वैज्ञानिक प्रकाश और बिजली की गति को सबसे अधिक तीव्र मानते है , पर मन की गति उससे भी तीव्र है । यह भांग पिये बंदर के समान है । शरीर और इंद्रियों को झकझोर देता है । बड़ा बलवान है । साथ में बड़ा हठी और ढीठ भी है । इसको वश में , करना उतना ही कठिन है , जितना कि, हवा को मुठ्ठी में बांधकर रखना। यह विषयों में रम जाता है । सावधानी से , इसे पकड़ कर परमात्मा से जोड़ना है । चाहे कर्म की रस्सी , चाहे भक्ति की रस्सी या ज्ञान की रस्सी लेकर, परमात्मा रूपी खूंटे से इसे बांधना है । यदि मन को स्वतंत्र छोड़ दिया जाय, तो यह बड़ा अनर्थ कर सकता है । यदि विषयों की ओर दौड़ता है , तो विषयो में दोष दृष्टि दर्शाते हुए, इसे समझाएं। प्यारे मन! विषय तो विष मिले हुए है , शहद के समान है । जिस शहद में , विष मिला हो, वह सेवन करने में मीठा है , पर उसका परिणाम बड़ा हानिकारक होता है । विषयों में , दोष दृष्टि अपनाने पर ही वैराग्य होगा। परमात्मा सम्राट है , त्याग वैराग्य के सिंहासन पर ही बैठता है ।
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