“माँ!” मैं तेरा बच्चा हूँ।

*"कहते हैं मेरी माँ की पहली पुण्य तिथि है आज!!"*

"हाथ में लेकर कलम मैं हालेदिल कहता गया!
काव्य का निर्झर उमड़ता आप ही बहता गया"!!

माएं कभी मर ही नहीं सकतीं। मां एक अहसास का नाम है। इसे मौत तो छू भी नहीं सकती।

मेरी मां अब तक ज़िन्दा है मेरे साथ, दुनिया कहती है कि वह तो 1 वर्ष पहले ही चली गयी।
झूट कहते हैं सब!

मांएं तो पुण्‍य फल होती हैं । मां तो एक आशीष होती है, जो हर कड़े समय में हमारे सर पर साया कर देती है । मां को किसी एक शरीर के रूप में नहीं देखना चाहिये। मां तो सर्वत्र होती है। मां का नेह उसके बाद भी हमें मिलता रहता है । वो शायद ऊपर जाकर स्‍वर्ग में भी वहां के देवताओं के साथ इसी बात पर झगड़ती है कि मेरी संतानों को ये परेशानी क्‍यों दी जा रही है। हर रूप में हर रंग में वो अपने बच्‍चों के लिये ही जीती है। किन्‍तु ये भी सच है कि मां जब साकार रूप में हमारे साथ होती है तब हमें ऐसा लगता है कि हमारा तो कोई कुछ बिगाड़ ही नहीं सकता, हमारी मां तो हमारे साथ है। वो कहीं भी है लेकिन वो जो ईश्‍वर के सामने बैठी आंखें मूंद कर हमारे लिये दुआएं मांग रही है वो दुआएं हमारी हर मुश्किल का समाधान हैं । मैं तो उस संसार की कल्‍पना करके ही खौफ से भर जाता हूं जिसमें मांएं नहीं हों।

माँ कभी मरती है क्या...वो एक अहसास है, वो एक आशीष है, वो मेरी सांस है...उससे ही तो मैं हूँ..वो मेरी हर धड़कन में है..वो कोई एक तन नहीं जो मर जाये और हम उसे भूल जायें पिण्ड दान कर पुरखों में मिला कर।

कहते हैं कि संसार नश्वर है। कोई अमर नहीं है। सबको जाना है। जाने वाले फिर लौट कर नहीं आते। जाने वाले की याद आती है।

क्या वाकई ऐसा है?
नहीं! हम जिसे प्यार करते हैं वह हमेशा हमारे दिल में होता है।
हमेशा हमारे साथ रहता है।
कभी नहीं मरता।
दुनिया चाहे जो भी कहे।

परमपिता के ध्यान में टिके न लाख टिकाये।
माँ की ममता में मगर मन आनन्द मनाये।।

होने को भगवान भी, बड़ी कौन सी बात।
“माँ होना” भगवान की भी पर नहीं बिसात॥

मन से किस सूरत हटी मूरत माँ की बोल।
बच्चे से बूढे हुए माँ फिर भी अनमोल॥

दूह दूह कर स्वयं को किया हमें मजबूत।
कैसे माँ के दूध का कर्ज़ उतारें पूत॥

माँ की ममता की अरे समता नाही कोय।
क्षमता माँ की क्या कहूँ प्रभु भी गर्भ में सोय।

सात समुद्रों से भी ज्यादा
तेरे आँचल में ममता है।
देखी हमने सारे जग में,
ना तेरी कोई समता है॥

सौम्य सुमन सरसिज के हरसें
सरसें स्नेह सरोवर नाना।

सुधा स्पर्श सा सुन्दर शीतल
सुखद श्वास प्रश्वास सुहाना।
कल्पशाख से वरद सुकोमल
कर अभिनव मृणाल उपमाना॥
स्वर्ग और अपवर्ग सभी कुछ,
माँ की गोदी में रमता है॥

हो शुचि रुचि पावन चरणों में,
तेरा करूँ चिरन्तन चिन्तन।
शीश चढ़ा दूँ मैं अर्चन में,
अर्पित कर लोहू का कण कण॥
मणिमय हिमकिरीटिनी हेमा
माँग रहे वर तव सेवक जन।
शुभ्रज्योत्स्ना स्नात मात तव
वत्स करें शत शत शुभ-वंदन॥
सप्त सिन्धु का ज्वार तुम्हारे
पद पद्मों को छू थमता है।।

आज माँ को गये पूरे 1 बरस हो गये। लगता है कल ही बात हुई थी।

जाने के तीन दिन पूर्व ही फोन से बात हो रही थी। तब सोचा भी नहीं था कि यह बात आखिरी बार हो रही है। हिमाचल जा रहा था तय पाया था कि दो सप्ताह बाद लौट कर फिर मुलाकात होगी। वो पल फिर कभी नहीं आया। दिल्ली में बहन के पास पहुंचा हीं था कि फोन आया, मां अब नहीं रही!

मां से फोन पर जो भी बातचीत होती थी, वो मैं रिकॉर्ड कर लेता था। अब जब भी मां की याद आती है, रिकार्डिंग सुन लेता हूँ। लगता है कि कल ही उससे बात किया था। ये एक साल, एक खालीपन, कब निकल गये मैं नहीं समझ पाया। अभी भी वो रोज मिलती है मुझे ख्वाबों में। कोई रात याद नहीं जब वो न आई हो। जाने क्या क्या समझाती है। मैं झगड़ता भी हूँ वैसे ही जैसे जब वो सामने थी... फिर नींद खुलने पर रोता भी हूँ मगर वो रहती आस पास ही है। तन से नहीं...मन से तो वो गई ही नहीं। चुप करा देती है। कोई जान ही नहीं पाता उसके रहते कि मैं रोया भी।

मैं उसके नाम के साथ स्वर्गीय लगाने को हर्गिज तैयार नहीं आज एक साल बाद भी। वो है मेरे लिए आज भी वैसी ही जैसी तब थी जब मैं उसे देख पाता था। तुम न देख पाओ तो तुम जानो।

माँ कभी मरती है क्या...वो एक अहसास है, वो एक आशीष है, वो मेरी सांस है...उससे ही तो मैं हूँ..वो मेरी हर धड़कन में है..वो कोई एक तन नहीं जो मर जाये और हम उसे भूल जायें पिण्ड दान कर पुरखों में मिला कर।

विश्व की हर माँ सिर्फ माँ होती है और बस माँ होती है..भगवान की भी कहाँ इतनी बड़ी बिसात कि माँ बन पाये..भगवान होना अलग बात है!!! वो इससे बहुत उपर है।

आखिरी समय में मैं मां के समीप नहीं था।  बस, कभी हिसाब करने का मन करता है कि यहाँ आकर क्या खोया, क्या पाया!!

""माँ की ममता का कोई मूल्य नहीं है। मैं आपको बता दूँ की जिन लोगों की माँ होती है वे बहुत ही भाग्यशाली होते हैं उनकी किस्मत कभी भी उनका साथ नहीं छोडती है और दुनिया की सबसे कीमती चीज माँ पिता का आशीर्वाद होता है।""

मां के साथ गुजरे लम्हों को "बिखरे मोती" के रूप में एक किताब लिख रहा हूँ।  माँ को समर्पित यह पुस्तक अनायास ही माँ की याद सामने ले आई, बस, कुछ पंक्तियाँ बह निकली..अनगढ़ सी...बिना सुधार मय आंस

आज फिर रोज की तरह

माँ याद आई!!

माँ

सिर्फ मेरी माँ नहीं थी

माँ

मेरे भाई की भी

मॉ थी

और भाई की बिटिया की

बूढ़ी  दादी..

और

मेरी बहन की

सिर्फ माँ नहीं

एक सहेली भी

एक हमराज...

और फिर उसकी बेटियों की

प्यारी नानी भी वो ही...

उनसे बच्चों सा खेलती नानी...

वो सिर्फ मेरी माँ नहीं

वे नानी की

प्यारी बिटिया

वो थी

अपनी छोटी बहिन और भाईयों की दीदी

और अपनी दीदी की नटखट छुटकी..

नाना का अरमान

माँ सिर्फ मेरी  ही नहीं..

उसकी बेटी की भी

माँ थी...

माँ

कितना कुछ थी..

बस और बस,

माँ सिर्फ माँ थी..

हर रुप में..

हर स्वरुप में..

मगर फिर भी

सिर्फ मेरी हीं नहीं...

माँ हर बार

सिर्फ माँ थी।

अब

माँ नहीं है

इस दुनियां में...

वो मेरे पिता की

पत्‍नी, बल्कि सिर्फ पत्‍नी ही नहीं

हर दुख सुख की सहभागी

उनकी जीवन गाड़ी का

दूसरा पहिया...

अब

अब पिता भी साथ छोड़ चुके हैं 


माँ!!

जाने क्या क्या थी

माँ थी

मेरा घर

वो गई

मैं बेघर हुआ!

माँ शब्द को परिभाषित करना मतलब सारी भावनाओं को, सारे अहसासों को, सारी संवेदनाओं को, सारी दुआओं को, सारे त्याग को, अनंत प्रेम को विस्तार में कहना ! माँ के लिए लिखने पर शब्द खत्म हो सकते हैं पर माँ का प्यार अनंत बाहें फैलाकर शब्दों  में समाना ही नहीं चाहता ! माँ तो वो है जो हमारे जन्म से पहले से ही हमारे लिए त्याग करना शुरु कर देती है, हमारी सेहत के लिए अपने पसंद के भोजन तक को बदल देती है, अपनी सारी रातें हमारे नाम कर देती है, अपने सपने सब हमपर कुर्बान कर देती है, खुद की जान पर खेलकर हमें इस दुनिया में लाती है, हमारी पहली गुरु बन कर हमारी शिक्षा की नींव रखती है, गलत सही के बीच भेद बतलाती है, अच्छे बुरे का फर्क समझाती है, हमारी छोटी- छोटी खुशियों में ही वो खिलखिलाकर मुस्काती है, दर्द हमें हो तो आँसू वो बहाती है, हमारी हर बात को बिन कहे समझ जाती है .... माँ के लिए जितना कहा जाये कम ही पड़ता है !

कुछ कभी जब भी माँ की याद आये तो शब्दों में ढ़ालना चाहा ...

जिंदगी की राह में जाने कितने मोड़ आते हैं
कुछ अजनबी मिल जाते तो कुछ अपने छूट जाते हैं
सफर ये रुकता नहीं है किसी के छूट जाने से भी लेकिन
हाँ वक्त वक्त पर छूटे हुये  अपनेे याद बहुत आते हैं .....

माँ के हाथ के खाने में जाने क्या स्वाद था ,
रुखी-सूखी खाकर भी दिल तृप्त हो जाता था !
खुद के बनाये लजीज खाने में भी अब ,
न वो स्वाद है और ना  ही दिल को तृप्ति होती है !!......

माँ का आँचल कितना भी झीना क्यूँ न हो
औलाद को हर अल्ली-झल्ली से बचा लेता है !!....

माँ की दुआएँ ढ़ाल बन जाती हैं
जब भी मेरी जिंदगीं में मुश्किलात आती हैं !!

यूँ तो अपने बहुत हैं कहने को माँ ,
पर तुमसा अपनापन किसी में नहीं है !!

तुम्हारी डांट में भी कितना प्यार छुपा था माँ ,
बेटी का बाप बनकर ही तेरा वो प्यार अब समझ आया !!

बात बात पर रूठ जाया करते और तुम पल में मना लिया करती ,
वो रुठना मनाना आज फिर से  बहुत याद आया माँ !!

सारे भाव अलग अलग परिस्थितियों में माँ की अहमियत का अहसास कराते हैं और माँ की यादों को अनमोल बनाते हैं !

""ज़िन्दगी के सफ़र मै गर्दिशों में धुप में
जब कोई साया नहीं मिलता तब बहुत याद आती है माँ..

प्यार कहते हैं किसे, और ममता क्या चीज़ है,
कोई उन बच्चों से पूछे जिनकी मर जाती है माँ…""

माँ की अपने पास पड़ोस के सभी का हालचाल, सुखदुख का खबर लेना तथा उनके विषय में चिंतित रहना। मोहल्ले के सभी उन्हें बेहद पसंद करते थे। और आज भी जब कभी किसी गली से गुजरें तो अपनी पहचान मां से होती है। पर ये बात हम ही जानते हैं कि चुटकुले सुनाने और समझने में, पूरी दुनिया में, माँ से बुरा कोई नहीं। एक मध्यम-वर्गीय परिवार के लिए बचत करना मशक्कत का काम होता है। पर माँ को कभी कोई मुश्किल दिखाई नहीं दी। उन्हें सिर्फ अपने आठ बच्चों और पतिदेव का आज दिखता था, कल की मां कभी चिंता नहीं की। मेरी मां आज में जीती थी, कल क्या होगा, उन्होंने कभी परवाह नहीं की। बचपन में मुझे ये बात बड़ी चुभती थी कि माँ हमेशा इतनी खुश रहती हैं तो उन्हें नींद क्यों नहीं आती। याद है मुझे, स्कूल से आने के बाद, बड़ी मां के साथ लूडो तो कभी तास खेला करता था। बड़ी मां का अकसर पैर दबाता था। 
लेकिन मेरी मां ने हमें कभी पैर दबाने या सर दबाने अथवा अपनी सेवा करने का कभी मौका, अवसर नहीं दिया। मां बाप की सेवा करने का अक्सर कहानियों में सुनता था, लेकिन अपने जीवन में मां बाप की सेवा मैंने कभी नहीं की।

""मेरे सर पर भी माँ की दुवाओं का साया होगा,
इसलिए समुन्दर ने मुझे डूबने से बचाया होगा..

माँ की आगोस में लौट आया है वो बेटा फिर से..
शायद इस दुनिया ने उसे बहुत सताया होगा…

अब उसकी मोहब्बत की कोई क्या मिसाल दे,
पेट अपना काट जब बच्चों को खिलाया होगा..""

माँ कभी मुझे जीतने नहीं देती थी और न ही हारने देती थी। ये बात तो आज तक कायम रखी है माँ ने – माँ से बातों में कोई जीत नहीं सकता और माँ मुझे कितनी भी बड़ी परेशानी से हारने नहीं देती।

माँ का ज़िक्र हो और माँ के पसंदीदा गानों के कलेक्शन की बात न हो, ऐसा मुमकिन नहीं। 

माँ की यादों और बातों में शामिल हैं किस्से माँ के बचपन के, माँ की मुस्कान, माँ का गुस्सा, माँ की ज़िद्द, माँ के हाथ का खाना, माँ के ढेर सारे ख़ुशी वाले आंसू, माँ का त्याग और ढेर सारा प्यार।
मेरी प्यारी माँ ! जब हो जाओगी अस्सी बरस की , जब नहीं होंगे असली दाँत ठहाके लगाने को, तब याद करना आप मेरी ये बातें, बेतुकी सही मगर प्यार भरी। याद रखना आप कि जो साँसे आपने मुझे दी हैं , वो शब्द बनकर आपके ही किस्से सुना रही होंगी कहीं।

घुटनों के बल रेंगते-रेंगते,
कब इन पैरों पर खड़ा हुआ,
आपकी ममता की छाँव में मां,
जाने कब मैं बड़ा हुआ..
काला टीका, दूध मलाई
आज भी सब कुछ वैसा है,
मैं ही मैं हूँ हर जगह,
माँ प्यार ये तेरा कैसा है?
सीधा-साधा, भोला-भाला,
मैं ही सबसे अच्छा हूँ,
कितना भी हो जाऊ बड़ा,

“माँ!” मैं तेरा बच्चा हूँ।

ब्यथित मन से,
ठाकुर की कलम से

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