***तुम देखते हो, #हिंदू बड़ी अद्भभुत कौम है। उसने परमात्मा को एक नाम दिया है, हरि। #हरि का अर्थ होता है : लुटेरा--जो लूट ले, हर ले, छीन ले, चुरा ले। दुनिया में किसी जाति ने ऐसा प्यारा नाम परमात्मा को नहीं दिया है #हरण कर ले।***

🙏🏼🌺 हरी हरण रहस्य 🌺🙏🏼

तुम देखते हो, #हिंदू बड़ी अद्भभुत कौम है। उसने परमात्मा को एक नाम दिया है, हरि। #हरि का अर्थ होता है : लुटेरा--जो लूट ले, हर ले, छीन ले, चुरा ले। दुनिया में किसी जाति ने ऐसा प्यारा नाम परमात्मा को नहीं दिया है। #हरण कर ले। 

लुटने की भी कला होती है। लुटने के भी ढंग होते हैं, शैली होती है। लुटने का भी शास्त्र होता है। तुम गलत जगह लुटे। तुम गलत लुटेरों से लुटे।

लुटना हो तो परमात्मा के हाथों लुटो। छोटी-छोटी बातों में लुट गए! चुल्लू-चुल्लू पानी में डूब कर मरने की कोशिश की, मरे भी नहीं, पानी भी खराब हुआ, कीचड़ भी मच गई, अब बैठे हो। अब तुमसे मैं कहता हूं, डूबो सागर में। तुम कहते हो, हमें डूबने की बात ही नहीं जंचती क्योंकि हम डूबे कई दफा। डूबना तो होता ही नहीं, और कीचड़ मच जाती है। वैसे ही अच्छे थे। चुल्लू-भर पानी में डूबोगे तो कीचड़ मचेगी ही। सागरों में डूबो। सागर भी हैं। 

मेरी मायूस मुहब्बत की हकीकत मत पूछ 
दर्द की लहर है अहसास के पैमाने में 

तुम्हारा प्रेम तो सिर्फ एक दर्द की प्रतीति रही। रोना ही रोना हाथ लगा, हंसना न आया। आंसू ही आंसू हाथ लगे। आनंद, उत्सव की कोई घड़ी न आई। 

लेकिन संसार के दुःख का हासिल ही यही है कि दुःख ही हाथ आता है। 

दुःख और दर्द के सिवा कुछ भी नतीजा नहीं है। 
लाख तदबीर किया कीजे हासिल है वही 

यहां से कोशिश करो, वहां से कोशिश करो, इसके प्रेम में पड़ो, उसके प्रेम में पड़ो, सब तरफ से हासिल यही होगा। अंततः तुम पाओगे कि हाथ में दुःख के अतिरिक्त और कुछ भी नहीं है। राख के सिवा कुछ भी हाथ में नहीं रह गया है। धुआं ही धुआं! 

लेकिन मैं तुमसे उस लपट की बात कर रहा हूं जहां धुआं होता ही नहीं। मैं तुमसे उस जगत की बात कर रहा हूं जहां आग जलाती नहीं, जिलाती है। मैं भीतर के प्रेम की बात कर रहा हूं। मेरी भी मजबूरी है। शब्द तो मुझे वे ही उपयोग करने पड़ते हैं, जो तुम उपयोग करते हो। अगर मैं ऐसे शब्द उपयोग करूं जो तुम उपयोग नहीं करते तो बात ही न हो सकेगी। और अगर ऐसे शब्द उपयोग करता हूं जो तुम भी उपयोग करते हो तो मुश्किल खड़ी होती है। क्योंकि तुमने अपने अर्थ दे रखे हैं। 

जैसे ही तुमने सुना शब्द "प्रेम", कि तुमने जितनी फिल्में देखी हैं, उनका सब सार आ गया। सबका निचोड़, इत्र। मैं जिस प्रेम की बात कर रहा हूं वह कुछ और। मीरा ने किया, कबीर ने किया, नानक ने किया, जगजीवन ने किया। तुम्हारी फिल्मोंवाला प्रेम नहीं, नाटक नहीं। और जिनने यह प्रेम किया उन सबने यही कहा कि वहां हार नहीं है, वहां जीत ही जीत है। वहां दुःख नहीं है, वहां आ नंद की पर्त पर पर्त खुलती चली जाती है। और अगर तुम इस प्रेम को न जान पाए तो जानना, जिंदगी व्यर्थ गई। 

दूर से आए थे साकी सुनकर मैखाने को हम 
पर तरसते ही चले अफसोस पैमाने को हम 
मरते वक्त ऐसा न कहना पड़े तुम्हें कि कितनी दूर से आए थे। 

दूर से आए थे साकी सुनकर मैखाने को हम--मधुशाला की खबर सुन कर कहां से तुम्हारा आना हुआ जरा सोचो तो! कितनी दूर की यात्रा से तुम आए हो। 

पर तरसते ही चले अफसोस पैमाने को हम--यहां एक घूंट भी न मिला। चुल्लू भर भी प्यास बुझाने को मदिरा न मिली। एक पैमाना भी न मिला। 

मरते वक्त अधिक लोगों की आंखों में यही भाव होता है। तरसते हुए जाते हैं। हां, कभी-कभी ऐसा घटता है कि कोई भक्त, कोई प्रेमी परमात्मा का तरसता हुआ नहीं जाता, लबालब जाता है। 

मैं किसी और #प्रेम की बात कर रहा हूं। आंख खोलकर एक प्रेम होता है, वह रूप से है। आंख बंद करके एक प्रेम होता है, वह अरूप से है। कुछ पा लेने की इच्छा से एक प्रेम होता है वह लोभ है, लिप्सा है। अपने को समर्पित कर देने का एक प्रेम होता है, वही भक्ति है। 

तुम्हारा प्रेम तो शोषण है। पुरुष स्त्री को शोषित करना चाहता है, स्त्री पुरुष को शोषित करना चाहती है। इसीलिए तो स्त्री-पुरुषों के बीच सतत झगड़ा बना रहता है। पति-पत्नी लड़ते ही रहते हैं। उनके बीच एक कलह का शाश्वत वातावरण रहता है। कारण है क्योंकि दोनों एक-दूसरे को कितना #शोषण कर लें, इसकी आकांक्षा है। कितना कम देना पड़े कितना ज्यादा मिल जाए इसकी चेष्टा है। यह संबंध बाजार का है, व्यवसाय का है। 

ठाकुर की कलम से

Comments