योग शब्द का अर्थ

योग शब्द का अर्थ 

दार्शनिकों ने योग की अनेक परीभाषाएं की है । भगवान् श्रीकृष्ण का कहना है कि , जीवन में कुशलता पूर्वक चमकीली बुद्धि से कर्म करना योग है ---- ' योगः कर्मसु कौशलम् ' अथक दुःख के क्षणों में , मन - बुद्धि कांपे नही , तराजू के पलडो़ के समान सम बने रहें,  यही योग है ---- ' समत्वं योग उच्यते ' । यह समता अवस्था बड़ी विलक्षण है ----- क्योंकि , यदि मन में प्रवृत्ति है , तो मनुष्य सांसारिक प्रदार्थों का लोभ करता है और यदि  निवृत्ति है , तो उन पदार्थों के प्रति विद्वेष दृष्टि अपनाता है । समता का सुख, तो उसी को प्राप्त होता है , जो ज्ञानवान होकर, शिशु के समान अन्य मानसिकता का आचरण करता है । ज्ञानी प्रदोष प्रवृत्ति में रहकर भी समता दृष्टि से, निवृत्ति का फल पराप्त करता है । मन परमात्मा से जुड़ जाएं, तो निवृत्ति ही निवृत्ति है । यही योग है या परमात्मा के साथ मन का जुड़ जाना योग है या  जीव - परमात्मा का मिलकर एक हो जाना योग है ----- ' ऐक्यं जीवात्मनोराहुर्योगं योगविशारदाः ' ----- योग के जानकार, योग के संबंध में , ऐसा ही कुछ कहते है अथवा  अहंकार की दीवार का ढह जाना योग है ।

सामान्यतः मनुष्य समझता है कि, मन कोई भौतिक वस्तु है । आज विज्ञान पूरा है , बड़े - बड़े आपरेशन होते है । खुर्दबीन जैसे यंत्र है , जो बारीक से बारीक चीज को देख लेते है । परमाणु तक का साक्षात्कार कर लेते है । किंतु, मन को आज तक किसी ने नही पकड़ा है और न ही मन किसी को दिखाई दिया है , पर मन होता अवश्य है ।

शरीर के साथ परमात्मा ने एक उपकरण लगा दिया है , उसे कहते है मन। मन है , तो एक, पर उसके चार नाम है ---- जब वह किसी वस्तु का ' मनन ' करता है , तो मन है । ' चिंतन ' करता है , तो चित्त है । जब ' मेरा-मेरा ' ऐसे अभिमान करता है , तो 'अहंकार ' है और जब किसी वस्तु का निश्चय करता है , तो ' बुद्धि ' है । शरीर के अंदर होने वाला एक ही उपकरण, जिसके चार नाम है --- मन, बुद्धि, चित्त, अहंकार ये शरीर के अंदर होने वाले उपकरण है, इसलिए अंतःकरण है । पांच ज्ञानेन्द्रियां, बाहरी पदार्थों का ज्ञान कराती है , अतः ये बाहरी उपकरण है ।

      शांति तो मन की वस्तु है । मन स्थिर हो, तो किसी भी क्षण, कही पर भी शांति मिल सकती है । अतः मानसिक शांति के लिए, ध्यान का होना आवश्यक है और ध्यान का कोई आधार होना चाहिए । वह आधार ईश्वर या धर्म का हो सकता है । वगैर, आधार के मन भटकता रहता है । उसकी दशा ठीक वैसी होती है , जैसे एक विशाल समुद्र हो, उसमें कहीं की यात्रा करने वाला, कोई यात्री हो, उसके पास छोटी सी नाव हो, नाव में  पतवार और दिशा निर्देशक यंत्र न हो, आंधी और तूफान हो, गहन अंधेरा हो, उस समय नाव में यात्री की जो दशा होती है , वहीं दशा बिना आधार के मन की होती है ।

    " तं विद्यादुःखसंयोगवियोगं योगसंत्रितम्। "
      तत्त्व का चिंतन करते- करते मन को गला देना भी योग है । आखिर आप जीना कैसे चाहते है ?  वृक्ष भी जीते है । गाय, भैस, बकरी , खरगोश आदि जनवर भी जीते है । तोता, मैना, कोयल आदि पक्षी भी जीते है । लौहार की धौकनी भी सांस लेती है । आत्मा - परमात्मा का चिंतन न करके , व्यर्थ में  सांस लेते रहना, यह कोई जीवन नही है । जीना उसी का सार्थक है , जो परमात्मा का मनन करते- करते ,  मन को गला देता है । मन के गलाने का अर्थ है --- मन के द्वारा जो भी जाना जाता है , उसकी समाप्ति। अर्थात मन की ऐसी अवस्था , उसमें कोई संकल्प ही न उठे। जब मन में होने वाले संकल्प - विकल्प और कामनाएं विलीन हो जाती है , तो ऐसे व्यक्ति को ' योगारूढ़ ' कहा जाता है ।

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