हम सभी चाहते हैं
एक मजबूत औरत....!!
लेकिन
जैसे हीं
वो अपने पंख पसारने लगती है
जब
अपनी मर्ज़ी से ज़ुबाँ खोलती है
सवाल पूछती है
हमसे... हमारे रीवाज़ों से
हमारी लगाई बंदिशों से
तब वो लगने लगती है
पागल... बेवफा..... चरित्रहीन
हम चाहते तो हैं एक मजबूत औरत
लेकिन सिर्फ अपने ख्यालों में
हम आज़ाद औरत का अक्स सोच तो सकते हैं
लेकिन आज़ादी नहीं दे सकते
बेच चुके हैं उस औरत के हिस्से का अम्बर
जहाँ पंख पसारना चाहती है वो
ये एक दिन मे नहीं हुआ
एक इंसान ने नही किया
सिर्फ मर्द या औरत ने नहीं किया
ये पूरे समाज ने मिल कर किया
हम नहीं चाहते की औरत आज़ाद हो
लेकिन
हमे पसंद बहुत है आज़ाद औरत ☺☺
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