तुम सीखने की ज्यादा दौड़ में मत पड़ना, उसमें तुम वंचित हो जाओगे। सत्य का एक कड़ी भी कान में पड़ गई, एक शब्द भी हृदय तक उतर गया, तो वही बीज बन जाएगा–फूटेगा, वृक्ष बनेगा, तुम अनंत सुगंध से भर जाओगे। सत्य के एक बीज में सबकुछ छुपा है।

मैंने एक दिन नसरुद्दीन को पूछा कि बहुत दिन से तुम्हारे बच्चे नहीं दिखाई पड़ते?

उसने कहा, मैं तो परिवार-नियोजन में भरोसा करता हूं।

मैं थोड़ा हैरान हुआ, क्योंकि उसके सत्रह बच्चे हैं! और वह कहता है, मैं परिवार-नियोजन में भरोसा करता हूं। मैंने कहा, मैं समझा नहीं, तुम्हारा मतलब क्या है?

उसने कहा, मैं तो परिवार-नियोजन वालों की इस बात में भरोसा करता हूं: कि दो या तीन बच्चे, होते हैं घर में अच्छे। तो बाकी को मैं मोहल्ले-पड़ोस में खेलने-खाने को भेज देता हूं। उनमें से अधिकतर तो वहीं सोने भी लगे हैं। घर में मैं दो त्तीन बच्चे से ज्यादा नहीं रखता।

दो या तीन बच्चे, होते हैं घर में अच्छे! तो पड़ोसियों के घर में भेज देता है। सिद्धांत को पूरा कर रहा है। तुम्हारी शास्त्र से जो समझ है, बस वह ऐसे ही पूरी होती है। बच्चे पैदा करने से तुम नहीं रुकते, बच्चों को पड़ोसियों की छाती पर सवार कर देते हो। तरकीब आदमी निकाल लेता है।

सिद्धांत से बचना बड़ा सुगम है, समझ भर से बचना संभव नहीं है। सिद्धांत के पास से गुजर कर निकला जा सकता है; क्योंकि सिद्धांत तो मुर्दा है, तुम जिंदा हो। सिद्धांत तुम्हारा पीछा नहीं कर सकता; तुम सिद्धांत से अपनी चादर बचा कर निकल सकते हो। सिद्धांत क्या करेगा? पत्थर का टुकड़ा है! लेकिन समझ से बच कर तुम कहां जाओगे? समझ तुम्हारे भीतर है; तुम कहीं भी भागोगे, तुम्हारे साथ होगी।

इसलिए इस जोर को खयाल में ले लो। सिद्धांत पर बहुत जोर मत देना, समझ पर जोर देना। सिद्धांत उधार मिल सकता है, समझ खुद पैदा करनी होती है।

महाभारत में कथा है कि द्रोण ने सोचा था कि इन सारे पांडवों और कौरवों में युधिष्ठिर सबसे ज्यादा बुद्धिमान मालूम होता है। लेकिन थोड़े दिनों के अनुभव से लगा कि वह तो बिलकुल बुद्धू है। दूसरे बच्चे तो आगे जाने लगे, नया-नया पाठ रोज सीखने लगे और युधिष्ठिर पहले पाठ पर ही रुका रहा। आखिर द्रोण की सीमा-क्षमता भी समाप्त हो गई। द्रोण ने पूछा, तुम आगे बढ़ोगे कि पहले ही पाठ पर रुके रहोगे? लेकिन युधिष्ठिर ने कहा, जब तक पहला पाठ समझ में न आ जाए, तब तक दूसरे पाठ पर जाने से सार भी क्या है?

पहला पाठ था सत्य के संबंध में। दूसरे बच्चों ने याद कर लिया, पढ़ लिया, आगे बढ़ गए। लेकिन युधिष्ठिर ने कहा कि मैं जब तक सत्य बोलने ही न लगूं, तब तक दूसरे पाठ पर जाऊं कैसे? और आप जल्दी मत करें। तब द्रोण को समझ में आया। खुद युधिष्ठिर की इस मनोदशा को देख कर द्रोण को पहली दफा समझ में आया कि सत्य के आगे और पाठ हो भी क्या सकता है! तब उन्होंने कहा, तू जल्दी मत कर। तू पहला पाठ ही पूरा कर ले तो सब पाठ पूरे हो गए। फिर दूसरा पाठ और है कहां? अगर सत्य बोलना ही आ गया, सत्य होना आ गया, तो फिर और पाठ की कोई जरूरत नहीं है। लेकिन पाठ अगर सिर्फ पढ़ने हों, तब एक बात है; पाठ अगर जीने हों, तो बिलकुल दूसरी बात है। अंत में महाभारत में कथा है कि जब सारे भाई स्वर्गारोहण के लिए गए, तो एक-एक गिरने लगा, पिघलने लगा, गलने लगा; स्वर्ग के मार्ग पर धीरे-धीरे एक-एक गिरने लगा, द्वार तक सिर्फ युधिष्ठिर पहुंचे और उनका कुत्ता पहुंचा। सत्य पहुंचा; और सत्य का जिसने गहरा सत्संग किया था, वह पहुंचा। वह कुत्ता था उनका। वह सदा उनके साथ रहा था। उसकी निष्ठा अपार थी। भाइयों की भी निष्ठा इतनी अपार न थी। भाई भी रास्ते में गल गए, कुत्ता न गला। उसकी श्रद्धा अनन्य थी। उसने कभी संदेह किया ही न था। उसने युधिष्ठिर के इशारे को ही अपना जीवन समझा था। युधिष्ठिर भी चकित हुए कि भाइयों का भी साथ छूट गया, वे भी गिर गए मार्ग पर, स्वर्ग के द्वार तक न आ सके–आ सका एक कुत्ता!

द्वार खुला, युधिष्ठिर का स्वागत हुआ, लेकिन द्वारपाल ने कहा, कृपया आप ही भीतर आ सकते हैं, कुत्ता न आ सकेगा। कुत्ता कभी इसके पहले स्वर्ग में प्रवेश भी नहीं पाया। आदमी ही मुश्किल से पाते हैं।

तो युधिष्ठिर ने कहा, फिर मैं भीतर न आ सकूंगा; जिस कुत्ते ने मेरा इतने दूर तक साथ दिया, जहां मेरे भाई भी मेरे साथी न हो सके, संगी न हो सके; जिसकी श्रद्धा ऐसी अनन्य है; जो मेरे साथ इतने दूर आया, उसका साथ मैं न छोड़ सकूंगा; अन्यथा मैं कुत्ते से भी गया-बीता हुआ। जिसने मेरा साथ दिया, उसका साथ मैं दूंगा, द्वार तुम बंद कर लो।

तब सारा स्वर्ग हंसने लगा; भीड़ इकट्ठी हो गई देवताओं की और उन्होंने कहा, आप भीतर आएं। और तब गौर से देखा युधिष्ठिर ने, तो कुत्ता न था, स्वयं विष्णु थे! वह परीक्षा थी। वह परीक्षा थी, अगर युधिष्ठिर उस समय कुत्ते को भूल जाते और भीतर प्रवेश कर देते तो स्वर्ग चूक जाता। वह परीक्षा थी–प्रेम की, श्रद्धा की, अनन्य भाव की।

एक ही पाठ युधिष्ठिर ने सीखा–सत्य। उतना काफी हुआ; उतना स्वर्ग तक ले जा सका। अर्जुन को सीखने में बड़ी देर लगी। पूरी गीता कृष्ण ने कही, तो भी संदेह उठते चले गए। युधिष्ठिर ने सिर्फ एक पाठ सीखा जीवन में, वह छोटा सा पाठ था सत्य का। गुरु तक को शक हुआ कि यह थोड़ा मंद बुद्धि मालूम होता है, पहले ही पाठ पर अटका है। लेकिन फिर समझ में आया कि पहले पाठ के आगे और पाठ कहां हैं!

जिसने एक पाठ भी सीख लिया, उसने सब सीख लिया। तुम सीखने की ज्यादा दौड़ में मत पड़ना, उसमें तुम वंचित हो जाओगे। किंचित भी–किंचिदधीता–जरा सा भी बोध परमात्मा का आ गया, परमात्मा का गीत थोड़ा सा भी सुनाई पड़ गया, एक कड़ी भी कान में पड़ गई, एक शब्द भी हृदय तक उतर गया, तो वही बीज बन जाएगा–फूटेगा, वृक्ष बनेगा, तुम अनंत सुगंध से भर जाओगे। एक बीज में सब कुछ छिपा है।
ठाकुर की कलम से

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