#विकासराय को चोरों ने पकड़ लिया था और उन्होंने कहा कि तू धर दे जो तेरे पास हो। चाबी भी, बैंक का एकाउंट भी, और नहीं तो तेरी जान ले लेंगे। बोल क्या करता है? राय जी ने कहा, जरा सोचने भी तो दो भाई! अब विकल्प दो ही हैं। वे कह रहे हैं, समझा कि नहीं तूने? दो ही विकल्प हैं। या तो धन दे दे, या तेरे प्राण ले लेंगे। उसने कहा, जरा सोचने दो। वह जरा देर लगाने लगा सोचने में। चोरों ने कहा, जल्दी करो, सोचना क्या है? उसने कहा, तो तुम जान ही ले लो, क्योंकि धन तो बड़ी मुश्किल से कमाया है, और फिर बुढ़ापे में काम भी आएगा। जान ले लो, मुफ्त मिली है। कमाई भी नहीं। और धन गया और जान बच गयी, तो क्या करेंगे? जान गयी, धन बच गया, सब ठीक है।
इस पर तुम हंसना मत। यही हमारी आपकी हालत है। जान बेचते हो, पैसे इकट्ठे करते हो। प्राण काट—काटकर बेचते हो बाजार में, आत्मा बेचते हो, दो—दो पैसे के लिए। फिर पैसे इकट्ठे करके मर जाते हो। आखिर तुम्हारी पूरी जिंदगी में करते क्या हो? कुछ इकट्ठा करते हो। खुद तो खोते चले जाते हो। वस्तुएं इकट्ठी कर लेते हो, बडा मकान बना लेते हो, तिजोड़ी भर लेते हो, नाम पर बडी जमीन का पट्टा लिखवा लेते हो। इस सबको तुम प्रेम कहते हो? तुम हत्यारे हो, तुम आत्मघाती हो।
जो लोग जहर खाकर मर जाते हैं, उनमें और तुममें कोई बुनियादी अंतर नहीं है। तुम धन खाकर मरते हो, वे जहर खाकर मरते हैं। तुम मकान खाकर मरते हो, वे जहर खाकर मरते हैं। फर्क अगर होगा तो इतना ही होगा कि वे थोड़े हिम्मतवर हैं, तुम कायर हो। तुम धीरे— धीरे मरते हो, वे इकट्ठा मर जाते हैं। तुम चिल्लर मरते हो—इकन्नी मरे, दुअन्नी मरे, चौअन्नी मरे—ऐसे मरते हो। सोलह आना पूरा करने में तुम सत्तर—अस्सी साल लगाते हो। वे रुपया का रुपया मर जाते हैं। सीधा का सीधा मर जाते हैं। उनमें और तुममें जो फर्क होगा, वह कायरता का होगा, साहस का होगा, लेकिन मात्रा का ही होगा, गुण का नहीं हो सकता। मरते तो तुम भी हो।
ध्यान रखना, अगर तुमने अपने को प्रेम किया होता, तो तुम चाहे धन खोने का मौका आता तो खोते, लेकिन अपने को बचाते। वही बुद्ध कह रहे हैं। अत्तानं चे पिय—जिसने अपने को प्रेम किया। तो वह अपने को सुरक्षित रखेगा।
🙏🌹ठाकुर की कलम से🌹🙏
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