"जब तक तुम्हारी धारणा है तब तक तुम भगवान से न जुड़ सकोगे— धारणा ही बाधा है।"
जब तक जैन—हिंदू—मुसलमान—ईसाई मौजूद हैं तब तक कोई धार्मिक नहीं होता। क्योंकि ईसाई का अपना परमात्मा है, हिंदू का अपना परमात्मा है। अभी तो परमात्मा तक कोई हैं। अभी तो परमात्मा में भी भेद है।
अभी तो भक्त और भगवान का भेद मिटने का तो सवाल ही दूर तो भगवानों में भेद है। अभी तो भगवान भी नहीं नहीं हैं, भक्त का उससे एक होना तो बहुत दूर की बात है, दूर का सपना है।
जब हिंदू झुकता है तो वह भगवान के चरणों में नहीं झुकता, वह हिंदू— भगवान के चरणों में झुकता है।
कहानी है कि तुलसीदास को कृष्ण के मंदिर में ले जाया गया जब वह वृंदावन गए, वह झुके नहीं। कृष्ण के सामने और तुलसीदास झुकें।
नहीं झुके। उन्होंने कहा कि जब तक धनुष—बाण हाथ न लोगे तब तक मैं नहीं झूकूंगा ।
यह मजा देखते हैं! यह अहंकार देखते हैं! भक्त भगवान पर भी शर्त लगा रहा है। भक्त यह कह रहा है कि मेरी शर्त के अनुकूल होओगे तो झुकूंगा।
धनुष—बाण हाथ लो, तो तुलसी का माथा झुके। मैं धनुष—बाण वाले राम को मानता हूं, मैं यह बांसुरी वाले कृष्ण को नहीं मानता। तुलसीदास के पास भी आखें नहीं मालूम होती, नहीं तो जिसने धनुष—बाण लिया है, उसी ने बांसुरी भी बजायी है।
और ये तो दोनों ही हिंदू थे—यें कृष्ण और राम की दोनों धारणाएं हिंदू थीं। जरा मस्जिद में सोचो तुलसीदास की क्या गति होती! भीतर ही न घुसते।
मंदिर में चले गए, यह उनकी बड़ी कृपा! कम से कम भीतर तो चले गए! इतना अनुग्रह तो किया परमात्मा पर, कि कृष्ण को एक मौका तो दिया कि अगर झुकवाना हो मुझे, धनुष—बाण हाथ ले लो! लेकिन मस्जिद मे क्या करते, वहां तो हाथ ही नहीं है।
बांसुरी लेने वाला तो धनुष—बाण भी कभी ले सकता है, मगर मस्जिद में तो हाथ ही नहीं है, कोई प्रतिमा नहीं, वहा क्या करते? वहा तो भीतर जा ही नहीं सकते थे।
अगर किसी जैन मंदिर में गए होते और महावीर खड़े थे, तो महावीर से यह कहना कि धनुष—बाण हाथ लो, बड़ी बेहूदी बात हो जाती। क्योंकि वह आदमी धनुष—बाण के बिलकुल विपरीत था।
अहिंसा परमो धर्म:। वह धनुष—बाण हाथ में लेने की ही वजह से तो राम जैनों को स्वीकार नहीं हो सकते। जैन नहीं झुक सकता राम के मंदिर में। कैसे झुके?
यह धनुष—बाण लिए खड़े हैं। और यह धनुष—बाण तो पाप का प्रतीक है, हिंसा का प्रतीक है। और हिंसा से कहीं हिंसा मिटी है! हिंसा से तो और हिंसा जन्मती है। जैन—शास्त्रों में राम की कथायें है
उनकें महापुरुष कहा है, लेकिन भगवान नहीं। बस उतने दूर तक जैन उनको मान सकते है—एक महापुरुष हैं, जैसे और बहुत महापुरुष हैं, लेकिन भगवान नहीं।
बुद्ध का भी नाम अगर जैन उल्लेख करते हैं तो उनको महात्मा कहते हैं, भगवान नहीं।
महात्मा मान सकते हैं। लेकिन भगवान! धारणा उनकी है, अपनी। हर एक की अपनी धारणा है। और जब तक तुम्हारी धारणा है तब तक तुम भगवान से न जुड़ सकोगे— धारणा ही बाधा है।
तब तक हिंदू हिंदू— भगवान के सामने झुक रहा है—और हिंदू— भगवान कहीं है? भगवान तो बस भगवान है—न हिंदू न मुसलमान, न ईसाई।
एक फकीर रात सोया। उस ने एक सपना देखा कि वह स्वर्ग पहुंच गया, और बड़ी भीड़ — भड़का है; स्वर्ग बड़ा सजा है और बड़ा जुलूस निकल रहा है—शोभायात्रा! उस ने पूछा—वह भी खड़ा हो गया भीड़ में —कि क्या बात है?
किसी ने कहा, आज भगवान का जन्मदिन है, किसी राहगीर ने कहा, उत्सव मनाया जा रहा है। उस ने कहा अच्छे भाग्य मेरे कि ठीक दिन आया स्वर्ग।
जुलूस निकलते हैं। निकले रामचंद्र जी धनुष—बाण लिए और लाखों—करोड़ों लोग उनके पीछे। फिर निकले मुहम्मद अपनी तलवार लिए, और लाखों—करोड़ों लोग उनके भी पीछे।
और फिर निकले बुद्ध, और फिर निकले महावीर, और जरथुस्त्र, और निकलते गए, निकलते गए और अखीर मे जब सब निकल गए तो एक आदमी एक बूढ़े—से मरियल—से घोड़े पर सवार निकला।
जनता भी जा चुकी थी, लोग भी जा चुके थे, उत्सव समाप्त होने के करीब था, आधी रात हो गयी, इस फकीर को इस आदमी को देख कर हंसी आने लगी कि यह भी सज्जन खूब हैं, यह काहे के लिए निकल रहे हैं अब! और इनके पीछे कोई भी नहीं। उस ने पूछा, आप कौन हैं और घोड़े पर किसलिए सवार हैं?
और यह कैसी शोभायात्रा है, आपके पीछे कोई नहीं! उस ने कहा, मैं क्या करूं, मैं भगवान हूं।
कुछ लोग हिंदुओं के साथ हो गए हैं, कुछ बौद्धों के साथ, कुछ ईसाइयों के साथ, कुछ मुसलमानों के साथ, कोई भी नहीं, मैं अकेला हूं।
मेरा जन्मदिन मनाया जा रहा है, तुम्हें मालूम नहीं? घबड़ाहट में फकीर की नींद खुल गयी।
तुम भी सोचोगे तो घबड़ाहट में तुम्हारी भी नींद खुल जाएगी।
🙏•🏵️•{{ जय श्री राम }}•🏵️•🙏
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