#OneStepThinking
डॉ थॉमस सॉवेल ने अपनी पुस्तक "Applied Economics" में एक कहानी बताई है -
जब वे हॉवर्ड में अंडरग्रेजुएट स्टूडेंट थे तो इकोनॉमिक्स की एक क्लास में प्रोफेसर आर्थर स्मिथीज ने किसी इकोनॉमिक पॉलिसी पर कोई प्रश्न किया। युवा टॉम ने खूब उत्साह और कन्विक्शन से अपना ऑपिनियन दिया कि उक्त पॉलिसी क्यों लाभदायक होगी। उन्होंने फिर आगे पूछा - और उसके बाद क्या होगा?
जब टॉम सॉवेल ने उसके आगे के परिणामों की चर्चा की तो उन्हें उतना फेवरेबल नहीं पाया। फिर प्रोफेसर ने आगे पूछा - और उसके बाद? तो इस तरह से जैसे जैसे आगे के परिणामों की एनालिसिस की गई, उनके फाइनल या दीर्घकालिक परिणाम शॉर्ट टर्म परिणामों के बिल्कुल विपरीत दिखाई दिए.. और शिक्षा की इस सिम्पल एक्सरसाइज ने हमें एक थॉमस सॉवेल दिया।
लेकिन ज्यादातर लोग फर्स्ट स्टेप से आगे नहीं सोचते। उन्हें एक समस्या बताई जाती है, उसे क्राइसिस बनाकर दिखाया जाता है और आप उसके नी-जर्क समाधान में जुट जाते हैं..जब महँगाई बढ़ती है तो उत्पादन बढ़ाने के बदले प्राइस कन्ट्रोल का उपाय सुझाया जाता है। उसका सेकंड स्टेज यह होता है कि वह वस्तु बाजार से गायब हो जाती है, और थर्ड स्टेज यह होता है कि वह ब्लैक में पहले से भी अधिक कीमत पर बिकने लगती है। पर पॉलिटिकल जरूरत होती है कि कुछ करते हुए दिखा जाए और इसलिए पॉलिटिशियन्स हमेशा प्राइस कन्ट्रोल का रास्ता लेते हैं।
यह वन-स्टेज थिंकिंग हमेशा हर बात में दिखाई देती है। कल कुछ प्रबुद्ध महिलाओं ने मैरिटल रेप को एक समस्या चिन्हित करते हुए कोर्ट द्वारा इसके विरुद्ध कानून बनाये जाने का समर्थन किया। यह वन स्टेप थिंकिंग है। स्टेज टू क्या होगा? सचमुच में इसकी पीड़ित कोई महिला घर और परिवार के फ्रेमवर्क को छोड़कर कोर्ट शायद करोड़ों में कोई एक जाए। लेकिन कोर्ट में इस कानून के तहत जितने केस भी दर्ज होंगे, उनमें से 99.99% दुर्भावना से प्रेरित और फर्जी होंगे। आज कोई भी तलाक का केस अकेला तलाक का केस नहीं होता, साथ में दहेज-उत्पीड़न का केस जुड़ा होता है जो हार्ड बार्गेनिंग के लिए इस्तेमाल होता है। कल को उसमें यह रेप का केस भी जुड़ जाएगा।
स्टेज 3 क्या होगा? जब दो पार्टीज के बीच के कॉन्ट्रैक्ट में कानून पक्षपाती हो जाता है तो न्याय किसे मिलता है? किसी को नहीं। क्योंकि तब दूसरा पार्टी ऐसे कॉन्ट्रैक्ट में पड़ता ही नहीं है। जब सरकार ने कानून बना कर इंडस्ट्री और वर्कर के बीच वर्कर के पक्ष में पक्षपात करना शुरू किया तो क्या हुआ? क्या वर्कर्स को पहले से अधिक मिलने लगा? नहीं, इंडस्ट्री वहाँ से चली गयी...अधिक सैलरी माँगने वाले वर्कर्स बेरोजगार हो गए।
जब पुरुष-स्त्री के सम्बन्धों में कानून बीच में घुस कर स्त्री के पक्ष से पक्षपात करने लगेगा तो पुरुष क्या करेगा? वह विवाह के सम्बन्ध में कदम रखने से डरेगा, तो परिवार नाम की संस्था टूट जाएगी या बनेगी ही नहीं, और ऑन नेट बैलेंस, विवाह का इंस्टिट्यूशन जो कुल मिला कर स्त्री के एम्पॉवरमेंट और सुरक्षा का सबसे बड़ा टूल है, उसके टूटने का सबसे अधिक नुकसान किसे होगा? स्त्री आज भी विवाह में अधिक सुरक्षित है। जो स्त्रियाँ अकेली रह रही हैं वे अधिक वल्नरेबल हैं, अधिक हिंसा की शिकार हैं। यह कानून जो स्त्रियों को और अधिक सुरक्षा देने के नाम पर लाया जा रहा है, वह कल को उन्हें और असुरक्षित बना देगा।
यह कानून बनाया ही गया है दुरुपयोग करने के लिए। यह सिद्ध करने का कोई तरीका नहीं है कि विवाह में किस दिन संबंध सहमति से बनाये गए और किस दिन बिना सहमति के। तो बेशक यह कानून एकतरफा इस्तेमाल और पक्षपात के लिए बनाया जा रहा है। यानि वह क्लासिक वामपन्थी टेक्निक इस्तेमाल हो रही है। जिस तरह ट्रेड यूनियनिज्म ने इंडस्ट्री को मारा, यह कानून विवाह और परिवार की हत्या के लिए इस्तेमाल होगा।
इसलिए वन-स्टेप थिंकिंग से बाहर निकलें, क्योंकि हमारा मुकाबला जिनसे है उन्होंने सारे स्टेप सोच रखे हैं। उनका इरादा, उनका गोल ही है स्टेज 3, यानि परिवार की हत्या, समाज की दासता और स्त्री का शोषण।
#MaritalRape
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