#समय_और_स्त्री!बचपन से बुजुर्गों से सुनता आया हूं, "स्त्री हठ बहुत खराब होता है, स्त्री ने जब जब हठ किया तब रामायण, महाभारत जैसे महायुद्ध ही हुए हैं !"
#समय_और_स्त्री!
बचपन से बुजुर्गों से सुनता आया हूं, "स्त्री हठ बहुत खराब होता है, स्त्री ने जब जब हठ किया तब रामायण, महाभारत जैसे महायुद्ध ही हुए हैं !"
"स्त्रियों की बुद्धि घुटनों में होती है!"
"चार स्त्रियां जहां बैठती हैं बकबक हीं करती रहती हैं !"
अब जबसे सोचने समझने की क्षमता विकसित हुई तबसे मन में एक प्रश्न यही है कि क्या नारी वास्तविकता में ऐसी ही होती है जैसी हम उनकी परिभाषा देते हैं ?
मेरे विश्लेषण के अनुसार तो,
"नहीं!"
क्योंकि स्त्री अपने हर दायित्व का जिस परिपक्वता से पालन करती है वैसे शायद ही कोई पुरुष कर सके ,
उदाहरण के लिए -
#मां के रूप में एक स्त्री अपनी पीठ पर समस्त मानव जीवन का भार लिए चलती है, बच्चे के जन्म से पहले ही वो उसे नौ माह तक अपने गर्भ मे ढोती है, उसे जन्म देते समय मनुष्य की सहनशक्ति से अधिक पीड़ा सहन करती है, जन्म के बाद बच्चे का पालन पोषण तथा समाज, अपने पराए, अच्छे बुरे का ज्ञान देती है !
#बहन बनकर यही स्त्री भाई को असीम स्नेह प्रेम देती है !
#पत्नी - लोग कहते हैं "पत्नी अपने पति को पतन की ओर ले जाती है तभी #पतनी कहलाती है " गलत है ये , वास्तविकता ये है कि "एक पत्नी अपने पति को पतन से बचाती है तभी#पतननहीं कहलाती है !"
अब ?
क्या अब भी आप स्त्री के बारे में वही धारणा रखते हैं ?
चलिए फिर ,
और लीजिए ,
#मनोरंजन , #व्यापार , #खेलकूद , #शिक्षा आदि हर क्षेत्र मे स्त्री ने सफलता के झंडे गाड़े हैं ,
"रानी लक्ष्मीबाई , जीजावती , लता मंगेशकर , आशा भोसले , सुरैया जी , मधुबाला , हेमा मालिनी , शमशाद बेगम , अरुणा ईरानी , कोंकणा सेन शर्मा , श्रेया घोषाल , साइना नेहवाल , कल्पना चावला तथा नूरां सिस्टर्स आदि अपने अपने क्षेत्र में सफलता का उदाहरण थे/हैं ।
स्त्री यदि राजनीति करने पर आ जाए तो कोई पुरुष उसकी बराबरी नहीं कर सकता ।
स्त्री यदि आपका जीवन नष्ट करने पर आ जाए तो कोई आपको बचा नहीं सकता ,
और यही स्त्री यदि आपका जीवन बनाने पर आ जाए तो बनाकर रहेगी ,
वो एक स्त्री ही थी जो यमराज से अपने पति के प्राण वापस ले आई थी !
वो एक स्त्री ही थी जो अपनों की रक्षा के लिए तलवार खींचकर मैदान मे कूद पड़ी थीं और दुश्मन को नाको चने चबवा दिए !
प्राचीन समय से आजतक यदि दुनिया चल रही है तो स्त्री की वजह से ही !
और यकीन मानिए ,
महाभारत तथा रामायण का युद्ध स्त्री हठ की वजह से नहीं हुआ था ,
ये बात सत्य है परंतु मैं इसका कोई कारण नहीं बताऊंगा तथा कोई तर्क भी नहीं दूंगा अन्यथा बहुत से लोग धर्मद्रोही का टैग लगा देंगे!
परंतु फिर भी बस इतना कहूंगा कि जो कुछ हुआ पुरुषों की #काम_वासना या उससे जुड़ी इच्छा ही इन युद्धों का मुख्य कारण रही !
और ,,
यदि नारी की बराबरी करने बैठेंगे तो रोमछिद्रों से धूम्र उत्सर्जित होने लगेगा !
और इस बात को कौन नहीं जानता ?
प्राचीन समय से ही स्त्री का समाज मे विशेष महत्व माना जाता रहा है ,
कैकेयी को दिए वचन के कारण दशरथ द्वारा परमप्रिय श्रीराम को वनवास भेजना ,
श्रीराम का माता सीता को अपने साथ ले जाना ,
पांडवों का द्रोपदी के सम्मान हेतु इतना बड़ा महायुद्ध ठान लेना आदि इस बात के उदाहरण हैं !
मध्य के समय मे स्त्री को सिर्फ उपभोग की वस्तु माना जाने लगा था , और जहां तक मेरा मानना है तो इसका मुख्य कारण #मुगल_शासन ही रहा ,
जैसी जिसकी रीत है वो आपको वैसा ही बनाना चाहेगा ,
ये आप पर निर्भर करता है कि आप उसके अनुसार खुद को ढालते हैं या अपने संस्कारों के अनुसार !
परंतु अब फिर से स्त्री की स्थिति बेहतर हो रही है , वो भी खुद स्त्री के कठिन परिश्रम , लगन , कुछ करने की इच्छा और पुरुषों की मानसिकता मे होते सुधार के कारण ,,
मित्रों !
एक बेल फिर से बढ़ना शुरू हुई है , उसे जानवर बनकर चरिए मत , बल्कि हो सके तो एक मजबूत वृक्ष बन सहारा दीजिए ,
तभी आपको सम्मान मिलेगा ,
और स्त्रियों को उनकी वास्तविक पहचान :)
ठाकुर की कलम से
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