जिस प्रकार संसार के संबंध मे यह भी नहीं कहा जा सकता कि वह सच है या झूठ उसको ही हमने माया कहा है ।
"माया " शब्द बड़ा हीं अद्भुत है ।
सत्य का अर्थ है -वह जो है
जिसके संबंध में हम बिल्कुल सुनिश्चित हो सकते हैं
जिसके संबंध मे कोई संदेह हीं नहीं उठता ।
एक ही चीज है जिसमे कोई संदेह नही है वह
कि मैं हूं क्योंकि संदेह ही अगर करना हो तो
भी इस मै का होना जरूरी है नहीं तो संदेह कौन करेगा
मैं यह भी कहूं कि मैं नही हूं तो भी इस मैं का होना जरूरी है । एक बात सुनिश्चित है कि मैं हूं। यह सत्य है ।
असत्य वह चीज है जो है ही नही
सत्य के ठिक विपरीत । उसके होने के संबंध में भी विचार नही उठता ।
सत्य के न होने के संबंध मे संदेह नहीं उठ सकता और असत्य के होने के संबंध में विचार नहीं उठ सकता
ये दो बाते हैं और दोनों के बीच में है माया । माया का अर्थ है
जो लगती है लेकिन है नहीं जिसके होने के संबंध में न तो हां कहा जा सकता है और न हीं ना जो संदिग्ध है ।
मन खोया कि संसार खो गया ।
फिर जो शेष रह जाता है उसको वे राम कहते हैं
उसको फिर वे संसार नहीं कहते ।
राम अस्तित्व का वह रूप है जो मन के खो जाने पर
दिखाई पड़ता है । इधर आत्मा रह जाती और वहां
सुद्ध आस्तित्व रह जाता है ।
माया-मन कें द्वारा देखा गया आस्तित्व
सत्य -साक्षी के द्वारा देखा गया आअस्तित्व वही राम है ।
जय श्री राम
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