***हम सब यहां जिंदा हैं, कोई भी यहां मरा हुआ नहीं है। हम सब जिंदा हैं। लेकिन जिंदगी का हमको पता क्या है? और अगर हमको पता है, तो बुद्ध और महावीर पागल थे। फिर वे किस जिंदगी को खोज रहे थे?***
***हम सब यहां जिंदा हैं, कोई भी यहां मरा हुआ नहीं है। हम सब जिंदा हैं। लेकिन जिंदगी का हमको पता क्या है? और अगर हमको पता है, तो बुद्ध और महावीर पागल थे। फिर वे किस जिंदगी को खोज रहे थे?***
जीसस से कोई पूछ रहा था कि आपका जन्म कब : हुआ? तो जीसस ने जो उत्तर दिया वह बहुत हैरानी का है। यहूदियों का एक बहुत पुराना पैगंबर हुआ है अब्राहम, जीसस से कोई दो हजार साल पहले। अब्राहम यहूदियों के इतिहास में पुराने से पुराना नाम है। जीसस ने कहा कि अब्राहम था, उसके भी पहले मैं था।
विश्वास नहीं हुआ होगा सुनने वाले को। क्योंकि विश्वास हमें केवल उसी बात का होता है, जिसका हमें अनुभव हो। बात पहेली ही मालूम पड़ी होगी, क्योंकि अब्राहम के पहले जीसस के होने की कोई संभावना नहीं मालूम होती। शरीर तो हो ही नहीं सकता। लेकिन जीसस जैसा आदमी व्यर्थ ही झूठ बोले, यह भी संभव नहीं है।
लाओत्से से किसी ने एक दिन पूछा कि तुम्हारा जन्म कब हुआ? तुम्हारे जन्म की तिथि कौन सी है? तो लाओत्से ने कहा, जहां तक मैं जानता हूं मेरा जन्म कभी नहीं हुआ। और मेरे जन्म के संबंध में अगर दूसरे कहें, तो उनका १ग्रोसा मत करना, क्योंकि अपने जन्म के संबंध में जितना मैं जानता हूं उतना कोई दूसरा नहीं जान सकता। लेकिन हम सब तो दूसरे जो हमें बताते हैं, उस पर भरोसा करते हैं। यह बहुत ही मजाक की बात है लाओत्से ने जो कही। क्योंकि आपको भी अपने जन्म का कोई पता नहीं है, सिवाय दूसरों की बताई हुई बात के। दूसरे कहते हैं कि आप कभी पैदा हुए। समझें कि दूसरे न कहें, समझें कि एक बच्चे को न बताया जाए कि वह कभी पैदा हुआ। तो क्या कोई भी उपाय है कि बच्चा अपनी तरफ से पता लगा ले कि वह पैदा हुआ है? अगर बाहर से सूचना न दी जाए, तो आपको कभी पता भी चलता कि आप कभी जन्मे? और बड़े मजे की बात है, जन्मे आप हैं और सूचना बाहर से दी गई है। और जिन्होंने सूचना दी है, उन्हें भी अपने जन्म की कोई खबर नहीं; उनको भी उनके जन्म की खबर दूसरों ने दी है। और ऐसा ही और भी आगे है।
जन्म एक झूठी बात है, लोकोक्ति है। लोग कहते हैं कि आप पैदा हुए। कोई आदमी कभी पैदा नहीं होता। फिर इसी तरह लोग कहते हैं कि मर गए। जिन्होंने अपना जन्म भी नहीं जाना, वे अपनी मृत्यु कैसे जान सकेंगे? लेकिन जन्म हमें दूसरे बता देते हैं कि कभी पैदा हुए, फलां तिथि, फलां तारीख में। और फिर कोई मरता है चारों तरफ और हम सोचते हैं कि शायद हम भी मरेंगे। दूसरों के मरने की घटना को देख कर हम अपने बाबत भी विचार कर लेते हैं कि हम भी मरेंगे। स्वयं के जन्म की खबर दूसरों से दी गई सूचना और मरना एक अनुमान, इनफरेंस; चूंकि और कोई मरा है, इसलिए मैं भी मरूंगा।
लेकिन जब हम किसी आदमी को मरते देखते हैं, तब हम क्या देखते हैं? सच में हम क्या देखते हैं? दक्षिण में एक संन्यासी था ब्रह्मयोगी। उसने ऑक्सफोर्ड, सन और कलकत्ता विश्वविद्यालय में तीन बार एक बहुत अदभुत प्रयोग किया। उसने मरने का प्रयोग किया। वह दस मिनट के लिए मर जाता था, मर जाता था मेडिकली, जिसे चिकित्सक कह सकें कि मौत हो गई।
कलकत्ता युनिवर्सिटी में जब उसने प्रयोग किया, तो दस बड़े चिकित्सक मौजूद थे। कलकत्ता युनिवर्सिटी के सबसे बड़े चिकित्सक, सर्जन, सब मौजूद थे। और जब ब्रह्मयोगी दस मिनट के लिए मर गया, तो उन दसों ने दस्तखत किए हैं सर्टिफिकेट पर कि यह आदमी मर गया है, इसकी हम गवाही देते हैं। सांस खो गई, हृदय की धड़कनें खो गईं, खून की गति खो गई, मरने की सारी की सारी लक्षणा पूरी हो गई।
दस मिनट बाद वह आदमी वापस लौट आया, और उस आदमी ने कहा कि अगर यह तुम्हारा सर्टिफिकेट सही है, तो मैं वापस नहीं लौट सकता। और अगर मैं वापस लौट आया हूं तो तुमने अब तक जितने मृत्यु के सर्टिफिकेट दिए, सब झूठे थे। क्योंकि इन दो के सिवाय और क्या मतलब होगा?
और उन दस डाक्टरों ने दूसरी बात भी लिख कर दी है और वह लिख कर यह दी है कि जहां तक हम समझते हैं और जहां तक हमारा विज्ञान जानता है, हम समझते हैं कि यह आदमी मर गया था। लेकिन हम अपनी आंखों को तो झूठा नहीं कह सकते, और यह आदमी फिर जिंदा है।
और इस घटना ने सारी दुनिया के चिकित्सकों को चिंता में डाल दिया था। क्योंकि इसका मतलब क्या होता है? जिसको हम मृत्यु कहते हैं, वह कुछ कामों का बंद हो जाना है——श्वास नहीं चलती, खून नहीं बहता, हृदय नहीं धड़कता। अगर जिंदगी इन्हीं चीजों का जोड़ है, तो जरूर मौत इनके बंद हो जाने से घटित हो जाती। लेकिन किसने कहा कि जिंदगी इनका जोड़ है? जिंदगी इससे बहुत बड़ी बात है। जन्म पर जो शुरू होता है, मौत पर बंद हो जाता है। लेकिन न तो जन्म पर जिंदगी शुरू होती है और न मौत पर जिंदगी समाप्त होती है।
लेकिन हम तो अपने शरीर की धड़कन, खून की गति, नाड़ी का चलना, इनको ही अपना होना समझते हैं। इससे बड़ी जटिलता पैदा हो जाती है। इसलिए दो झूठ के बीच हम जीते हैं— —एक जन्म का झूठ और एक मृत्यु का झूठ। पृथ्वी पर इनसे बड़े झूठ नहीं हैं। लेकिन ये सबसे बड़े सत्य मालूम पड़ते हैं, क्योंकि अधिकतम लोग, कहना चाहिए सभी, इन्हें स्वीकार करते हैं। और जो असत्य भी स्वीकृत हो जाता है, वह सत्य मालूम पड़ने लगता है। लेकिन कभी—कभी कोई संदेह पैदा कर देता है। कभी—कभी कोई संदेह पैदा कर देता है।
सिकंदर हिंदुस्तान आया। और जब वह वापस लौट रहा था
तो हिंदुस्तान की सीमा को पार करते समय उसे खयाल आया कि यूनान में उसके मित्रों ने उससे कहा था कि लौटते समय एक संन्यासी को भी ले आना भारत से। और सब तो लाओगे ही, लेकिन धन, हीरे—जवाहरात, मोती, वे सब यूनान में भी हैं, एक संन्यासी भी ले आना।
सिकंदर ने और सब तो लूट की, संन्यासी की याद न रही, आखिरी क्षण में याद आई, तो उसने कहा, जाओ, किसी संन्यासी को पकड़ लाओ।
सिपाही गांव में गए, उन्होंने गांव के लोगों से पूछा। तो गांव के लोगों ने कहा, संन्यासी तो गांव में एक है, लेकिन तुम ले जा सकोगे, इसको हमें उम्मीद नहीं! उन्होंने कहा, इसकी तुम फिक्र छोड़ो। हम सिकंदर के सिपाही हैं। हम अगर पहाड़ों को कहें कि चलो, तो पहाड़ भी चलते हैं। ये नंगी तलवारें देखी हैं? संन्यासी क्या कर सकेगा? उन्होंने कहा, इसीलिए हम चिंतित हैं कि तुम्हारी तलवारें संन्यासी के साथ कुछ कर सकेंगी या नहीं कर सकेंगी! खैर, तुम जाओ, एक कोशिश कर लो।
वे गए। गांव के बाहर नग्न एक संन्यासी तीस वर्षों से नदी के तट पर था। यूनानी इतिहासकारों ने उसका नाम दंदामिस लिखा है। पता नहीं, उसका नाम क्या होगा। यूनानी नाम उन्होंने दंदामिस दिया है। हो सकता है दंडी साधु या ऐसा कुछ, दंडी स्वामी ऐसा कुछ उस आदमी का नाम रहा हो। डंडे वाला साधु, ऐसा कुछ नाम रहा हो। उन सिपाहियों ने जाकर दंदामिस को घेर लिया और उससे कहा कि सिकंदर की आशा है कि हमारे साथ चलो!
वह फकीर नंगा हंसने लगा। उसने कहा कि हमने उसी दिन से आशाएं माननी छोड़ दीं जिस दिन से हम संन्यासी हुए। हम आशाएं तब तक मानते थे, जब तक हम डरते थे। जो नहीं डरता, उससे आशा नहीं मनवाई जा सकती।
पर उन्होंने कहा, तुम्हें पता नहीं है, ये नंगी तलवारें देखते हो, हम तुम्हारी गर्दन काट देंगे!
तो उस संन्यासी ने कहा कि तुम काट दोगे, वह बहुत ठीक है, तुम काट सकते हो। हम कोई एतराज भी न करेंगे। लेकिन तुम्हारे गर्दन काटने से डरेंगे नहीं। क्योंकि गर्दन काटने से केवल वही डरता है, जो गर्दन कटने को मृत्यु समझता है।
ऐसे आदमी के सामने पहली दफा तलवारों पर जंग खा गई! नंगी तलवारें हाथ में थीं, लेकिन हाथ एकदम सुस्त हो गए। जो आदमी ऐसे मरने से राजी हो, इतनी मौज से, उसे मारना बिलकुल बेकार है। और जो आदमी इतनी मौज से मरने को राजी न हो, उसको जिंदा रखना भी बिलकुल बेकार है। लेकिन वह दूसरी बात फिर।
सिकंदर से जाकर उन्होंने कहा कि वह आदमी ले जाया नहीं जा सकेगा। अजीब आदमी है! हमने बहुत लोग देखे——मरने वाले, मारने वाले, लड़ने वाले, भाग जाने वाले। यह कुछ तीसरे तरह का है। न तो वह भागता है, न वह लड़ता है, उसके पास लड़ने को कुछ है नहीं, लेकिन वह भयभीत भी नहीं होता।
सिकंदर ने कहा, मैं खुद चलूंगा। और सिकंदर ने कहा कि हम तुम्हें स्वागत देंगे, सम्मान देंगे, शाही व्यवस्था देंगे——जो तुम चाहोगे देंगे।
उस फकीर ने कहा, तुम कुछ न दे सकोगे, क्योंकि हम कुछ चाहते नहीं हैं।
बहुत बार भिखारी सम्राटों के सामने अपमानित हुए हैं, बहुत बार भिखारी सम्राटों के सामने अपमानित हुए हैं, क्योंकि भिक्षा देने से सम्राटों ने इनकार कर दिया। ये कभी—कभी ऐसे मौके आते हैं कि सम्राट भिखारियों के सामने अपमानित हो जाते हैं, क्योंकि भिखारी कुछ लेने से इनकार कर देते हैं!
उसने कहा, तुम्हारे पास कुछ भी नहीं है, क्योंकि हमें कुछ चाह ही नहीं।
सिकंदर ने कहा, तब भी कोई बात नहीं। चलना तो पड़ेगा ही, अन्यथा यह तलवार तुम्हारी गर्दन पर रखता हूं।
उस फकीर ने कहा, रखो।
सिकंदर ने कहा, तुम नासमझ हो, गर्दन कटेगी और —नीचे गिर जाएगी!
उस संन्यासी ने कहा कि हम संन्यासी उसी दिन हुए, जिस दिन हमने देख लिया कि गर्दन कट जाए और नीचे गिर जाए, तो भी हम नहीं कटते हैं। अन्यथा हम संन्यासी ही नहीं होते। गर्दन गिरेगी तो तुम भी देखोगे कि गर्दन गिर रही है और मैं भी देखूंगा कि गर्दन गिर रही है। हालांकि तुम मुझे न देख पाओगे। मैं तुम्हें देखता रहूंगा।
सिकंदर ने अपने इतिहासकारों को कहा है कि लिख ली जाए यह बात— —संन्यासी नहीं ले जाया जा सका। क्योंकि आखिरी उपाय था कि मौत से डरा दिया जाए।
जन्म और मृत्यु हमारी जिंदगी के छोर हैं, इसलिए हमारे पास जिंदगी जैसी कोई चीज नहीं है। सिर्फ जिंदगी का एक भ्रम! ऐसा लगता है कि जी रहे हैं! जन्म से मौत की तरफ सरक जाते हैं और ऐसा लगता है कि जी लिए हैं। एक क्षण भी जिंदगी की किरण नहीं फूटती, और एक क्षण भी जिंदगी के फूल नहीं खिलते, और एक क्षण भी जिंदगी का संगीत नहीं बजता, और एक क्षण भी पता नहीं चलता कि हम क्या थे, क्या हैं। इस क्षण भी पता नहीं है।
हम सब यहां जिंदा हैं, कोई भी यहां मरा हुआ नहीं है। हम सब जिंदा हैं। लेकिन जिंदगी का हमको पता क्या है? और अगर हमको पता है, तो बुद्ध और महावीर पागल थे। फिर वे किस जिंदगी को खोज रहे थे? और अगर हमें पता है, तो फिर ये कृष्ण और क्राइस्ट, ये किस जिंदगी को खोज रहे थे? या तो जिसे हम जिंदगी कहते हैं वह जिंदगी नहीं है, और या फिर ये कृष्ण, क्राइस्ट, बुद्ध, महावीर विक्षिप्त हैं, पागल हैं। हम बुद्धिमान हैं!
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