मित्रों!
शाहीन बाग डरने की नहीं, सीखने की चीज थी!
वे जो चीख चीख कर कह रहे थे कि उन्होंने हिंदुस्तान पर आठ सौ साल राज किया था और राज करेंगे...और जो यह कह रहे थे कि उनकी संख्या बढ़ने दें, हमें चार पैरों पर खींच कर लाया जायेगा और मार डाला जाएगा... यह छोटी सी बात उनके दिमाग मे कोई आज नहीं आई थी. यह उनका इरादा पुराना था, सिर्फ खुला ऐलान नया था.
हमारे लिए उनकी नीयत ही जानने की बात है. अगर अब भी किसी के मन में कोई शक शुबहा रह गया हो, कोई अब भी बेनिफिट ऑफ डाउट देने के मूड में हो तो उसकी भी गुंजाइश नहीं बची. क्योंकि अब आप जो सुन रहे हैं, वह किन्हीं आतंकियों के, किन्हीं पॉलिटिकल लीडर्स के बयान नहीं हैं. उनकी घरों की औरतें, उनके छोटे छोटे बच्चे तक खुल कर बोल रहे हैं...
पर एक और बात जानने लायक है... चाहे मरने-मारने की कितनी भी बातें कर लें, इस कौम की एक और खासियत है... ये कठिन लड़ाइयाँ नहीं लड़ते. ये सिर्फ तभी तक शेर बनते हैं जबतक अपने ऊपर कोई खतरा नहीं दिखाई नहीं देता. ये सैनिक नहीं हैं, फसादी हैं. सद्दाम हुसैन हो या बिन लादेन... सब नाले में दुबके हुए ही मारे गए और दुनिया में किसी की चूँ नहीं निकली.
आज इजराइल एक सैनिक शक्ति है, लेकिन 1948 में वह कोई ताक़त नहीं था. सिर्फ कुछ हज़ार डेस्पेरेट यहूदी थे जिनके पास ढंग के हथियार भी नहीं थे. और तब भी चार चार देशों की फौजें उनके सामने भाग चलीं. इसलिए नहीं कि यहूदियों ने कोई ऐसा कारनामा किया. बल्कि इसलिए कि वे तन कर खड़े हो गए. इन लोगों ने उम्मीद नही की थी कि कुछ हजार यहूदी मुकाबले में खड़े भी होंगे. जब वे खड़े हुए तो अरब फौजें भाग चलीं. 1948 का अरब-इसरायली युद्ध जितनी इसरायली वीरता की कहानी नहीं है, उससे कहीं ज्यादा यह अरबी कायरता की कहानी है.
उस समय इसरायली मिलिट्री कमांड के पास कुल दो आर्टिलरी तोपें थीं. उत्तर में सीरिया और इराक की फौजें पूरी टैंक रेजिमेंट के साथ आ रही थीं, और उसी समय दक्षिण से इजिप्ट की सेना आ रही थी. इराकी फौजों के सामने इसरायली आर्टिलरी तोपों ने कुल बारह राउंड फायर किए और पूरी इराकी फौज, टैंक छोड़ छाड़ के भाग खड़ी हुई. तब आनन फानन में उन्हीं दो आर्टिलरी तोपों को दक्षिणी मोर्चे पर मँगाया गया और वहाँ भी यही नतीजा निकला.
नेगेव के रेगिस्तान में कभी बारिश नहीं होती है. एक रात, जब नेगेव में एक मोर्चे पर इसरायली और अरब फौजें आमने सामने थीं तो एकाएक बादल गरजने लगे और बिजली कड़कने लगी, बारिश होने लगी. तब तक इसरायली फौजों का ऐसा आतंक हो गया था कि अरबी फौजों में अफवाह फैल गई कि यह यहूदियों के किसी नए हथियार का नतीजा है. तभी अमेरिका के परमाणु बम की यादें ताजा थीं, और अरबियों को डर लगा कि कहीं इस्राएलियों ने परमाणु बम ना छोड़ दिया हो. नतीजा कि पूरी की पूरी ब्रिगेड बिना लड़े भाग खड़ी हुई.
यह पैटर्न पूरी लड़ाई की खासियत रही. जहाँ इस्राएलियों की तीन सौ लोगों की टुकड़ी ने सिर्फ राइफलों के बल पर पूरी इजिप्शियन ब्रिगेड को एक किबुज़ पर पाँच दिनों तक रोक रखा, वहीं हाइफा में पंद्रह हजार फिलिस्तीनियों ने 700 इस्राएलियों के पहुंचते ही रातों रात शहर खाली कर दिया.
शाहीन बाग में इनका चीखना चिल्लाना चलता रहेगा. इनकी तैयारी आज की नहीं है, सत्तर सालों से चल रही है. बल्कि चौदह सौ सालों में कभी रुकी ही नहीं है. ये बर्बर, हिंसक और क्रूर हैं... पर ये उतने ही बड़े कायर भी हैं. ये लुटेरे रहे हैं, सिपाही नहीं. इनका इतिहास इनकी चुगली कर ही देता है. ये वही कौम है जो बादलों के गरजने पर डर के भाग जाती है.
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