"धर्म की शुरुआत"


          "धर्म की शुरुआत"
                      
"सत्संग प्रेमियों", महापुरुषों के वचन हैं कि जहां तुम झुक सको, वहीं पर धर्म की शुरुआत है। मंदिर में जाकर तो हम सभी झुकते हैं। लेकिन किसी के पास सहज स्वभाव ही झुकना हो जाए, तो समझ लेना कि वहां भी मंदिर है। जिसके भी पास झुकना बिना प्रयास के ही सहजता से हो जाए ; जहां पर झुकना आनंद पूर्ण हो जाए ; वहां पर तुम्हें प्रेम की पहली खबर मिलेगी । वहां तुम्हें पहली बार पता चलेगा कि प्रेम एक दान है। दान वस्तुओं का नहीं, धन का भी नहीं। प्रेम स्वयं का दान है, प्रेम अपना समर्पण है जी प्रेमियों ।
       यह ध्यान रहे कि प्रेम में मांग नहीं होती। जहां मांग है, वहां प्रेम धोखा है, कलह है। अगर गुरु से भी तुम्हारी मांग है कि मुझको समाधि मिले, चोला या परमात्मा मिले, तो वह तुम गुरु से सौदा कर रहे हो। फिर तुम्हें गुरु से प्रेम की समझ ही नहीं आई। गुरु के पास कभी भी कोई मांग नहीं होती। गुरु को तो तुम धन्यवाद ही दे सकते हो कि उसने तुम्हारे समर्पण को स्वीकार कर लिया, तुम्हें अपनी चरण शरण से जोड़ लिया। जहां समर्पण है, वहां समाधि भी है। गुरु से कुछ भी पाने को लेकर विचार करने की जरूरत ही नहीं है । यह सोचना ही नहीं कि मुझे कोई सुविधा मिलनी असंभव ना हो जाए । ऐसा विचार करने का मतलब साफ है कि तुम्हारे भीतर गुरु के लिए समर्पण भावना है ही नहीं । फरमाते हैं कि जहां भी मांग आती है, वहां पर तुम छोटे हो जाते हो । जहां पर मांग नहीं होती, वहां सिर्फ दान होता है | दान देकर तुम विराट हो जाते हो  जी गुरमुखों ।
       महापुरुषों के वचन हैं कि परमात्मा तो तुम में ही छिपा है । वह तुम्हारी मांगों व वासनाओं के बादलों में घिरा हुआ है । तुम्हारे हिस्से का सूरज मिटा नहीं है, वह सिर्फ बादलों की ओट में छिपा हुआ है । तुम्हारी मांगों और वासनाओं के बादल जैसे ही छंट जाएंगे, तो तुम यह पाओगे कि सूरज तो सदा से ही मौजूद था । तब स्वयं का समर्पण करते ही तुम पाओगे कि सतगुरु का आशीर्वाद तो सदा से ही मौजूद था और है । सिर्फ मैं ही सतगुरु के वचनों नियमों का दिल से पालन नहीं कर पाया।
सत्संग व प्रेम बांटने से अवश्य बढ़ते हैं ।
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              🚩 जय श्री कृष्णा🚩

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