***आसक्ति में सिवाए दुख के कुछ नहीं मिलता।***

***आसक्ति में सिवाए दुख के कुछ नहीं मिलता।***

इस से फर्क नहीं पड़ता कि तुम सोने चांदी के आभूषण पहनो या जा के जंगल के पत्तों के आभूषण बना लो।
आभूषण पहनने की आकांक्षा वाला मन तो वहीं का वहीं है।

मैं मोहक दिखूं ये वासना क्यूं पैदा होती है?
ये इसलिए पैदा होती है कि कोई मुझे मोहक जाने।
कोई मुझ में आकर्षित हो।
कोई मुझ में आसक्त हो।
कोई मुझे पाने योग्य , चाहने योग्य माने।
इसका अर्थ साफ है कि 
तुम किसी को पाने में लगे हो।
तुम किसी को अपने में उलझाने में लगे हो।
संसार में तो ठीक है...
तुम बन संवर के निकलते हो रास्ते पर।
लेकिन भिक्षु बन संवर के निकले तो फिर बात गलत हो गई।
बात इसलिए गलत हो गई कि भिक्षु होने का अर्थ ही यही था कि अब मुझे और आसक्ति के जाल नहीं फैलाने।
बहुत हो चुका।
मैने देख लिया कि आसक्ति में सिवाए दुख के कुछ नहीं मिलता।
और अब मुझ में कोई आसक्त हो, इसकी मैं कोई योजना ना करूंगा।
मुझे लोग देखे, इसकी चेष्ठा ना करूंगा।
मैं ऐसे निकल जाऊंगा जैसे निकला हो नहीं।
कोई मुझे देखे ना, 
कोई मुझ में उत्सुक ना हो।
ऐसे निकल जाऊंगा, जैसे था ही नही।

ऐसे चुपचाप जीने जो लगता है, वही संन्यासी है।

दूसरा मुझे पकड़े,
दूसरा मुझे समझे,
दूसरा मुझ में उत्सुक हो,
दूसरा मुझ से सम्मोहित हो
इसके पीछे वासना ही छिपी है, ताकि मैं दूसरे का भोग कर सकू।

स्त्रियां घर में बैठी रहती हैं,
भूत प्रेत बनी।
घर से बाहर जाती हैं,
खूब बन संवर जाती हैं।
फिर जवान हो जाती हैं।
100% से 90% सौंदर्य तो प्रसाधन से होता है।
10% शायद स्वाभाविक होता हो।
और जो 10% स्वाभाविक होता है ,उसे 90% की जरूरत भी नहीं होती।
कुरूप व्यक्ति ज्यादा सजता संवरता है।
कुरूप स्त्री ज्यादा आभूषणों में रस लेती है।
लेकिन संसार में ठीक है।

शरीर को सुंदर करना पड़ता है क्यूंकि शरीर सुंदर नही है।
कर करके भी सुंदर होता नही है। कभी नही हो सकेगा।
बुद्ध कहते हैं , इस स्तिथि का बोध रखो , ये बोध रहे तो शरीर से तादात्म टूट जाता है।
और तुम उसकी तलाश में निकल जाते हो जो शरीर में छिपा है।
जो परम सुंदर है।
उसे सुंदर करना नही होता,
वो सुंदर है।
उसे जानते ही सौंदर्य की वर्षा हो जाती है।

ठाकुर की कलम से

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