"वामपंथ की जड़े जहां जहां गड़ी पूरी डेमोग्राफी बदल गई"
मित्रों!
वामपंथ को बहुत करीब से देखा है, मैंने अपने पिछले केरल के प्रवास तथा वहां के घनिष्ठ मित्रों से वार्तालाप कर ...ये इतनी गहरी जड़ें जमा चुका है जिसकी कल्पना भी नहीं कि जा सकती.. पूरी डेमोग्राफी बदल गई है केरल की .. जहां हर परिवार में आय का जरिया अरब का पैसा हो वहां से आप एक हिंदुस्तान की कल्पना भी नहीं कर सकते हैं .. हर 200 मीटर पर या तो चर्च है या 500 मीटर पर मस्जिद.... मंदिर के नाम पर वही सिर्फ साबरिमाला और पद्मनाभ स्वामी का ऐतिहासिक धरोहर मंदिर .. साबरिमाला के अस्तित्व को भी लीलने की कोशिश में वामपंथियों ने क्या कोशिश नहीं कि है पिछले एक साल में ये किसी से छुपा नहीं है ... और हर रोज कोई बुद्धिजीवी हिन्दू मुझे दिल्ली में मिल जाता है जिसे देश मे दंगाईयों की वह कौम नही दिखती जो आये दिन ट्रैन बसों और मेट्रो को जलाने की जुगत में भिड़े नजर आते हैं लेकिन उन्हें हर रोज देश का गिरता GDP नजर आता है ..ये अर्थशास्त्री बुद्धिजीवी कोई मौका नही छोड़ते हिंदुत्व को गलियाने का क्योंकि यही इन्हें बहुत कूल दिखता है अपनी पर्सनालिटी को परिभाशीत करने के लिए .. ये भूल जाते हैं कि जब 1947 में देश का धर्म के आधार पर विभाजन हुआ था तब BJP का जन्म भी नही हुआ था .. इन्हें आज योगी के दंगाइयों से पैसे वसूलने पर भी एतराज है क्योंकि इनके अब्बा के वालिद किसी जमाने मे हारमोनियम बजाते थे .. इन्हें ना कभी कश्मीर से पंडितों का पलायन दिखा ना आज इन्हें बंगाल के हिंदुओं का दर्द नजर आता है .. देश इन बुद्धिजीवियों के लिए सिर्फ एक सर्कस है और मोदी एक जोकर जो चाहे इनकी जिंदगी में कितनी भी खुशियां बिखेर दे लेकिन उस जोकर के अंदर के राष्ट्रवाद के दर्द को समझने में इन्हें कोई रुचि नहीं है ... फिर फ़ैज़ कहता है ... "देखेंगे हम"
... तो देख ले बेटा फ़ैज़ ... अब हमने भी दिखाने की कसम खा ली है...क्रोनोलॉजी तुम्हारे इतिहास की दुनिया ने भी देखी है और हम आये रोज देख रहे हैं पिछले शताब्दियों से ... अब आगे की क्रोनोलॉजी में तुम्हारे तख्त और ताज तो उछलेंगे ही साथ मे तुम्हारी भद्दी जम्हूरियत भी।
"ठाकुर की कलम से"
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