**रविन्द्रनाथ और गीतांजलि**

**रविन्द्रनाथ और गीतांजलि**

समझ उपाय नहीं। दीवानगी! कहो नासमझी! ज्ञान मार्ग नहीं, कहो अज्ञान, निर्दोष भाव! छोटे बच्चे की भांति आश्चर्य-विमुग्ध होकर देखोगे, तो परमात्मा है। तर्क-विक्षुब्ध होकर देखोगे, परमात्मा नहीं है। तर्क का चश्मा चढ़ाया कि परमात्मा एकदम विदा हो जाता है संसार से। तर्क का चश्मा उतारो, प्रीति की जरा आंख खोलो और तुम पाओगे: चारों तरफ वही-वही!

रवींद्रनाथ ने गीतांजलि लिखी। उस अदभुत गीत-संग्रह पर उन्हें नोबल प्राइज मिली। बड़ा सम्मान हुआ। पहले जो लोग गाली देते थे, उन्होंने भी सम्मान किया। रवींद्रनाथ के बड़े विरोधी थे बंगाल में। कुछ आदमी अजीब ही है! रवींद्रनाथ ने किसी का कुछ बिगाड़ा नहीं था, मगर बड़े विरोधी थे!र् ईष्या, जलन, हजार उपद्रव खड़े होते। लेकिन नोबल प्राइज मिलते ही बड़े सम्मान होने लगे। जगह-जगह समारोह, आयोजन, फूलमालाएं।

लेकिन एक आदमी रवींद्रनाथ के पड़ोस में रहता था, एक बूढ़ा आदमी। उसने नहीं किया सम्मान। वह तो एक दिन आया–उससे रवींद्रनाथ थोड़े डरते भी थे; उसकी आंखों में कुछ ऐसा था; वह ऐसे देखता था जैसे कि आंख कटार हो, कि भीतर तक भेद जाए; उस आदमी में कुछ बात थी–उसने आकर फिर रवींद्रनाथ की आंखों में देखा और कहा, कुछ नहीं, सब बकवास है! तुमने ईश्वर देखा है? चले ईश्वर की बात करने! मिल गई नोबल प्राइज!…क्योंकि गीतांजलि तो ईश्वर के गीत हैं, और बड़े प्यारे गीत हैं!…तुमने देखा है ईश्वर?

रवींद्रनाथ ऐसे व्यक्ति भी न थे कि झूठ बोलें। इसलिए यह भी नहीं कह सकते थे–देखा है। और उस आदमी की आंखों को धोखा देना था भी मुश्किल। वह यह कह कर चला गया कि पहले देखो, फिर लिखना ये गीत! जब देखोगे, तब मैं स्वीकार करूंगा। गीत-वीत लिखने से कुछ भी नहीं होता। यह तो कोई भी लिख लेता है। हां, तुम अच्छे कवि हो, मगर अभी ऋषि नहीं हो। भूल मत जाना! ये सम्मान, समारोह, ये फूलमालाएं, यह जगह-जगह आदर-सत्कार…भूल मत जाना! याद दिलाने आता रहूंगा।

और वह याद दिलाने आता था। वह याद कोई अच्छी नहीं दिलाता था, रवींद्रनाथ को बुरा लगता था। रास्ते पर मिल जाता तो हाथ पकड़ कर बीच रास्ते पर याद दिला देता था–भूल मत जाना! फूलमालाओं में बहुत भूल गए हैं। देख कर ही रहना! देखो, तब मानूंगा।

उससे रवींद्रनाथ बचने लगे। कहीं जाना होता तो दूसरे रास्ते से जाते, ताकि उसका घर न पड़े। वह आता घर तो इनकार करवा देते कि घर पर नहीं हैं।

फिर एक दिन सुबह एक घटना घटी। रात वर्षा हुई थी। और जगह-जगह रास्ते के किनारे पानी के डबरे भर गए थे। और सुबह-सुबह रवींद्रनाथ सागर की तरफ घूमने गए। सागर में सूरज को ऊगते देखा। बड़ा सुंदर प्रभात था। सुबह का सन्नाटा, सागर की नमकीन हवा, रात भर की नींद की ताजगी, पक्षियों का उड़ना, सूरज का ऊगना–एक क्षण को रवींद्रनाथ स्तब्ध बंधे रह गए। उस घड़ी में विचार सरक गए, बुद्धि सरक गई। उस घड़ी में हृदय से कुछ नाता बना। उस घड़ी में सूरज ने जैसे हृदय को छू लिया। जैसे सूरज की किरणों ने हृदय के साथ छेड़खान कर दी। थोड़ा रंग भीतर छिटक गया। आनंदमग्न लौटते थे, कि वही सूरज रास्ते के किनारे भरे डबरों में भी दिखाई पड़ा; और जब-जब जहां-जहां डबरों में सूरज दिखाई पड़ा, फिर-फिर वही भनक, फिर-फिर वही मस्ती आ गई, बार-बार आती रही।

और तभी अचानक वह आदमी रास्ते पर मिल गया। आज उस आदमी को देख कर मन में कोई विरोध नहीं उठा, तिरस्कार नहीं उठा, बचने का भाव नहीं उठा। खुद पर भरोसा न आया! भाव उठा उसे आलिंगन में लगा लेने का। और जाकर उस आदमी को गले लगा लिया। और वह बूढ़ा मुस्कुराया, रवींद्रनाथ की आंखों में देखा और कहा कि अब मुझे स्वीकार है। आज कुछ हुआ। आज तुम्हारे भाव आंदोलित हुए हैं। आज तुम्हारी हृदयतंत्री बजी है। स्वागत! धन्यवाद! मैं इस दिन की प्रतीक्षा में था। वह जो तुमने गीतांजलि लिखी है, सब बुद्धि का ही विलास है। मगर आज कुछ हुआ। आज तुम्हारा रंग और, ढंग और। आज तुम्हारी गंध और। आज तुम्हारी तरंग और।

और रवींद्रनाथ ने कहा है कि नोबल प्राइज पाकर मुझे जो आनंद न मिला था, उस दिन उस आदमी की इस बात से मुझे आनंद मिला। उसकी आंखों ने मेरे ऊपर अमृत की वर्षा कर दी।

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