"परमात्मा ने तुम्हें जितना दिया है कम से कम उतना लौटाना।"इस्लाम की धारणा है कि परमात्मा के पास जब तुम जाओगे तो वह तुमसे पूछेगा कि तुम पूरे वापस लौटे हो? अगर तुम अधूरे वापस लौटे तो तुम दंडित किए जाओगे।
"परमात्मा ने तुम्हें जितना दिया है कम से कम उतना लौटाना।"
इस्लाम की धारणा है कि परमात्मा के पास जब तुम जाओगे तो वह तुमसे पूछेगा कि तुम पूरे वापस लौटे हो?
अगर तुम अधूरे वापस लौटे तो तुम दंडित किए जाओगे।
परमात्मा ने जितना तुम्हें दिया था, कम से कम उतने तो वापस लौटाना; ज्यादा न कर सको तो क्षमा मांग सकते हो, लेकिन कम हो कर तो मत लौटना।
इसके अनेक आयाम हैं, इस बात के। निश्चित ही परमात्मा ने जितना तुम्हें दिया है, उतना तो कम से कम लौटा ले जाना। उसको काट मत लेना। उसे बढ़ा सको तो ठीक।
बीज दिया था, अगर फूल हो सके तो ठीक; लेकिन कम से कम बीज तो लौटा देना।
जीसस की बड़ी प्राचीन कथा है। जीसस निरंतर उसे दोहराते थे कि एक बाप अपने तीन बेटों में संपत्ति बांटना चाहता था, लेकिन निश्चय न कर पाता था कि कौन योग्य और कौन सुपात्र है। तीनों ही जुड़वां पैदा हुए थे, इसलिए उम्र से तय न किया जा सकता था। तीनों एक से बुद्धिमान थे।
तो उसने एक फकीर से सलाह ली। फकीर ने उसे एक गुर बताया।
उसने बेटों से कहा कि मैं तीर्थ यात्रा पर जा रहा हूं।
और बेटों को उसने कुछ बीज दिए--फूलों के बीज--और कहा कि सम्हाल कर रखना; जब मैं लौट आऊं तब मैं तुमसे वापस मांगूंगा।
पहले बेटे ने सोचा कि इन बीजों को कोई बच्चे उठा लिए, कोई जानवर चर गया--तिजोड़ी में बंद कर दें। तिजोड़ी में बंद करके रख दिए। निश्चित हो गया।
लोहे कि तिजोड़ी! चोरों का भी क्या डर! और कौन चोर लोक की तिजोड़ी तोड़ कर बीज चुराने आएगा! वह निश्चित रहा। बाप आएगा, लौटा देंगे।
दूसरे ने सोचा कि तिजोड़ी में रखूं, बीज सड़ सकते हैं; और बाप ने ताजा जीवित बीज दिए और मैं सड़े लौटाऊं--यह तो लौटना न हुआ। क्या करूं? बीज जीवित कैसे रहें?
उसने सोचा बाजार में बेच दूं, तिजोड़ी में रुपए रख दूं। बाप जब वापस आएगा, बाजार से बीज खरीद कर लौटा देंगे।
तीसरे ने सोचा कि बीज का अर्थ ही होता है, होने की संभावना।
बीज का अर्थ ही होता है जो होने को तत्पर है, जिसके भीतर कुछ होने को मचल रहा है। तो बाप ने बीज दिए हैं, मतलब साफ है कि इन्हें इतना ही जिसने रखा, वह नासमझ है।
ये तो बढ़ने को राजी थे, ये तो फूल बनने को राजी थे, और एक बीज से करोड़ बीज पैदा होने को राजी थे।
पता नहीं, बाप कब लौटे, तीर्थ लंबा है, यात्रा वर्षों लेगी--उसने बीज बो दिए।
तीन बरस बाद वापस लौटा पिता।
पहले बेटे को उसने कहा, उसने तिजोड़ी की चाबी दे दी खोली गई तिजोड़ी, करीब-करीब सी बीज सड़ चुके थे।
न हवा लगी, न सूरज की रोशनी लगी और किसी ने उन पर ध्यान ही न दिया तीन वर्ष तक तिजोड़ी में लोहे की।
बीज कोई लोहे की तिजोड़ियों में बंद करने को थोड़ी ही हैं! उन्हें खुला आकाश चाहिए, हवा की पुलक चाहिए, रोशनी चाहिए, तो वे जिंदा रह सकते हैं। वे सब-सड़ गए थे।
और जिन बीजों से फूलों की अपूर्व सुवास पैदा हो सकती थी, उनकी जगह उस तिजोड़ी से सिर्फ दुर्गंध निकली--सड़े हुए बीजों की दुर्गंध!
बाप ने कहा: तुमने सम्हाला तो, लेकिन सम्हाल न पाए। तुम मेरी संपत्ति के अधिकारी न हो सकोगे। तुम नासमझ हो। जितना मैं तुम्हें दे गया था, उतने भी तुम वापस न कर पाए। ये बीज तो समाप्त हो गए।
इनमें अब एक भी जीवित नहीं है। अब इनको बोओगे तो कुछ भी पैदा न होगा। यह तो राख है और मैं तुम्हें बीज दे गया था। बीज थे जीवंत, उनमें संभावना थी बहुत होने की। इनकी सारी संभावना खो गई है, सिर्फ राख है, इनसे कुछ भी नहीं हो सकता। ये कब्रें हैं!
दूसरे बेटे से कहा।
दूसरा बेटा भागा बाजार रुपए लेकर, बीज खरीद कर ले आया--ठीक उतने ही बीज जितने बाप दे गया था। बाप ने कहा कि तुम थोड़े कुशल हो, लेकिन तुम भी काफी नहीं; क्योंकि जितना दिया था उतना भी लौटाना भी कोई लौटाना है! यह तो जड़ बुद्धि भी कर लेता। इसमें तुमने कुछ बुद्धिमत्ता न दिखाई और बीज का तुम राज न समझे।
बीज का मतलब ही यह है कि जो ज्यादा हो सकता था। उसे तुमने रोका और ज्यादा न होने दिया। तुम पहले से योग्य हो, लेकिन पर्याप्त नहीं।
तीसरे बेटे से पूछा कि बीज कहां हैं? तीसरा बेटा बाप को भवन के पीछे ले आया जहां सारा बगीचा फूलों और बीजों से भरा था।
उसके बेटे ने कहा; ये रहे बीज! आप दे गए थे; मैंने कहा इन्हें बचाकर रखने में मौत हो सकती है। इन्हें बाजार में बेचना उचित न मालूम पड़ा, क्योंकि आप सुरक्षित रखने को कह गए थे।
और फिर आपने चाहा था कि यही बीज वापस लौटाए जाएं। बाजार से तो दूसरे बीज वापस लौटेंगे, वे वही न होंगे।
फिर वे उतने ही होंगे जितना आप दे गए थे। तो मैंने तो बीज बो दिए थे। अब ये वृक्ष हो गए हैं।
इनमें बहुत बीज लग गए हैं, बहुत फूल लग गए हैं। हजार गुने करके आपको वापस लौटाता हूं।
स्वभावतः तीसरा बेटा बाप की संपत्ति का मालिक हो गया।
इस्लाम कहता है: परमात्मा ने तुम्हें जितना दिया है कम से कम उतना लौटाना।
अगर बढ़ा न सको...बढ़ा सको तब तो बहुत..! और इस आधार पर इस्लाम सर्जरी पसंद नहीं करता।
🙏
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