होशपूर्वक श्वास लो

" बुद्ध ने श्वास का विधी की तरह उपयोग किया——हौशपूर्वक श्वास लेना। इस विधी को " अनापान—सतीयोग "के नामसे जाना जाता है—भीतर आती व बाहर जाती श्वास के प्रति सजगता। तुम श्वा लेते हो परन्तु यह अचेतन बात है। और श्वास ही प्राण है, श्वास ही ' एलोन—वायटल ' है, मुख्य शक्ति है, प्राण ऊर्जा है, आलोक हे, —और वही  अचेतन है। तुम्हे उसका कोईभी होश नही। यदि तुम्हे श्वास लेना पडे तो तुम किसी भी क्षण मर जाओगे क्योंकि तब बडा मुश्किल होगा श्वास लेना। 
     ————————बुद्ध ने कहा—बताते है कि यदि तुम एक घंटे भी श्वास के प्रति सजग रह सको तो तुम बुद्भत्व को उपलब्ध हो गये समझो। लेकिन एक श्वास भी नही चुकनी चाहिए। एक घंटा काफी है।  यह बहुत छोटा मालूम पडता है—केवल समय का एक टुकडा, किन्तु वह है नही। जब तुम प्रयास करोगे तो सजगता का एक घंटा लाखै साल जैसा प्रतित होगा क्योंकि साधारणत:तुम पाॅच —छ:सेकंड से ज्यादा सजग नही रह सकते, और वह भी जबकि कोई बहुत अधिक सावधान हो। अन्यथा तुम हर सेकंडपर चुक जाओगे। तुम शुरू करोगे कि श्वास भीतर जा रही हे। श्वास भीतर चली गई  है, और तुम कही और चले गये। अचानक तुम्हे याद आयेगा कि श्वास बाहर जा रही है। श्वास वाहर चली गई और तुम कही और जा चुके।
  श्वास के साथ चलने का अर्थ होता है कि एक भी विचार को न चलने दिया जाये क्योंकि विचार तुम्हारा ध्यान खिंच लेगा, विचार तुम्हारे ध्यान को कही और ले जायेगा।——इसलिये बुद्ध कहते है ——" होशपूर्वक श्वास लो "

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