लिखी गई सभी आत्म कथाएं वास्तव में आत्म कथाएं नहीं हैं। हो भी नहीं सकतीं क्योंकि जब आत्मा को जाना ही नहीं तो आत्म कथा कैसी। असल में आत्मा को जानने के बाद कोई आत्म कथा नहीं होती। इसलिए लिखी गई सब आत्म कथाएं अहंकार कथाएं हैं। ये सब एगो-ग्राफी हैं। इसे अहम-कथा कहा जा सकता है।
इसलिए यह बड़े मजे की बात है कि जीसस ने आत्म कथा नहीं लिखी, कृष्ण ने नहीं लिखी, बुद्ध ने नहीं लिखी, महावीर ने नहीं लिखी। आत्म-कथ्य जो है वह इस जगत में अभी तक उस आदमी ने नहीं लिखा जिसने आत्मा जानी है, क्योंकि आत्मा को जानने के बाद वह ऐसे निराकार में खो जाता है कि जिन्हें हम तथ्य कहते हैं वे सब उखड़ कर बह जाते हैं। जिनको हम खूंटियां कहते हैं- यह जन्म हुआ, यह यह हुआ, वह सब उखड़ कर बह जाते हैं। इतना बड़ा अंधड़ है आत्मा का आना कि उस आंधी के बाद जब वह देखता है तो पाता है कि सब साफ ही हो गया है। वहां कुछ बचा ही नहीं। कोरा कागज हो जाता है। आत्म कथा लिखने का जो रस है वह आत्मा जानने के पहले है। बाद में नहीं।
इसलिए राजनीतिज्ञ आत्म कथा लिखेंगे। साधू आत्म कथा लिखेंगे (जिन्होंने आत्मा नहीं जानी)। लेखक, कवि, साहित्यकार आत्म कथा लिखेंगे। ये आत्मकथाएं बहुत गहरे में 'मै' की ही सजावटें हैं।
और 'जाग गया आदमी' लिख सकता है-कठिन है मामला। क्योंकि जागते से ही पता चलता है कि सपना था, उसको लिखने योग्य भी कुछ नहीँ बचता। अनुभव की बात रह जाती है; जो जाना है वह भी नहीँ लिखा जा सकता। वह नहीँ लिखा जा सकता, इसलिए कि लिखते ही बहुत फीका और बेमानी हो जाता है। ये सब उसको ही कहने की कोशिश चलती है निरंतर, बहुत बहुत मार्गो से, बहुत बहुत विधियों से, फिर भी अभी तक कहा नहीं जा सका है जो जाना गया है।
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