तुम्हें एक वीणा दी है परमात्मा ने। तुम्हारा हृदय एक वीणा है, छेड़ो इसके तार। साधो! इस वीणा से कुछ अद्भुत स्वर उठ सकते हैं। उठाओ उन्हें। यह वीणा ऐसी ही पड़ी न रह जाए।
मैंने सुना है, एक घर में एक पुराना वाद्य, जिसे बजाना घर के लोग भूल गए थे, सदियों-सदियों से रखा था, परंपरा से रखा था। पूर्वज छोड़ गए थे तो रहने दिया था। फिर घर में भीड़ भी बढ़ती गयी, बच्चे भी बढ़ते गए। उस वाद्य को रखने की जगह भी नहीं थी तो उसको सरकाते गए। बैठकखाने से पीछे के कमरे में चला गया, पीछे के कमरे से कचरे की कोठरी में चला गया। लेकिन कचरे की कोठरी में कभी-कभी उसके कारण उपद्रव हो जाता। कोई बिल्ली रात उस पर कूद जाती, उसके तार झनझना जाते। कोई चूहा टंकार मार देता, तार तोड़ देता, आवाज हो जाती। तो रात घर के लोगों की नींद में बाधा पड़ने लगी। आखिर एक दिन उन्होंने तय किया कि इसे हम रखे क्यों हैं? इसकी जरूरत क्या है? फिजूल जगह घेरता है, फेंक ही क्यों न दें?
उन्होंने उठाया और जाकर उसे कचरे-घर में डाल आए। वे घर लौट भी नहीं पाए थे कि ठिठक गए बीच में ही क्योंकि एक भिखारी ने, जो रास्ते से गुजरता था, उस अद्भुत वाद्य के तार छेड़ दिए। वे लौट पड़े। राह चलते लोग रुक गए। कोई गुजर न सका वहां से। भीड़ स्तब्ध खड़ी हो गयी। ऐसा अपूर्व संगीत किसी ने कभी सुना ही न था। अलमस्त होकर वह भिखारी उस अद्भुत वाद्य को बजा रहा था।
जब वाद्य का संगीत पूरा हुआ और संगीत शून्य में लीन हो गया तो घर के लोगों को होश आया। उन्होंने भिखारी से कहा, वाद्य हमें वापिस लौटा दो। यह हमारा है। आज उन्हें पता चला, यह बहुमूल्य है। पर उस भिखारी ने कहा, यह तुम्हारा था तो कचरे-घर पर फेंका क्यों? जिस क्षण फेंका उसी क्षण तुम्हारा नहीं रहा। और मैं तुमसे कह दूं कि वाद्य उसका है जो बजाना जानता है। तुम इसका करोगे क्या? फिर बिल्ली कूदेगी, फिर चूहा काटेगा, फिर बच्चे तारों को छेड़ेंगे। और जिससे अद्भुत संगीत पैदा होता है उससे केवल शोरगुल पैदा होगा। तुम करोगे क्या? यह तुम्हारा नहीं है, तुम इसके मालिक नहीं हो। मालिक वही है जो इसे बजा ले।
जब तक तुम अपने हृदय को बजाना न सीख लोगे, अपने हृदय के मालिक नहीं हो। तब तक हृदय पड़ा है बेकार। वीणा तो है, कहो परमात्मा से–
उन तारों पर कुछ गाऊं मैं–
बहलाऊं मन हे देव! तुम्हारा भी–
तुमने छोटी-सी वीणा दी
फिर एक बार
जिस क्षण वीणा का हुआ प्राण से मिलन मौन
वंदना पिघलकर धरती में साकार हुई!
मैं क्या जानूं–पथ भी विधान?
मैं तो भविष्य के ज्योति-शिखर पर
पग धरनेवाला विहान
जिसकी विधायिका शक्ति–भावना भरी भक्ति।
भक्ति कुछ और नहीं है, एक विधायक रस है जीवन में।
मैं पलक एक–मैं एक गान
उच्छ्वास एक–विश्वास एक
मैं ही तूली था देव! तुम्हारे हाथों में
जिस पर श्रद्धा थी गई रीझ
फिर एक बार
जिस क्षण श्रद्धा का हुआ प्राण से मिलन मौन
साधना पिघलकर धरती में साकार हुई!
जिस क्षण वाणी का हुआ प्राण से मिलन मौन
सर्जना पिघलकर धरती में साकार हुई!
तुम पूछते हो, संतों की सृजनात्मकता का स्रोत कहां है? परमात्मा स्रोत है सृजनात्मकता का। सब सृजनात्मकता का स्रोत परमात्मा है। और जब तुम उससे जुड़ोगे तो तुमसे भी बहेगा। और तुमसे बहे तो ही जानना कि जुड़े। तुम्हारा चेहरा लंबा और मातमी बना रहे, और तुम उपवास और व्रत और नियम, और अपने को गलाने और सड़ाने और परेशान करने में ही लगे रहो तो समझना कि शायद तुम्हारा शैतान से सत्संग हो गया है, भगवान से नहीं। भगवान तो उत्सव है। इन हरे वृक्षों में देखो। इन हरे वृक्षों से छन-छनकर आती हुई सूरज की किरणों में देखो। इन पक्षियों की आवाजों में देखो। भगवान तो उत्सव है। भगवान महोत्सव है। और जब तुम्हारे जीवन में भी उत्सव आता है तो गीत पैदा होंगे, मूर्तियां बनेंगी, मंदिर उठेंगे, रंग फैलेंगे, फाग होगी, गुलाल उड़ेगी।
और जब तुम्हारे जीवन में ऐसा आनंद का उत्सव आ जाए तो ही समझना कि तुम्हारी धर्म से पहचान हुई, सद्धर्म से पहचान हुई। ऐसा ही धर्म सनातन धर्म है, जो उत्सव ले आए।
Comments
Post a Comment