प्रार्थना को व्यापार मत बनाओ। इसे शुद्ध आहुति ही रहने दो; बस अपने हृदय से ही अर्पण करो बदले में कोई चीज मत मांगो। तब बहुत कुछ आता है…हजार गुणा, लाख गुणा…परमात्मा तुम्हारी और बहता है।

मोजेज एक जंगल से गुजर रहे थे और उन्हें एक आदमी मिला, एक गड़रियां, एक गरीब आदमी, एक गंदा निर्धन आदमी जिसके कपड़े चीथड़े हो गए थे। और वह प्रार्थना कर रहा था, यह प्रार्थना का समय था और वह प्रार्थना कर रहा था। मोजेज़ उसके पीछे उत्सुकतावश खड़ा हो गया। और उसकी प्रार्थना को सुनने लगा। उसे तो विश्वास ही नहीं हो रहा था कि इस तरह की भी प्रार्थना कोई कर सकता है। वह गरीब गड़रिया कह रहा था: ‘परमात्मा, जब मैं मरूं, मुझे अपने स्वर्ग में आने देना—मैं तेरी देखभाल जतन से करूंगा, यदि तेरे शरीर में जूएं पड़ गई होंगी तो उन्हें मैं बहुत ही जतन से निकालुंगा, देखो यह तो मेरा अनुभव है, मैं तुम्हे मल-मल कर नहला दूंगा। जिस तरह से मैं अपनी भेड़ों को नहलाता हूं, उनकी जूंए निकलता हूं। वह कितनी प्रसन्न हो जाती है, नहाने पर, मैं तेरे लिए गर्म दुध करूंगा…मेरी भेड़ों का दुध बहुत ही मीठा और सुस्वादिष्ठ है। और मुझे मालिस भी बहुत ही अच्छी आती है, जब तुम थक जाओगे तो आपके शरीर की मालिस करूंगा, आपके पैरो को गर्म, पानी से धोकर उन्हें तेल की मालिस करूंगा ताकि आपकी इतनी भागदौड़ के कारण थकावट कम हो जाए। जब आप थक कर अपने बिस्तरे पर लेट जाऐंगे तो आपके पैर भी दबा दूंगा।’

अब तो हद हो गई मोजे़ज़ से रहा न गया, तु परमात्मा की जूंए निकलेगा….क्या बकवास करे जा रहा है, और मोजे़ज़ ने उस आदमी को जोर से हिलाया और कहा, ‘तु ये क्या बकवास किए जा रहा है, भला ये भी कोई प्रार्थना है? किस तरह की ये बकवास है, परमात्मा और गंदा, उसे जूंए…कुछ अजीब सी बात है तेरा दिमाग तो ठीक है?’

उस गरीब व्यक्ति को बाघा पड़ी। उसने कहा, ‘जब उसने आंखें खोल कर देखा एक, महापुरूष उसके सामने खड़ा है, उसे कुछ झेप भी आई, और उनके चरणों मैं गिर कर माफी मांगते हुए उसने कहां की मैंने कभी उसे देखा तो नहीं है, इसलिए मुझसे कुछ गलत हो गया तो मुझे माफ कर दो।’

मोजे़ज़ ने कहा, ‘रूक जा! फिर से इस तरह की प्रार्थना कभी मत करना। यह तो प्रार्थना न होकर पाप हो रहा था। तू तो अपने लिए खुद एक नर्क निर्मित कर रहा था। अच्छा हुआ की मैं यहां से गुजर रहा था। अब इस तरह की प्रार्थना भुल कर भी मत करना।’

वह गरीब आदमी तो डरके मारे थर-थर कांपने लगा। उसे तो पसीना आ गया। तब उसने कहा: ‘पर मैं तो अपनी सारी जिंदगी इसी तरह की प्रार्थना करता रहा हूं, अब क्या होगा मेरा? मुझसे अंजाने में बहुत भूल हो गई, मेरे मन में जो आता था वहीं मैं कहता था, परंतु मेरा भाव व प्रेम परमात्मा की तरफ सच्चा था मैं उनकी सेवा करना चाहता था। आप मुझ कृपा सही प्रार्थना सिखा दिजिए।’

मोजे़ज़ को लगा कि आज उसने एक नेक कार्य किया है, एक भटके हुए को सही मार्ग बता दिया है। और वह उसे सही ढंग की प्रार्थना सिखाने लगा। बेचारे गड़रियां इतनी बड़ी प्रार्थना को नहीं समझ पाता। और उदास हो जाता है। और इसके बाद मोजे़ज़ आगे बढ़ जाता है, वह चार कदम भी नहीं चला होता कि उनके सामने परमात्मा की उपस्थिती महसूस होती है मानों कोई उन्हें कहा रहा है, एक आवाज जंगल में गूंज उठती है, ‘हे मोजे़ज़, सुन मैंने तुझे इस संसार में इसलिए भेजा है कि तु मेरे लोगों को मुझ से मिलाए, मेरे पास लाए। और तु ये क्या कर रहा है? तु तो मेरे लोगों को मुझसे दूर कर रहा है। उन्हें भटका रहा है। वह मेरा कितना प्यारा था, उसका हृदय कितना कोमल और र्निकलुष था। उसकी प्रार्थना कितना सच्ची और प्रेम से भरी थी। मेरी सर्वश्रेष्ठ प्रार्थनाओं में एक थी। उसमें कोई दिखावा या छलावा नहीं था, न हीं वह निर्मित थी। एक ह्रदय की आवाज थी जो मुझ तक बह रही थी। और तुने तो उसका दिल ही तोड़ दिया। तू जा और उससे अभी माफी मांग, और जो तुने उसे अपनी प्रार्थना सिखाई है उसे वापस ले, अपने उन थोथे शब्दों को उन मुर्दा शब्दों को वापस ले ले।’

मोजे़ज जाते है उस गड़रिए के पास और उनके पैरों में गिर कर माफी मांगते है, कहते है, ‘मुझे माफ कर दो, मैं गलता था और आप सही थे। परमात्मा तुम्हारी बात सून रहा था। मेरी ही प्रार्थना वापस लोटाई जा रही थी।’

ठीक ऐसा ही होना भी चाहिए। अपनी प्रार्थना को उगने दो। इसे घटने दो। हां, जब कभी भी तुम परमात्मा से कुछ गपशप करने जैसा महसूस कर रहे हो, उन क्षणों की प्रतीक्षा करो। और इस हर रोज दोहराने की कोई भी जरूरत नहीं है। ऐसी भी कोई प्रार्थना की आवश्यकता नहीं है, जो बनी-बनाई हो। जब तुम्हारे अंदर से कोई भाव उठे, कोई तरंग उठे, हृदय अल्हादित हो रहा हो, प्रेम का सागर मचल रहा हो, तब आप उसके संग साथ हो सकते हो। वहीं है प्रार्थना सच्ची। बाकी तो सब कर्म-कांड ही है।

कभी-कभी स्नान करते समय, फव्वारे के नीचे बैठे-बैठे, अचानक प्रार्थना करने की एक उत्कण्ठा उठ खड़ी हो तो वह क्षण अति महत्वपूर्ण है उसे मत जाने दो और डूब जाओं उस क्षण में। उतर जाओं उस प्रार्थना में। अब यही जगह है, सही समय है प्रार्थना का उसे मंदिर तक ले जाकर खंडित मत करो। किसी वृक्ष के नजदीक घट रही है तो वहीं बैठ जाओ। जिस क्षण में कोई उत्कण्ठा उठ खडी हुई है, वहीं तो घट गई प्रार्थना। और तुम यह देख कर हैरान होगे कि वह कितनी सुंदर है। जब वह हृदय की गहराईयों से उठ कर बहती है। सच में वही सूनी भी जाती है। और उसका जवाब भी आता है।कभी अपनी स्त्री को प्रेम के क्षण में जब एक दूसरे का हाथ थामें हो, अचानक प्रार्थना करने की एक लालसा उठती हैं—उसी क्षण प्रार्थना में उतर जाना। फिर उस से बेहतर प्रार्थना का क्षण तुम्हें नहीं मिलेगा। वो समय प्रेम का परम सुख होता है जब अपनी प्रिय के संग-साथ उस समय परमात्मा हमारे बहुत ही नजदीक होता है। नजदीक भी नहीं कहना चाहिए हम उससे लवरेज होते है, हम उसमें डूबे ही हुए होते है। वह हम पर उस समय बरस रहा होता है। जब चरम सुख तुम पर बरसे, उस समय प्रार्थना में डूबों। पर रूकों—इसे एक कर्मकांड़ न बनाओं। यही तो तंत्र की दृष्टि है। चीजों को स्वस्फूर्त होने दो।

और आखिरी बात तुम कहते हो: ‘मेरा तात्पर्य है प्रार्थना ईश्वर के प्रेम को प्राप्त करने के लिए, उसके प्रसाद को अनुभव करने लिए।’ 

फिर तुम्हारा प्रश्न गलत है: ‘मेरा तात्पर्य है प्रार्थना ईश्वर के प्रेम को प्राप्त करने के लिए।’ तुम लालची हो! प्रार्थना तो प्रभु को प्रेम करने के लिए होती है। हां, प्रेम प्रभु से हजार गुना होकर आता है, पर आकांक्षा वह नहीं है, वह तो बस उसका निष्कर्ष है; उकसा परिणाम नहीं, निष्पति है। हां, प्रेम आएगा एक बाढ़ की तरह, तुम परमात्मा की और एक कदम उठाते हो और परमात्मा तुम्हारी तरफ हजार कदम उठता है। तुम उसे प्रेम की एक बूंद देते हो वह हजार बूंदों में लौटा देता है। वह आप पर बरस उठता है, एक सागर की तरह उपलब्ध हो जाता है। हां, यह होता है, पर यह तुम्हारी आकांक्षा नहीं होनी चाहिए। यह आकांक्षा गलत है। यदि तुम बस परमात्मा का प्रेम चाहते हो और इसलिए तुम प्रार्थना कर रहे होते हो। तब तुम्हारी प्रार्थना एक सौदा है। तब यह एक व्यापार है। और व्यापार से सावधान रहना।

अमरीका में कहीं किसी छोटे से स्कूल में अध्यापिका बच्चों से पूछती है: ‘मनुष्य के इतिहास में महानतम व्यक्ति कौन हुआ है?’ निश्चय ही, एक अमरीकन कहता है, ‘अब्राहम लिंकन’ एक भारतीय कहता है, ‘सुभाष चन्द्र बोस’ और एक अंग्रेज बालक कहता है, ‘विंसटन चर्चिल’ और इसी तरह से दूसरे बच्चे भी कहते है। और तब एक छोटा सा यहूदी बालक खड़ा होता है और कहता है, ‘जीसस’ और वह जीतता है, पुरस्कार उसी को मिलता है। लेकिन अध्यापिका उससे पूछती है, पुरस्कार उसी को मिलता है। लेकिन अध्यापिका उससे पूछती है, ‘तुम तो यहूदी हो, तुमने जीसस क्यों कहा?’

उस बालक ने कहा: ‘अपने ह्रदय में तो मैं सारे समय जानता ही हूं कि यह मोजेज है, पर व्यापार अखिरकार व्यापार ही है।’

प्रार्थना को व्यापार मत बनाओ। इसे शुद्ध आहुति ही रहने दो; बस अपने हृदय से ही अर्पण करो बदले में कोई चीज मत मांगो। तब बहुत कुछ आता है…हजार गुणा, लाख गुणा…परमात्मा तुम्हारी और बहता है। पर, पुन:, समरण रखना कि यह एक परिणति है। परिणाम नहीं।

ठाकुर की कलम से

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