भारत मे म्युटेटड कोरोना वायरस का मृत्युनाद: दोषी कौन?

भारत मे म्युटेटड कोरोना वायरस का मृत्युनाद: दोषी कौन? 
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आज भारत के हम लोग, कारोना वायरस से उठी कालिमा के अंधकार में, जीवन के प्रकाशपुंज को टटोलती हुई पीढ़ी है। हमारे जीवन मे इस महामारी का आगमन पिछले वर्ष हुआ था और तब सरकार को व हम लोगो को भी, इसका कोई आभास नही था कि यह महामारी हमे कब तक, अपने  आलिंगन में जकड़े रहेगी। उस वक्त हमे इस चीनी वायरस के संक्रमण से मृत्यु के अतिरिक्त, इस से ग्रसित होने के बाद, संक्रमित शरीर पर पड़ने वाले दूरगामी प्रभावों का भी नही पता था। हम लोगो को तो यही भी पता नही था कि इसके उपचार हेतु, वैक्सीन कब तक खोजी जासकेगी या उपलब्ध हो सकेगी। 

ऐसे में प्रधानमंत्री मोदी जी ने इस महामारी की तीव्रता को कुंद करने व भारतीय समाज में उसके प्रसार को सीमित रखने के लिए, स्वयं की 'सुरक्षा' के मंत्र को ही कवच के रूप में अपनाने पर बल दिया था। इस चीनी कारोना वायरस से सुरक्षित रहने व उसके प्रसार को रोकने के लिए, मोदी सरकार द्वारा ही नही बल्कि विश्व की सभी स्वास्थ विशेषज्ञों व संगठनों ने भी प्रत्येक व्यक्ति से व्यक्तिगत स्तर पर मास्क व सेनिटाइजर का हमेशा प्रयोग करने का आवाहन किया था। प्रधानमंत्री मोदी जी ने भारत मे आयी इस विपदा से लड़ने व उससे भारतीय जनमानस के व्यापक सर्वनाश को रोकने के लिए अभितपूर्व कदम उठाए थे। एक तरफ जहां भारत की जनता को इस घातक वायरस से आई विभीषका से सावधान रहने व उससे बचने के उपायों के प्रति जागरूक करने के लिए केंद्र की मोदी सरकार ने युद्धस्तर पर प्रयास किया, वही पर दूसरी तरफ, विपक्षी दलों के विरोध के बाद भी, आर्थिक रूप से तोड़ने वाले विकल्प लॉक डाउन को लागू किया। मोदी सरकार ने इसी लॉक डाउन का सदुपयोग, संक्रमित जनता के उपचार की व्यवस्था व संसाधनों को विकसित व उपलब्ध कराने में किया था। 

भारत मे इस कोरोना वायरस की तीव्रता जब तक रही, भारत की केंद्र सरकार पूरी तरह सफल रही और उसका अनुक्रमण करते हुए, उत्तरप्रदेश ऐसी कई राज्य सरकारों ने, अपनी जनता को इस महामारी से सुरक्षित रखने के लिए अभिनव सफल प्रयोग भी किये। एक तरफ जहां योगी जी की उत्तरप्रदेश ऐसी सरकारें थी वही पर महाराष्ट्र, दिल्ली, केरल व बंगाल ऐसी राज्य सरकारें भी थी, जिन्होंने या तो इस महामारी को प्रथमिकता नही दी या अपने अंधमोदी विरोध में, कारोना वायरस की विभीषका से भारत को छतिग्रस्त हो जाने में अपना राजनैतिक लाभ देखा। नवंबर दिसम्बर में जब शेष भारत मे इस महामारी का प्रकोप थमता दिख रहा था तब यह वह राज्य थे जहां यह महामारी अपना प्रसार बनाये रक्खी थी। 

भारत मे स्वास्थ, राज्य सरकारों का दायित्व है और एक बार जब भारत इस विभीषका के थपेड से संभल सा गया था, तब राज्य सरकारों की भूमिका सामने आगयी थी। दिसम्बर 20 में भारत एक तरफ जहां नई व्यवस्थाओं और संसाधनों को समेट रहा था, वही पर कोरोना वायरस में म्युटेशन होने और नए स्ट्रेन्स विकसित होने के समाचार आने लगे थे। 2021 की शुरुवात में जहां कोरोना वायरस नए रूप में इंग्लैंड, ब्राजील व साउथ अफ्रीका में अवतरित व प्रसारित होने लगा था, वही पर भारत की जनता भी कोरोना से भयमुक्त, असामान्य समय को सामान्य बनाने में लग गयी थी। यह मेरा स्वयं का अनुभव है कि फरवरी मार्च आते आते, 95% जनता, भारत सरकार की चेतावनियों व शेष विश्व से कोरोना के म्यूटेशन के बाद तेज़ी से वहां की जनता के संक्रमित किये जाने के समाचार के बाद भी, बिना मास्क व सेनिटाइजर का प्रयोग करे, कोरोना संक्रमण के पूर्व के काल को जीने लगी थी। 

आज, जब सब तरफ हाहाकार मचा है और कोरोना के पूर्व के संकरण के विपरीत कोरोना का नया म्यूटेंट वायरस, द्रुतगति से लोगो को संक्रमित व उन्हें काल के गाल में लील रहा है, तब चहुंओर इस कोरोना की विभीषका को रोक पाने में सरकार की विफलता व स्वास्थ्य व्यवस्था के चरमरा जाने को लेकर आलोचनाओं और आक्रोशित प्रतिक्रियाओं की बाढ़ आई दिख रही है। ऐसे लोगो पर मैं यही कहूंगा कि मैं स्वयं कोरोना पीड़ित रहा हूँ और आज मेरे घर मे ही पत्नी व पुत्र संक्रमित हो जब संघर्ष कर रहे है तब भी मैं सरकार को इसका पूर्ण दोषी नही मानता हूँ। मैं मानता हूँ कि किसी भी प्राकृतिक आपदा व महामारी को कोई भी सरकार नही रोक सकती है, वह सिर्फ उससे होने वाली क्षति व उसके प्रसार को न्यूनतम पर रोके जाने का प्रयास कर सकती है। इस दृष्टि से केंद्र की मोदी सरकार व शेष बीजेपी शासित राज्य, विशेषतः योगी जी की उत्तरप्रदेश की सरकार ने गंभीर व सार्थक प्रयास किया है और जो आज असफलता दिख रही है, उसमे भारत की पूर्व में सफल रही केंद्र सरकार व राज्य सरकारों के योगदान से कही ज्यादा, जनता का बड़ा योगदान है। सरकारों ने जनता को कभी यह नही कहा कि कोरोना समाप्त हो गया है। जनता से उन्होंने कभी यह नही कहा की आप कोरोना वायरस से संक्रमित होने से बचने के लिए, इस महामारी से लड़ने के लिए घोषित किये गए 'एसओपी' में शिथिलता बरते या मास्क व सेनिटाइजर का परित्याग कर दे। लेकिन इसके बाद भी भारत की जनता ने यह किया है। 

मैने होली की तैयारी में, बाजारों में 95% लोगो को बिना किसी मास्क के सामान्य गतिविधियों को करते देखा है। यही नही, होली के उपरांत, अप्रैल की प्रथम सप्ताह में लखनऊ में जब कोरोना वायरस के पुनः तेज़ी से फैलता दिख रहा था, तब भी 90% जनता बिना मास्क के सड़क पर घूम रही थी। अप्रैल की 10 तारीख आते आते तो कोरोना का यह नया म्युटेटड वायरस साक्षत काल ही बन चुका था, तब भी जनता अपने को अजर अमर समझ अपनी दिनचर्या का निर्वाह कर रही थी। ऐसे में जब जनता स्वयं ही मृत्यु की धारक बन, उसे प्रसारित करेगी तो सरकार को केवल दोष देना उसकी निर्लज्जता है। 

मुझे ऐसा लगता है कि कांग्रेसी व वामीलिबरल वातावरण में पल्लवित हमारा भारतीय समाज, विशेषकर उसका पढा लिखा वर्ग व तथाकथित सभ्रांत वर्ग 21, वी शताब्दी के दूसरे दशक में आते आते इतना अराजक रूप से दम्भी हो गया है कि वह दूसरे पर दोषारोपण करने को को अपना मौलिक अधिकार मानता है व स्वयं, अपने ही कर्तव्यों व दायित्वों का बोझा उठाने को तैयार नही है। इसका जीवित प्रमाण यह वीडियो, जो आज सुबह या कल का, दिल्ली का है, जहां मास्क न लगाने पर, पुलिस द्वारा रोके जाने पर इनका दम्भ इतना फट पड़ा है कि महिला, जो गर्व से बता रही है कि यूपीएससी का मेंस क्लियर कर चुकी है, वह मास्क को बकवास व मुख्यमंत्री से लेकर प्रधानमंत्री को चने बिकवा रही है। 

अब आप ही अपनी अंतरात्मा को टटोलिये और पूछिये की क्या, इस कोरोना वायरस की विभीषका से, ऐसी जनता के होते हुए, सरकार सफलता से लड़ सकती है? क्या आपकी व आपके अपनो की मृत्यु का कारक आपका ही बनाया गया समाज नही है? 
ठाकुर की कलम से

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