्योंकि ज्यादा दुखी होने के लिए ज्यादा सुखी होना पहले जरूरी है। जिसने सुख जाना है, उसे दुख का पता चलता है।

मनुष्य की तीन संभावनाएं हैं--साधारण मनुष्य की। फिर एक चौथी संभावना भी है। उस चौथी में उठना ही धर्म हैं। तीन में डूबे रहना संसार है। उस चौथी अवस्था को हमने काई नाम नहीं दिया, क्योंकि उसे क्या नाम दे? हमारे पास जितने नाम हैं, वे सब तीन अवस्थाओं के ही हैं, क्योंकि तीन का ही हमें अनुभव है। तो चौथी को हमने सिर्फ चौथी कहा है--तुरीय। तुरीय का अर्थ होता है, चौथी, दि फोर्थ। उसको नाम नहीं दिया, सिर्फ चौथा कहा है, बस।
यह तीन अवस्थाएं हैं मन की। एक तो है दुख की अवस्था, जिससे हम भली भांति परिचित हैं। उस दुख की सघनता का नाम ही नर्क है। वह जमीन के नीचे नहीं है, वह तुम्हारे ही मन की तलहटी में है, वह तुम्हारे ही मन के अचेतन में दबी पड़ी है। उसी मन के अचेतन से तुम्हारे दुख-स्वप्न, नाइटमेयर पैदा होते हैं। दूसरी अवस्था है, सुख। उसका भी तुम्हें थोड़ा-थोड़ा अनुभव है, इधर-उधर झलकें। न सही हो अनुभव, तो कम से कम आशा की झलकें, सपने में थोड़ी-थोड़ी प्रतीतियां--अब मिला, तब मिला! न भी हो अनुभव, तो इतना तो तुम सोच ही सकते हो कि दुख से जो विपरीत है, वह सुख। अगर दुख में कांटा चुनता है, तो सुख में फूलों की वर्षा होगी। न भी हुई हो वर्षा, तो भी अनुमान कर सकते हो। और दोनों के मध्य की जो अवस्था है, उससे तो सभी परिचित हैं--सुख-दुख का मिश्रण। उसका नाम है, मर्त्य लोक। जहां सुख और दुख एक ही सिक्के के दो पहलू हैं--एक हाथ सुख, एक हाथ दुख। और जितना दुख पैदा करो, उतना ही सुख और जितना सुख पैदा करो, उतना ही दुख।
इस बात को समझना थोड़ा। इसके पीछे एक गहन विश्लेषण है।
क्या तुमने देखा नहीं कि जो लोग जितने ज्यादा सुख का अर्जन करते हैं उतने ज्यादा दुखी होते चले जाते हैं? एक अनुपात है। इसलिए आज अमरीका में यदि सर्वाधिक दुख है, तो उससे तुम यह मत सोच लेना कि तुम बड़ी अच्छी स्थिति में हो। उसका कुल मतलब इतना ही है कि आज अमरीका में सर्वाधिक सुख के साधन हैं, इसलिए दुख है। दुख और सुख अनुपात में बढ़ते हैं, साथ-साथ बढ़ते हैं, एक ही साथ बढ़ते हैं। अगर दुख का अनुपात दस है, तो सुख का अनुपात दस है। अगर दुख की अनुपात सौ तो सुख का अनुपात सौ है। जैसे ही कोई समाज समृद्ध होता है, वैसे ही बड़ी आंतरिक दीनता-दरिद्रता और दुख से भर जाता है। आज अमरीका में जितने लोग पागल होते हैं, कहीं और हनीं। जितने लोग आत्मघात करते हैं, कहीं और नहीं; और जितने लोग मानसिक शांति की तलाश करते हैं, उतने कहीं और नहीं इससे कभी-कभी भारतीय मन बड़ा चौंकता है: दुखी तो हमें होना चाहिए, जिनके पास कुछ भी नहीं है। न खाने को है, कपड़े हैं, न छप्पर है, न दवा है, न बच्चों को स्कूल भेजने का उपाय है--जिनके पास कुछ भी नहीं है, दुखी तो हमें होना चाहिए।
मगर तुम्हें जीवन का गणित पता नहीं।
जिन्हें कुछ नहीं है जिनके पास, वे ज्यादा दुखी नहीं होते। क्योंकि ज्यादा दुखी होने के लिए ज्यादा सुखी होना पहले जरूरी है। जिसने सुख जाना है, उसे दुख का पता चलता है। ऐसा समझो कि तुम महलों में रहे और फिर एक दिन तुम्हें झोपड़े में रहना पड़े तब तुम्हें झोपड़े का दुख पता चलेगा। जो झोपड़े में ही रहा है सदा, उसे झोपड़े का कोई दुख पता नहीं चलेगा। जो सड़क पर ही सोता है, उसे सड़क पर सोने में कोई दुख पता नहीं चलता। लेकिन महलों से छीनकर लाए गए लोगों को सड़क पर सोने को कहो, तब उन्हें दुख पता चलेगा। दुख की प्रतीति के लिए सुख की पृष्ठभूमि चाहिए। और इसके विपरीत भी सच है। बिना दुख की प्रतीति के सुख की प्रतीति भी नहीं होती।
इसलिए जिन लोगों को सुख अनुभव करना है, वे कई तरह के दुख पैदा करते हैं अपने लिए, तब कहीं थोड़ा-बहुत सुख अनुभव कर पाते हैं। अब एक आदमी को कुछ नहीं है, वह पहाड़ चढ़ने लगा! अब पहाड़ पर चढ़ना दुखपूर्ण धंधा है, जीवन का खतरा है, लेकिन पहाड़ पर चढ़ेगा! उस पहाड़ की चढ़ाई में जहां जीवन प्रतिपल खतरे में है, एक पैर फिसला तो जीवन सदा के लिए खाई-खड्डों में खो जाएगा, हड्डी-मांस-मज्जा के टुकड़ों-टुकड़ों का भी पता नहीं चलेगा, बोटी-बोटी हो जाएगा, मगर उसी दुख के कारण, उसी दुख की संभावना के कारण, शिखर पर चढ़ना एक सुख की पुल बन जाती है।
चांद पर जाने का सुख क्या है? चांद पर चलने का सुख क्या है? क्योंकि पहुंचना अति खतरनाक है। जितनी बड़ी चुनौती होती है, जितना बड़ा खतरा होता है, उतनी ही सुख की आशा बंधती है। जो लोग बड़े सुख चाहते हैं, उन्हें बड़े दुख पैदा करने पड़ते हैं। सैनिकों का यह आज अनुभव है युद्धों के मैदानों में कि जहां जीवन बिलकुल खतरे में होता है, वहां सुख की बड़ी तरंगें उठती है। जहां प्रतिपल खतरा है कि अब मरे कि तब मरे, वहां जीवन में निखार आ जाता है, सब धूल-धवांस झड़ जाती है, जीवन बड़ा सतेज हो जाता है।
सुख और मिश्रित हैं; एक ही सिक्के के दो पहलू हैं। उनमें से तुम एक को काट नहीं सकते। इसलिए नर्क और स्वर्ग तो केवल परिकल्पनाएं हैं। हमने दुख जाना है; दुख की ही जो पराकाष्ठा की कल्पना है, उसका नाम नर्क है। हमने सुख जाना है; सुख की ही जो पराकाष्ठा का नाम है, उसका नाम स्वर्ग है। सुख का अर्थ है: हमने दुख को बिलकुल काट दिया अपनी कल्पना में और सुख ही सुख बचा लिया। और दुख का अर्थ है: हमने सुख बिलकुल काट दिया और दुख ही दुख बचा लिया। इसलिए नर्क दुश्मनों के लिए, सुख अपने लिए, मित्रों के लिए, प्रियजनों के लिए। अगर तुम ईसाई हो, तो ईसाई सिर्फ स्वर्ग जाएंगे, बाकी बस नर्क। अगर तुम मुसलमान हो, तो बहिश्त मुसलमानों के लिए। किसी और के लिए हनीं। अगर तुम जैन हो या बौद्ध हो, तो बस तुम्हारे लिए स्वर्ग या नर्क, तुम्हारे लिए स्वर्ग, बाकी के लिए नर्क। अपने लिए स्वर्ग और शेष जो अपने साथ नहीं हैं, उनके लिए नर्क। यह मनुष्य की साधारणर् ईष्या, जलन, वैमनस्य की वृत्ति है। और इन तीन को हमने तीन लोक बना दिया है।

Comments