{{"संसार परमात्मा तक जाने का आयोजन है, चुनौती है।"}} बुद्ध के पिता को ज्योतिषियों ने कहा था बुद्ध के जन्म पर कि यह व्यक्ति संन्यासी हो जाएगा या चक्रवर्ती सम्राट।

{{"संसार परमात्मा तक जाने का आयोजन है, चुनौती है।"}}

तुम्हारे जीवन में यहां क्रांति घट सकती है, मगर एक शर्त तुम्हें पूरी करनी पड़ेगी।

बुद्ध के पिता को ज्योतिषियों ने कहा था बुद्ध के जन्म पर कि यह व्यक्ति संन्यासी हो जाएगा या चक्रवर्ती सम्राट।

बुद्ध के पिता डर गए। और उन्होंने कहा कि कुछ रास्ता बताओ कि यह संन्यासी न हो पाए।

पंडित थे, पुराने ढर्रे के पंडित रहे होंगे; उन्होंने कहाः ऐसा करो कि इसको मृत्यु का कोई अनुभव न हो, और इसके लिए जितनी सुंदरतम स्त्रियां मिल सकें, इसके पास इकट्ठी कर दो। बचपन से ही इसको राग-रंग में पलने दो। इसको बिल्कुल सुख-वैभव में पलने दो।

इसको दुःख, होने ही मत दो। इसको पता ही मत चलने दो कि जीवन में दुःख होता है, मौत होती है, कि कोई आदमी बूढ़ा होता है।

यहां तक उन्होंने कहा कि इसके बगीचे में कोई फूल कुम्हलाए नहीं, नहीं तो यह सोचेगा कि यह फूल कुम्हला क्यों गया?

और कहीं उसी से संन्यास का भाव पैदा हो जाए! कोई पत्ता सूखा हुआ इसके बगीचे में न बचे।

इसको छिपा कर रखो। इसके लिए सुंदरतम महल बनवाओ।
तो पिता ने वैसा ही किया।

सुंदर महल बनवाए, अलग-अलग ऋतुओं के लिए अलग-अलग महल बनवाए। सारे राज्य की सुंदर युवतियां इकट्ठी कर दीं।

बुद्ध बचपन से ही बड़े सुख में पाले गए। और वही संन्यास का कारण हो गया। उसी कारण संन्यस्त हुए, नहीं तो नहीं होते।

अगर साधारण जीवन में गुजरे होते तो शायद न हो पाते; शायद और दो-चार जन्म लगते।

मगर इतना घना सुख मिला--और सुख न मिला। सुंदरतम स्त्रियां मिलीं--और कुछ सौंदर्य का अनुभव न हुआ।

जल्दी ही ऊब गए। वासना से गुजर गए, तेजी से गुजर गए। कुछ और रहा न वासना में; सब देख लिया ; कुछ पाया नहीं।

सब सुख-वैभव देख लिए। जल्दी ही, जवान ही थे, तभी वैराग्य का उदय हुआ; तभी घर छोड़ कर जंगल चले गए।

अगर बुद्ध के पिता ने उन पंडितों से फिर पूछा होगा कि कहां भूल-चूक हो गई तो उन्होंने बताया होगा कि आप पूरी व्यवस्था नहीं कर पाए। यह रास्ते पर निकलता था, इसने एक बीमार आदमी देख लिया।

ऐसी कहानी है ही। रास्ते पर निकलता था, इसने एक मुर्दे की लाश देख ली। यह नहीं होना था।

इससे मन में प्रश्न उठने लगे कि जीवन समाप्त हो जाएगा। इससे यह चला गया। आप पूरा इंतजाम नहीं कर पाए, जैसा हमने कहा था।

और मेरा मानना है कि उनके इंतजाम के कारण ही बुद्ध गए।

इसीलिए जीवन के सारे अनुभव से गुजर जाना मुक्ति का उपाय है। बुद्ध के बुद्धत्व में उन पंडितों का बड़ा हाथ रहा--अनजाने।

बुद्ध के पिता का बड़ा हाथ रहा--अनजाने। उन्होंने तो कुछ और चाहा था; कुछ हो गया।

सब देख लिया बुद्ध ने, जो संसार दे सकता था। जल्दी ही देख लिया। पच्चीस साल के हुए थे तभी सब सुख-भोग देख लिए।

जो आदमी पचहत्तर तक भी सोचता ही रहता है, वे पच्चीस में देख ही लिए, वे खत्म ही हो गए। अब कुछ बचा ही नहीं।

पच्चीस में वृद्ध हो गए बुद्ध--उतने वृद्ध जितना आदमी पचहत्तर में होता है।

हिंदू कहते हैं, पचहत्तर साल में आदमी को संन्यासी होना चाहिए; बुद्ध पच्चीस साल में संन्यासी हो गए।

क्योंकि साधारण जिंदगी में सुख इतने ज्यादा थोड़े ही मिलते हैं, इतने इकट्ठे थोड़े ही मिलते हैं, थोक थोड़े ही मिलते हैं,

फुटकर-फुटकर आते हैं, पचहत्तर साल लग जाते हैं आते-आते।

बुद्ध की जिंदगी में थोक में आए; इकट्ठे गिर गए। पच्चीस साल में सब पूरा हो गया।

तुम मेरे आश्रय में हो तो खयाल रखो, मैं दमन का पक्षपाती नहीं हूं।

मैं अनुभव का पक्षपाती हूं। जो वासनाएं तुम्हारे मन में बार-बार उठ आती हों, उन्हें पूरा ही कर लो। कुछ वासना से इतना घबड़ाना क्या है?

सीढ़ियां हैं, चढ़ जाओ। हां, सीढ़ियों की पकड़ में मत आ जाना।

सीढ़ियां किसको पकड़ती हैं? तुम मत पकड़ना सीढ़ियों को, बस। सीढ़ियों ने किसी को कभी पकड़ा हो, ऐसा मैंने सुना नहीं।

तो सीढ़ियों से क्या घबराना? रख लो पैर, चढ़ जाओ। गुजर जाओ। मंदिर में पहुंच जाओगे।

वासना की सीढ़ियों से चढ़कर ही कोई प्रार्थना तक पहुंचता है। और विचार की सीढ़ियां चढ़कर ही कोई निर्विचार तक पहुंचता है।

और संसार परमात्मा तक जाने का आयोजन है, चुनौती है।
छोड़ो विरोध। छोड़ो दमन। छोड़ो नकार।

•🙏•🏵️{{ जय श्री राम }}🏵️•🙏•
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