"अगर गुलाब की आकांक्षा है तो काँटों की तैयारी भी चाहिए।"

"अगर गुलाब की आकांक्षा है तो काँटों की तैयारी भी चाहिए।"
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"गुलशन—परस्त हूं मुझे गुल ही नहीं अजीज कांटों से भी निबाह किए जा रहा हूं मैं"
  
अगर तुम सच में ही फूलों के प्रेमी हो, तो तुम कांटों से भी निबाह करना सीख लोगे।" गुलशन—परस्त हूं—फूलों का प्रेमी हूं; मुझे गुल ही नहीं अजीज—और मुझे फूल ही प्यारे हैं, ऐसा नहीं है।"
     
कांटों से भी निबाह किए जा रहा हूं मैं
    
करना ही होगा। निबाह कहना भी शायद ठीक नहीं; निबाह में ही थोड़ी सी अड़चन आ गई है जैसे।

निबाह किए जा रहा हूं मैं—किसी तरह झेले जा रहा हूं। नहीं, वह बात भी ठीक नहीं है। काटों से भी उतना ही प्रेम करना होगा, जितना फूलों से।

अगर तुमने काटों से प्रेम न किया तो तुम आज नहीं कल प्लास्टिक के फूल खरीद लाओगे, क्योंकि उन्हीं में काटे नहीं होते।

कागज के फूल खरीद लाओगे, क्योंकि उनमें कांटे नहीं होते। असली फूल, अगर गुलाब की आकांक्षा है तो काँटों की तैयारी भी चाहिए।
    

कांटें उतने ही जीवन का अनिवार्य अंग हैं, जितने फूल। अंधेरा उतना ही जरूरी है, जितना प्रकाश। रात उतनी ही आवश्यक है, जितना दिन।

मौत उतनी ही जरूरी है, जितना जन्म। मित्रों और शत्रुओं के बीच थपेड़े खा—खाकर ही तुम्हारे भीतर के चैतन्य का आविर्भाव होता है।
     

अगर तुमने जिद की कि हम तो एक को ही पकड़कर जीएंगे, तो तुम ऐसे आदमी हो जो जिद कर रहा है कि हम एक ही पैर से चलेंगे।

तुम ऐसे आदमी हो जो जिद कर रहा है, हम एक ही पंख से उड़ेंगे। तुम ऐसे आदमी हो जो जिद कर रहा है, हम एक ही पतवार से अपनी नाव खे लेंगे। 
     
कभी एक ही पतवार से नाव खेकर देखी? न देखी हो तो जरूर नदी पर जाकर देखना; उससे बड़ा अनुभव होगा।

जब तुम एक ही पतवार से नाव खेओगे, वह गोल—गोल चक्कर लगाने लगेगी। जाएगी कहीं नहीं, चक्कर बहुत लगाएगी। ऐसी ही तुम्हारी जिंदगी है।

जाती कहीं नहीं, होता कुछ भी नहीं, चक्कर ही चक्कर! कोल्हू के बैल की तरह घूमे चले जाते हो। दोनों पतवारें चाहिए। दोनों पतवारों के बीच नाव तीर की तरह चलने लगती है।
     

और ध्यान रखना, "बुद्ध कहते हैं कि आलोचक, विरोधी, निंदक की संगति से कल्याण ही होता है, अकल्याण कभी नहीं होता।"
     

क्योंकि निंदा कभी तुम्हारे अहंकार: का तो भोजन बन ही नहीं सकती।

जहर बन सकती है—बनेगी; अहंकार को मार डालेगी, तुम्हें विनम्र करेगी, तुम्हें नबाएगी झुकाकी, तुम्हें ज्यादा समझदार करेगी, लेकिन अहंकार को नहीं भर सकती।

इसलिए सदा कल्याण है। क्योंकि अहंकार ही एकमात्र अकल्याण है। प्रशंसा से खतरा हो सकता है, तुम और अकड़ जाओ। निंदा से कोई भी खतरा नहीं है।
     

और कैसे हम पागल हैं कि प्रशंसक की तलाश करते हैं! कैसे हम पागल हैं! जीवनभर हम यही खोज करते हैं कि कोई मिल जाए, जो हमारी प्रतिमा को सजा दे संवार दे।

कोई मिल जाए, जो हमारे ऊपर प्रशंसा के इत्र छिड़क दे। कोई मिल जाए जिसमें हम अपने को झांककर सुंदर पा सकें।

कोई ऐसा दर्पण, जो हमारे सौंदर्य को झलका दे। चाहे हम सुंदर हों या न हों, हम दर्पण पर निर्भर हैं। दर्पण बता दे कि सुंदर, तो बस ठीक।
    
हम दूसरों की आंखों में झांक रहे है—अपनी गरिमा के लिए, अपने गौरव के लिए।

और गौरव केवल उसी का है, जो अपने भीतर झांकता है। गरिमा केवल उसी की है, जो अपने भीतर झांकता है।

🙏•🏵️{{जय श्री कृष्णा}}🏵️•🙏

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