किसी भी निर्णय का सबसे महत्वपूर्ण भाग यह है कि वह निर्णय कौन ले रहा है।
जेहादी वामपंथ का सबसे मूलभूत फीचर है कि यह समाज से उसके निर्णय का अधिकार छीन लेता है। एक व्यक्ति, या व्यक्तियों का एक छोटा समूह पूरे समाज के बेहाफ़ पर निर्णय लेता है और उस निर्णय को पूरे समाज पर थोप देता है, यह जेहादी वामपंथ की मूल तकनीक है। स्टालिन या माओ अपने निर्णय को दूसरों पर लादने के लिए फौज का इस्तेमाल करते थे। आज के जेहादी वामपंथी इसके लिए उन संस्थाओं को हाईजैक करके उनका इस्तेमाल करते हैं जो पहले से समाज में स्वीकार्य रहे हैं। यूनिवर्सिटी, मीडिया, सिनेमा और ज्यूडिशरी...पर वे इन संस्थाओं का प्रयोग समाज को सांस्कृतिक रूप से समृद्ध करने के लिए नहीं करते, बल्कि समाज की सामूहिक निर्णय और विचार प्रक्रिया को बाईपास करने के लिए करते हैं।
इसका प्रक्रिया का सबसे स्पष्ट उदाहरण ज्यूडिशरी है। वामपन्थियों ने बेहद बेशर्मी से समाज को बदलने और उसपर अपने निर्णयों को थोपने के लिए ज्यूडिशियल एक्टिविज्म का इस्तेमाल किया है। कानून बनाने का परम्परागत टूल जनता द्वारा निर्वाचित प्रतिनिधियों द्वारा गठित बॉडी - संसद या विधान सभा है, जो हर पाँच साल में जनता को अपने निर्णयों के लिए उत्तरदायी होती है। पर पिछले कुछ वर्षों से ज्यूडिशरी के माध्यम से वामपन्थियों ने कानून बनाने के अधिकार को अपने हाथ में ले लिया है। इन कानूनों को बनाने में ना तो जनता के मन्तव्यों और प्राथमिकताओं की कोई प्रतिभागिता होती है, ना ही उसके प्रति कोई उत्तरदायित्व होता है। होता है तो सिर्फ समाज को तोड़ने और गुलाम बनाने वाला वामपंथी एजेंडा की प्रतिबद्धता।
ज्यूडिशरी ने पिछले कुछ वर्षों में समाज में समलैंगिक सम्बन्धों को परम्परागत वैवाहिक सम्बन्धों के बराबर का स्थान देने की दिशा में निर्णय दिए हैं। हिन्दू मन्दिरों की परम्पराओं को कलंकित किया है, लोकप्रिय सरकार के बनाये हुए कानूनों को बाधित किया है। समाज ने यह माँगा नहीं था, इसे अप्रूव नहीं किया था। अभी प्रश्न यह भी नहीं है कि ये निर्णय सही थे या गलत... उससे भी पहले और बड़ा प्रश्न यह है कि वे ना सिर्फ समाज के निर्णय नहीं थे, वे समाज की प्राथमिकताओं के विरुद्ध थे। पर समाज न्याय और न्यायालय नाम की संस्था का सहज सम्मान करता है, और उसी सम्मान का दुरुपयोग करके जेहादी वामपन्थी समाज को तोड़ने का अपना एजेंडा चला रहे हैं।
अभी उनका लेटेस्ट टारगेट है विवाह नाम की संस्था। उनका लेटेस्ट हथियार है "मैरिटल रेप" का कानून। यानि अब पति-पत्नी के बीच के सम्बंध भी रेप की परिभाषा के दायरे में आ जायेंगे। यह कानून
विवाह नाम की संस्था को अस्थिर करने की दिशा में क्या प्रभाव डालेगा यह समझना कठिन नहीं है। पर उससे भी बड़ी बात है, यह हमने माँगा नहीं है...यह हमें चाहिए नहीं। हमसे हमारी मर्जी नहीं पूछी गयी। यह कानून जिनके जीवन को प्रभावित करेगा, उनकी सहमति और स्वीकृति इसमें शामिल नहीं है।
कोर्ट को कानून बनाने का कोई अधिकार नहीं है...कानून बनाना पूरी तरह से ज्यूडिशरी के अधिकार क्षेत्र से बाहर की बात है।
अगर आपको स्वतंत्रता प्यारी है तो अपने लिए निर्णय लेने के अधिकार को इन मानवता और सभ्यता के शत्रुओं के हाथ में न जाने दें। जो समाज की स्थापित नैतिकता और परंपराओं का सम्मान नहीं करते उन्हें ये अधिकार नहीं दिए जा सकते।
#NoMessing
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