एक छोटे बच्चे को उसकी मां ने दो चवन्नियां दीं और कहा: आज कृष्ण जन्माष्टमी है। एक तू रख लेना और एक जाकर कृष्ण के मंदिर में चढ़ा आ।
बड़ा प्रश्न था बच्चा। उन चमकती हुई चवन्नियां को उछालता हुआ मंदिर की तरफ जा रहा था। एक उसके हाथ से छुटी, गिरी सड़क पर, सरकी और नाली में चली गई। धक से रह गया उसका दिल! लेकिन आदमी का बच्चा! उसने आकाश की तरफ देखकर कहा कि है कृष्णदेव महाराज! आपकी चवन्नी तो चढ़ गई। अब आप तो सर्वव्यापी हो। अब मैं कहां खोजूंगा उस चवन्नी को? वह तुम्हारी रही।
जो व्यर्थ है, जो हमसे छूटा ही जा रहा है, जो हमारे किसी काम का ही नहीं है, उस हम चढ़ा आते हैं। तुम क्या धोखा दे रहे हो? तुम्हारे सिक्के काम का ही नहीं है, उसे हम चढ़ा आते हैं। तुम क्या धोखा दे रहे हो? तुम्हारे सिक्के वहां नहीं चलते, इस लोक के सिक्के उस लोक में कैसे चलेंगे? थोड़ा सोचो तो! मगर लोग बड़े होशियार हैं।
एक आदमी मरा। अपने तीन मित्रों को कह गया था कि मर जाऊं तो जिंदगी भर की याद में मेरी लाश पर कुछ भेंट चढ़ा देना। उनमें एक तो पारसी था–सीधा-सादा पारसी। उसने सौ रुपए का नोट चढ़ा दिया। दूसरा आदमी गुजराती था–होशियार! उसने देखा कि सौ रुपए का नोट चढ़ाया है, ये सौ रुपए व्यर्थ चले जाएंगे। उसने एक हजार का नोट चढ़ा दिया। सौ रुपए उठाकर रख लिए। हजार के नोट अब चलते नहीं। उसने कहा: भाई! नौ सौ मेरी तरफ से।
तीसरा मारवाड़ी था। उसने दोनों नोट उठा लिए और एक चेक लिखकर रख दिया। अब न मुर्दा चेक भुनाने आएगा, न कोई झंझट होगी।
आदमी परलोक को भी धोखा देने के सारे उपाय कर रहे हैं। परलोक से भी जब मारवाड़ी अपना संबंध जोड़ता है, तो अपने हिसाब से जोड़ता है। वहां भी अपनी चालबाजी लगा देता है। और यहां सभी तो मारवाड़ी हैं। मारवाड़ से थोड़े ही मारवाड़ का कुछ लेना-देना है। जहां चालाकी है, वहीं मारवाड़ी है। जहां बेईमानी है, वहीं मारवाड़ी है। जहां कृपणता है।, वहीं मारवाड़ी है। यहां कौन है, जो मारवाड़ी नहीं है! और तुमने अपनी चालाकियां परमात्मा तक फैला दी हैं।
नहीं; कुछ और चढ़ाने से काम नहीं चलेगा। अपने को चढ़ाना होगा। उतनी हिम्मत कुछ मर्दों में होती हैं। वे ही मर्द पा पाते हैं।
धर्म भीरु का और कायर का रास्ता नहीं है–साहसी का, दुस्साहसी का रास्ता है।
आज के वचन बड़े प्यारे हैं। एक-एक बचन ऐसा कि चुकाओ मूल्य, तो चुकाया न जा सके।
ऐसे ही बहुत देर हो गई, अब और देर क्यों लगा रहा है? सुबह सांझ होने लगी। कहते हैं, सुबह का भूला सांझ आ जाए तो भूला नहीं कहलाता। लेकिन अब तो सांझ भी होने लगी और तू अब भी घर नहीं लौटा है! सच तो यह है–कितनी सुबहें सांझे बन चुकीं, कितने जन्म मौत बने–और फिर भी तू उसी वर्तुल में घूमता रहा है, कोलहूं के बैल की भांति। कितना विलंब तो हो ही चुका है। अब और स्थगित मत करो। अब मत कहो कि बस! अब तो आज! अब तो अभी।
विलंब करने में हम बड़े कुशल हैं। हम कल पर टालने में बड़े होशियार हैं। और तुमने कभी देखा, हमारा गणित क्या है? व्यर्थ तो हम अभी कर लेते हैं, सार्थक हम कल पर टाल देते हैं। अगर कोई तुम पर क्रोध करे तो तुम यह नहीं कहते कि कल जवाब दूंगा। जब कोई तुम पर क्रोध करता है तो तुम उसी क्षण क्रोधित हो उठते हो। तत्क्षण! नगद होता है तुम्हारा क्रोध। तुम ओ से भर जाते हो। तुम उसी क्षण कुछ करना चाहते हो। लेकिन अगर प्रेम उठे, तो तुम कहते हो कल। अगर दया उठे, तो तुम कहते हो कल। अगर दान का भाव उठे, तो तुम कहते हो कल। क्रोध उठे तो अभी, लोभ उठे तो अभी, हिंसा उठे तो अभी। करुणा उठे तो कल।
ठाकुर की कलम से
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