कांग्रेस का भारत में “अरब स्प्रिंग” फैलाने का सपना टूट गया.
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पिछले कुछ समय से विश्व के कई देशों में आम नागरिकों के प्रदर्शन और हिंसा के कारण कई सरकारों ने रिजाइन कर दिया या फिर उन देशों में सरकारों की वैधता पर प्रश्नचिन्ह लग गया.
उदाहरण के लिए अल्जीरिया, सूडान, लेबनान, मिश्र, यमन, इराक, बोलीविया, यूक्रेन, इत्यादि राष्ट्रों में आम जनता के हिंसात्मक प्रवेश प्रदर्शन के कारण सरकारों को सत्ता छोड़नी पड़ी. हांगकांग की एक तिहाई जनता सड़क पर उतरी हुई है. चिले में जनता के हिंसक प्रदर्शन के कारण वहां की सरकार ने क्लाइमेट चेंज समिट करने में असमर्थता जतायी जिसे फिर स्पेन की सरकार ने इसी महीने मेड्रिड में करवाया. स्पेन की सरकार कैटेलोनिया प्रोविंस में प्रदर्शन से त्रस्त है. वहीं फ्रांस में हिंसक प्रदर्शन राष्ट्रपति माक्रों की वैधता पर चोट कर रहे हैं.
ट्यूनीशिया, मिस्र और यमन में वर्ष 2011 में हुए व्यापक प्रदर्शन को अरब स्प्रिंग या वसंत का नाम दिया गया. वसंत ऋतु इसलिए क्योंकि यह आशा थी कि यह प्रदर्शन इन देशों को तानाशाही से मुक्ति दिला देंगे. हालांकि इन प्रदर्शनों का परिणाम विपरीत ही निकला.
चूंकि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी विपक्ष की आशा के विपरीत अधिक मतों और सीट से चुनकर वापस आ गए हैं तो विपक्ष की समझ में नहीं आ रहा कि अब अगले पांच वर्ष कैसे निकाले जाए. इसलिए उन्होंने शुरू से ही विरोध और प्रदर्शन के द्वारा प्रधानमंत्री की वैधता पर चोट करने का प्रयास किया.
पिछले महीने उन्होंने जेएनयू के छात्रों के मुद्दों को लेकर विरोध भड़काने की कोशिश की. उन्हें आशा थी कि जेएनयू का विरोध पूरे देश में फैल जाएगा. लेकिन ऐसा नहीं हुआ और इसके बारे में मैं एक महीने पूर्व 20 नवंबर की पोस्ट में लिख चुका हूं.
जब जेएनयू से सफलता नहीं मिली, तब उन्होंने नागरिकता कानून के की आड़ में कुछ विश्वविद्यालयों में छात्रों की आड़ में अपराधियों से हिंसक प्रदर्शन करवाया.
ट्विटर पर लोगो ने पोल खोल दी कि ऐसे प्रदर्शनों को कांग्रेस के नेता व्हाट्सएप ग्रुप के द्वारा संचालित कर रहे थे और भड़का रहे थे. लेकिन असम के बाहर हिंसक प्रदर्शन केवल चार या पांच "ख़ास" विश्वविद्यालयो तक सीमित होकर रह गए. व्यापकता का आभास देने के लिए इन्होंने बीएचयू और कुछ आईआईएम, आईआईटी के बाहर 20-25 लोगों को ले जाकर खड़े कर देते थे उनसे नारे लगवाए और कह दिया कि वे भी प्रदर्शन में सम्मिलित हैं. इन “छात्र” प्रदर्शनों को कांग्रेस पोषित और समर्थित मीडिया ने हवा दी.
लेकिन सोशल मीडिया के युग में ऐसे सभी प्रदर्शनों की पोल पट्टी खुल गई. यह सामने आने लगा है कि कई हिंसक वारदातों में जिहादी लड़कियां, लड़के तथा अपराधिक तत्व शामिल थे जिनका पढ़ाई और सेकुलरिज्म से कुछ लेना-देना नहीं था.
इन सभी देशों में हुए हिंसक प्रदर्शनों के अलग-अलग कारण हैं. अधिकतर देशों में प्रदर्शन तानाशाही, भयंकर महंगाई और भ्रष्टाचार, अव्यवस्था, सरकार में भाई भतीजावाद, इत्यादि को लेकर हुआ था. इनमें से कोई भी कारण भारत के संदर्भ में उपयुक्त नहीं बैठते हैं. भारत में न तो तानाशाही है, न ही इस सरकार के समय में मंहगाई, भ्रष्टाचार या भाई-भतीजावाद है.
यह स्पष्ट है की नागरिकता संशोधन कानून का भारत के नागरिकों पर कोई प्रभाव नहीं पड़ेगा. पूर्वोत्तर राज्यों को कुछ शिकायतें हो सकती है और उनकी शिकायतों को दूर करने के लिए गृहमंत्री अमित शाह ने प्रतिबद्धता जताई है.
यह आशा करता हूं कि भारत के फिल्मी, संगीत, कला, साहित्य तथा अल्पसंख्यक समुदाय के लोग धार्मिक प्रताड़ना से भाग कर आए अल्पसंख्यक समुदाय का समर्थन करेगा.
एक प्रगतिशील, सहनशील और सेकुलर भारत तीन इस्लामी देशों में प्रताड़ित किए गए अल्पसंख्यक समुदायों को अपने यहां नागरिकता दे रहा है. सभी भारतीयों को मोदी सरकार की इस उदार नीति का स्वागत करना चाहिए.
विपक्ष को यह समझना चाहिए कि हो सकता है 15 प्रतिशत भारतीय इस्लामिक देशों से भगाए गए अल्पसंख्यकों को कोई भी अधिकार देने के विरोध में है. लेकिन अन्य 85 प्रतिशत भारतीय प्रताड़ित अल्पसंख्यकों के साथ खड़े हैं. क्योंकि बहुसंख्यक भारतीय स्वभाव से ही उदारवादी हैं.
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