आत्म ज्ञान की पहली शर्त है कि, मन में किसी वस्तु की छोटी से छोटी इच्छा भी नही होनी चाहिए । मूढ़ पुरूष, यदि शांति की भी इच्छा करता है , तो उसे अशांति ही हाथ लगती है । क्योंकि , किसी प्रकार की इच्छा होना ही अशांति का कारण है । इच्छा , कामना, चाह, तृष्णा, वासना , ये यब पर्याय है । वासनाओं के कारण ही मन चंचल होता है । साधक को प्रयत्न पूर्वक, अपना मन परमात्मा के साथ जोड़ना चाहिए । अवसर मिलते ही यह भागने लगता है । ऐसा भागता है कि, कुछ क्षण तो पता ही नही चलेगा कि, यह कहां चला गया । इसकी गति बड़ी तीव्र है ।
मन में पदार्थों का प्रतिबिम्बित होना :-------
जंगल में रहने वाले हिरण को, यदि पकड़ कर, एअरकंडीशन कमरे में बंद करके रखना चाहे , तो क्या उसे अच्छा लगेगा? वह तो रस्सी तोड़कर, शीशे को फोड़कर, वन की ओर ही भागेगा। जहां हरा-हरा घास है । वैसे जिस मन को हिरण के समान तुचछ विषयों के चखने का अभ्यास हो गया है , उसे शांत और स्थिर स्थिति में रहना पसंद ही नही है । मन का रंग काला हो गया है और काले हिरण के समान ही बड़ा बलवान भी है । क्षणिक विषयानन्द से संतुष्ट भी हो जाता है । इससे परे भी कोई शाश्वत आनंद है , इसकी जानकारी मन को है ही नही । यदि कदाचित पूर्व जन्म में , योगाभ्यास किया हो अथवा किसी आत्मदर्शी सद्गुरु की कृपा हो जाएं, तो मन निर्मल और स्थिर हो सकता है । उस पर पडी़ हुई विषयों की छाप मिट सकती है । आत्मा का स्वयं प्रकाश दिखाई दे सकता है । आत्मानंद की अनुभूति हो जाती है , एकबार वह आनंद मिल जाए, तो विषयानंद उसकी तुलना में तुच्छ है ।
विषय और चिंतन मन का स्वभाव बन गया है । जाग्रत अवस्था में पदार्थों को देखकर, उसमें ज्वार - भाटा आता है । जब स्वप्न में , उसे पदार्थ दिखाई नही देते तो पदार्थों के संस्कार तो मन पर अंकित रहते है , आत्मा से उसे प्रकाश मिला, उन नुभूत विषयों का पुनः स्मरण हो आता है । बस मन विषय - रस में डुब जाता है , आत्मा - परमात्मा उसे दिखाई नही देता। अनुभूत विषय से , सत्य प्रतीत होते है ।। तात्पर्य आत्मा की छवि ने मन को चेतन - सा बनाया, पदार्थों के संस्कार पहले से अंकित थे, चलचित्र के समान एक - एक करके पदार्थ सामने आने लगते है । एकसाथ अनेक विचारों के प्रवेश होने से, मन विक्षिप्त हो उठता है । दुविधा और द्वंद्व की स्थिति पैदा हो जाती है । मन यदि एक अद्वितीय तत्व का चिंतन करता तो द्वंद्व की स्थिति न पैदा होती। मन में एकसाथ अनेक आकृतियां प्रवेश कर जाय, तो शांति नष्ट होगी ही। वस्तुओं के मोह में आत्मा खो जाती है । साथ ही सतत् विषम - सेवन का अभ्यास आने से एकाग्र और स्थिर अवस्था उसे अच्छी ही नही लगती ।
अनुभव करें कि, मन दर्पण के समान चमकीला तत्व है । उसमें जैसे दर्पण में मुख का प्रतिबिम्बि पड़ता है , वैसे आत्मा का प्रतिबिम्बि पड़ता है । मन है तो जड़ पर, चेतन की छाया पढ़ने से, यह चेतन के समान हो जाता है । साथ ही उसमें भौतिक पदार्थों के सूक्ष्म चित्र भी अंकित हो जाते है । मन इन्द्रियों का स्वामी है , उसमें जिन पदार्थों की छाप पड़ती है , वह उन पदार्थों को मांगता है । इन्द्रिया उन - उन पदार्थों को पकड़ कर मन को समर्पित करती है । अब मन का इन्द्रियों और विषयों के प्रति अपनापन हो जाता है । जैसे की कोई सद्गृहस्थ अपने कुटम्ब - परिवार।को वगैर देखें अशांत हो जाता है , वैसे ही इन्द्रियो और विषयों के बिना मन अशांत हो जाता है । निस्तरंग और शांत अवस्था में रहना , उसे रूचिकर नही लगता। क्षण - भर में उसमें संकल्प - विकल्प उत्पन्न होते रहते है
कभी आप स्वप्न में भी अनेक दृश्य देखते है , पर नींद टूटते ही , ये सब वस्तुएं गायब हो जाती है । भगवान् वेद कहता है ----- " न तत्र रथाः, न रथ योगाः, न पन्थानः।
अथ रथान् थयोगान्, पन्थानः सृजते ।। "
न वहां रथ है , न उनमें जुड़ने वाले घोडे़ है , न सवार है , न सड़क है , न सारथि है । आपको स्वप्न में , सड़क दिखाई देती है , इन सबका कारण मन ही है । मन में , इन वस्तुओं के संस्कार पडे़ रहते है । यदि ध्यान से देखें , तो वहां कुछ होता ही नहीं। नींद टुटने पर, वहां कुछ दिखाई ही न देगा। चेतन आत्मा का प्रकाश मन पर पडा़, वहां वासना का ताना-बाना पहले से मौजूद था। आपका मन ही विविध रूपों में , दिखाई दे रहा था । पदार्थों की विविधता वासना के कारण थी। मन न तो कहीं गया और न कही से आया, यह सब मन का खेल था।
मन बड़ा चंचल है । विषयों का सेवन करते - करते इसका अभ्यास बिगड़ गया है । यह जल्दी बस में नही होता। यदि वह विषयों की ओर बार-बार दौड़ता है , तो इससे हार नही माननी चाहिए । अभ्यास अच्छा हो या बुरा हो , वह तो करने से होता है । यदि कुसंगति से बुरा अभ्यास बन गया है , तो उसकी दिशा बदलें। सत्संग करें , तब बुराई के स्थान पर अच्छाई का अभ्यास हो जायेगा। आपका मन यदि विषय की ओर दौड़ता है , तो उसे उस ओर से लौटाना है । आपको सदा इस बात का ध्यान होना चाहिए कि, आपके अंदर परमात्मा स्थित है । मन उससे जितना विमुख होगा , उतना अशांत होगा। आप मन को रोकने का जितना प्रयत्न करते है , उतना ही वह दौड़ता है । यदि धैर्यशील बुद्धि से, उस पर नियंत्रण किया जाए, तो अवश्य आत्मा में , स्थिर हो सकता है । आप सावधानी से, विचार करें कि , मन किस कारण से बाहर निकलता है और निकल कर कहां जाता है ।
आप थोड़ा विचार करिए कि, इन क्षणों को नापने का पैमाना क्या है ? आप गुलाब की सौ पंखुड़ियाँ ले ले। एक के ऊपर एक पंखुडी़ को रखें। सूई से इन पंखुड़ियों का बेधन करें । आपको लगेगा कि, सूई एक साथ अनेक पंखुड़ियों को पार कर गयी , पर ऐसा होता नही है । प्रत्येक पंखुडी़ को पार करते समय, सूई का क्षण भिन्न है । एक पंखुडी़ को पार करने में , सूई को जितना समय लगा, वहीं बारीक क्षण है । इसका अर्थ ये हुआ कि, सौ पंखुड़ियों को पार करने में , सौ क्षण लगें। बस इतने बारीक क्षणों में , मन घूमता और बदलता रहता है । महर्षि पतंजलि ने, मन को जल्दी बदलने वाला बताय है -----
" क्षिप्रपरिणामी चित्तमित्युक्तम् "
अर्थात मनुष्य का मन बहुत जल्दी बदलने वाला है । इसमें अनेक विचार और तरंगें उत्पन्न होती रहती है । ऊपर से प्रतीत होता है कि, हम बड़ी शांति से बैठे हुए है , पर अंदर से मन इतना दौड़ता है कि, हम शरीर से भी इतना नही दौड़ पाते है, जितना मन से दौड़ रहे है ।
तार्किकों ने मन का लक्षण किया है कि, एक साथ अनेक पदार्थों का ज्ञान न करके, एक क्षण में , एक विषय का ज्ञान करना, यह मन का लक्षण है -----
" युगपद्ज्ञानानुत्पत्तिर्मनसो लिंगम् " ( न्या. सूत्र )
अर्थात, मन एक समय में या एक क्षण में किसी एक पदार्थ का ज्ञान करता है ।
जैसे--- एक व्यक्ति खीरा खा रहा है । खीरे में रूप, रस, गन्ध, शब्द और स्पर्श ये पांचों गुण है । यह बात समझ रखनी चाहिए कि , जिस क्षण आप खीरे का हरा रूप देखते है , उसी क्षण रस का अनुभव नही करते। जब रस का अनुभव करते है , तो गंध का अनुभव नही करते। जब गंध का अनुभव करते है , तो दांतों से खीरा चबाते समय, जो कट-कट की आवाज सुनाई देती है , उसे नही सुनते और जब खीरे के ठण्डे स्पर्श का अनुभव होता है , तो अन्य किसी विषय का अनुभव नही कर सकते । इन पांचों विषय का जो अनुभव होता है , उनका क्षण बड़ा बारीक है । मन बहुत जल्दी बदलता रहता है , अतः रूप, रस, गंध आदि के ज्ञान के क्षण अलग-अलग है और वह क्षण इतने सूक्ष्म है कि, हमें यह लगता है कि , हम एक साथ ही सभी विषयों का ज्ञान कर रहे है ।
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