बाभन (भूमिहार ब्राह्मण)
बाभन के पर्यायवाची नाम:- अयाचक ब्राह्मण, भूमिहार ब्राह्मण, जमींदार ब्राह्मण, मगही ब्राह्मण, पश्चिमा ब्राह्मण, गृहस्त ब्राह्मण, मिलिट्री ब्राह्मण (Military Brahman)
उपाधियाँ:-
1) राजसी उपाधियाँ:- सिंह/सिन्हा, राय, शाही, ठाकुर, कुंवर, चौधरी
2) ब्राह्मणवादी उपाधियाँ:- शर्मा, पांडेय, शुक्ल, तिवारी, चौबे, मिश्रा, द्विवेदी, ओझा, दुबे, उपाध्याय, याजी, करजी
भूमिहार या बाभन, (Bhumihar or Babhan) पूर्वी उत्तर प्रदेश और बिहार (झारखण्ड मिला कर) में पाई जाने वाली एक ब्राह्मण वर्ग की उपजाति है, जिसका पारंपरिक व्यवसाय भूमि धारण या भूमि आधिपत्य है। भूमिहार और बाभन एक ही जाति के दो प्रचलित नाम है जिसमे भूमिहार भू-स्वामी होने का सूचक है और बाभन जाति का बोधक है। भूमिहार शब्द सबसे पहले 19 वी शताब्दी में सयुंक्त प्रान्त के दस्तावेजों में प्रतीत हुआ। यह शब्द भूमि (आईने अकबरी का) या भौमिक शब्द के पर्याय के रूप में उपयोग हुआ। ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी कोर्ट के शब्दावली के अनुसार भूमिहार शब्द भूमि और हार शब्द से बना है, यह शब्दावली जनवरी 1855 में प्रकाशित हुआ था। भूमि का अर्थ है, अनुवांशिक भूसम्पत्ति जो लगान से मुक्त हो (Bhoomi means a hereditary landed estate free of assessment) और हार का अर्थ है जो लिया हो या रखता हो (haar means who takes it) प्रारंभिक 19वी शताब्दी में भूमिहार वो लोग थे जो अनुवांशिक भूसम्पत्ति रखने थे। ये शब्द ब्राह्मण के भूमिधारी वर्ग के लिए भी उपयोग होता था जिन्हे बाभन या सैन्य ब्राह्मण (military Brahmin) कहा जाता था और अन्य भूमिधारी लोग भी इस शब्द का अनुवांशिक भूसंपदा दर्शाने के लिए उपयोग करते थे। [1][2][3][4][8][9].
प्रारंभिक 20 वी शताब्दी तक भूमिहार शब्द जाति विशेष के लिए न हो कर बस भूमिपति होने का सूचक था। ब्राह्मण भूमिधारियों को बाभन या सैन्य ब्राह्मण (military Brahmin) के नाम से जाना था। बाभन ब्रिटिश रिकार्ड्स में सैन्य ब्राह्मण (military Brahmin) के नाम से दर्ज थे [3][14][15]। बाभन या सैन्य ब्राह्मण (military Brahmin)जाति का नाम था और भूमिहार उसके भूस्वामी होने का सूचक था| भूमिहार या भौमिक शब्द जमींदार शब्द का समानार्थी है जिसका अर्थ भूस्वामी या भूमि का मालिक होना मात्र है। राजपुताना गैज़ेटेर में भूमि शब्द का प्रयोग भूमि के अनुदान का बोधक है। योगेंद्र नाथ भट्टाचार्य ने लिखा है की भूमिहार ब्राह्मण वो ब्राह्मण हैं जो भूस्वामी हो गए। [2] भूमिहार लोग प्रायः राजसी उपाधिया लगते थे, जैसे राय, सिंह, शाही, ठाकुर, चौधरी और कुंवर। [3] ये राजसी उपाधिया बस भूस्वामी होने का बोधक था। 19वी और 20वी शताब्दी के प्रारम्भ तक भूमिहार शब्द कोई जाति सूचक शब्द न होकर भूमिपति होने का बोध करता था। १९११ के जनगणना रिपोर्ट से पहले की जनगणना दस्तावेजों में बाभनो के लिए बस बाभन शब्द का ही प्रयोग हुआ है। बाभनो को ब्रिटिश जनगणना में सैन्य और प्रभावी समुदाय के वर्ग (military and dominant caste) में वर्गीकृत किया गया था। तागा (त्यागी) को भी इसी वर्ग में रखा गया था। 19वी शताब्दी में बाभनो के लिए कुछ जलनशील समुदाय द्वारा मिथ्या और कल्पित कथा लिखा गया जिसमे ये दिखाया गया की बाभन का मतलब पतित ब्राह्मण होता है। [3][19][20][21] इसके प्रतिउत्तर में भूस्वामी बाभनो ने (1885 में) एक सभा का निर्माण किया जिसे बाद में भूमिहार ब्राह्मण सभा का नाम दिया गया। बाभन अपने आपको श्रेष्ठ ब्राह्मण मानते है और परशुराम द्वारा अत्याचारी क्षत्रियो को मारने के उपरांत भूमि मिलने के कारन भूमिहार कहते हैं। भूमिहार ब्राह्मण सभा ने 1911 में बंगाल और बिहार के जनगणना कार्यों के निदेशक (E A Gait) को अभ्यावेदन दायर किए, जिसमें तर्क दिया गया कि जनगणना के प्रयोजनों के लिए, "बाभन" शब्द का उपयोग उनका वर्णन करने के लिए नहीं किया जाना चाहिए और इसके बजाय उन्हें भूमिहार या भूमिधारी ब्राह्मण बुलाया जाना चाहिए।[5][10] इस तरह 1921 के जनगणना रिपोर्ट में बाभन नाम के साथ भूमिहार ब्राह्मण शब्द जुड़ा और इस जाति को जनगणना दस्तवेजों में बाभन(भूमिहार ब्राह्मण) लिखा जाने लगा। आज के समय भूमिहार ब्राह्मण शब्द ही छोटा होकर केवल भूमिहार हो गया है। 1911 के ब्रिटिश जनगणना के उपरांत ही बाभन शब्द में भूमिहार ब्राह्मण शब्द जुडा। उसके पहले के जनगणना (जैसे 1872,1881,1891,1901,1911) में बाभनो को शाही तालिका (इम्पीरियल टेबल) में बस बाभन नाम से ही दर्शाया गया था। [5][10] संयुक्त प्रान्त में भूमिहार शब्द का उपयोग किया गया था और उसे भी बाभन का हिस्सा दिखाया गया था। अब प्राचीन बाभन नाम केवल ब्रिटिश कालीन और उससे पहले के एतिहासिक दस्तवेजों में रह गया है। आज भी मगध के ग्रामीण क्षेत्रो में इस जाति को बाभन के नाम से ही बुलाया जाता है। भूमिहार ब्राह्मण सभा द्वारा प्राचीन बाभन नाम के बदले भूमिहार ब्राह्मण नाम प्रशिद्ध करने के लिए विद्यालय और विश्वविद्यालय का नाम भूमिहार ब्राह्मण रखे गए जैसे लंगट सिंह कॉलेज, भूमिहार ब्राह्मण कॉलेज के नाम से खोला गया था। भूमिहार केवल बाभन समुदाय का भूस्वामी होने का बोध करने वाला शब्द था जो बाद में मुख्य नाम बन गया
बाभन शब्द मौर्या शाषक अशोक के शिलालेखों में 20वीं शताब्दी के प्रारम्भ में मिला। 20 वी शताब्दी के प्रारम्भ में कुछ इतिहासकार यह निष्कर्ष निकलने लग गए
की बाभन वे ब्राह्मण थे जो बुद्ध की सरण में चले गए और बाद में हिन्दू बन गए। रामप्रसाद चंद्र ने यह दिखाया की अशोका के शिलालेखों में बाभनो के बौद्ध होने के बारे में कुछ भी नहीं लिखा है ये केवल एक कल्पना है जिसका कोई ठोस साक्ष्य नहीं है। [6][18]
रिसले (H. H. Risley) एक विख्यात मानव-जाति विज्ञानविद् थे। उनके अनुशार बाभन दो भाग में बाँटे हैं एक मूल (territorial clan) और दूसरा गोत्र है। मूल बाभनो के प्राचीन उद्गम स्थान के नाम का बोधक है। गोत्र उस प्राचीन ऋषि के बारे में बताता है जो गोत्रधारी के पूर्वज हैं। गोत्र बाभनो और अन्य ब्राह्मणो के समान हैं। बाभनो में विवाह में प्रतिबन्ध के लिए गोत्र से ज्यादा मूल का ध्यान दिया जाता है। समान गोत्र वाले बाभन यदि भिन्न भिन्न मूल के हैं तो वैवाहिक प्रतिबन्ध नहीं होता। रिसले का मानना था की बाभनो के अलाबा ऐसी रचना राजपूत समुदाय में होता है। योगेंद्र नाथ भट्टाचार्य ने ये बताया की मैथिलि और सारस्वत ब्राह्मणो में भी बाभनो जैसी रचना है|[3][2]
बाभन नामांकरण की उत्पत्ति के बारे में सबसे विश्वसनीये व्याख्या रामप्रसाद चंद्र की पुस्तक में दी हुई है(Indo-Aryan races, A study of the origin of Indo-Aryan people and institutions by Chanda, Ramaprasad]|[6] बाभन मगध के प्राचीन स्थानीय ब्राह्मण हैं जो तीसरी ईशा पूर्व में ऐसी भाषा बोलते थे (प्राकृत भाषा की मगधन बोली ) जिसमे ब्राह्मणो को बाभन या बाम्भन कहा जाता था। इसलिए ये शब्द अशोक के शिलालेखों में मिलता है। मगध में मध्य और उत्तर पश्चिम भारत से बहुत सारे संस्कृत बोलने बाले ब्राह्मण बाद के काल में आये जो संस्कृत नाम से जाना जाने लगे और स्थानीय पाली बोलने बाले ब्राह्मण कालांतर में बाभन कहे जाने लगे। मगध में बहुत सारे स्थानीय ब्राह्मणो के राजवंश हुए जैसे कण्व और शुंग ये स्थानीय ब्राह्मण बाभन नाम से ही जाने जाते थे और ये भूस्वामी भी थे। स्थानीय ब्राह्मणो का मगध शाषन में मुख्य भूमिका रहा है। ये सभी अयाचक ब्राह्मण वर्ग बाभन थे जो सैन्य और प्रशाषन के कार्यो में भाग लेते थे। फा हियान, चीनी यात्री ने मगध के ब्राह्मणो को ज्ञान गुरु होने के बजाय भू-स्वामी बनने के बारे में लिखा है।[6][18]
बहुत सारे अन्य ब्राह्मण वर्ग के भूपति लोग बाभन समुदाय में मिलते गए और बाभनो के अंग हो गए। कान्यकुब्ज, सरयूपारीण, चितपावन (चितपोनिया बाभन जो मगध के नवादा में वास करते हैं) मोहयाल (सर गणेश दत्त ) ब्राह्मणो से बहुत सारे भूस्वामी वर्ग बाभनो में मिले और इसके हिस्सा हो गए। स्वयं कशी नरेश सरयूपारीण मूल के बाभन हैं | [7][19]
संपूर्ण जनगणना के रिकॉर्ड के साथ-साथ जिलों के गजेटियर और अंग्रेजों के समय के मानव-जाति विज्ञान अध्ययन ने बाभन को भुइंहार (भूमिहार का विकृत बोलचाल का शब्द) का पर्याय के रूप में दिखाया है।बाभन शब्द का प्रयोग किसी ने भी उस काल में अन्य ब्राह्मणो के लिए नहीं किया। ब्रिटिश काल में भुइंहार (भूमिहार का विकृत बोलचाल शब्द ) शब्द को लेकर एक उलझन थी, यह शब्द बाभनो के अलावा कुछ पारम्परिक भूस्वामी आदिवासी भी छोटानागपुर में प्रयोग करते थे। भूमिहार शब्द से केवल भूमि का मालिक या भूमि का कारोबारी होने का बोध होता था[4][8][9].
ब्रिटिश समय के विश्वसनीय दस्तावेजों में यह स्पष्ट रूप से कहा गया है कि बाभन या बाम्हन या बाम्भन, सैन्य और भूमिहार या ज़मींदार ब्राह्मण हैं। फ्रांसिस बुचनान ने बाभनो को मिलिट्री ब्राह्मण, मगही ब्राह्मण, पश्चिमा ब्राह्मण के नाम से सम्बोधित किया था। मगही और पश्चिमा ब्राह्मण बाभनो के मूल के उद्गम स्थान को दर्शाता है जो की मगध और बाभनो के अभी के निवास स्थान के पश्चिम का क्षेत्र है । बाभनो को भू-पति होने के कारन ही भूमिहार कहा गया।
19वी और प्रारंभिक 20वी सदी में बाभन समुदाय के प्रमुख भूस्वामी व राजा निम्नलिखित हैं:
1) काशी नरेश, वाराणसी
2) तमकुही राज, गोरखपुर
3) बेतिया राज, चम्पारण
4) टेकरी राज, गया
5) हथवा राज, सारण
6) शिवहर राज,
7) मधुबन के राजकुमार बाबू, चम्पारण
8) पाकुर के राजा, संथाल परगना,
9) आनापुर राज, इलाहाबाद
10) बराओं राज, इलाहाबाद
उपरोक्त लेख नीचे संदर्भ में दी गई पुस्तकों का एक अंश है
References:
[1] A glossary of judicial and revenue terms
https://archive.org/details/cu31924023050762/page/n115
[2] Hindu Castes and Sects: An Exposition of the Origin of the Hindu Caste yogendra nath bhattacharya
https://archive.org/details/hinducastesands00bhatgoog/page/n132
[3,a] The Tribes And Castes Of Bengal: Ethnographic Glossary, Volume 1 By Risley, Herbert Hope, Sir, (https://archive.org/details/TheTribesAndCastesOfBengal/page/n139
[3,b] Census Of India 1901 Vol.1 (india ) (ethnographic Appendices) By Risley, Herbert Hope, Sir, (https://archive.org/details/in.ernet.dli.2015.55922/page/n199
[4] Census of India, 1901 by India. Census Commissioner
https://archive.org/details/cu31924071145571/page/n233
[5]Peasants and Monks in British India by William R. Pinch
Peasants and Monks in British India (https://publishing.cdlib.org/ucpressebooks/view?docId=ft22900465&chunk.id=s1.3.13&toc.id=ch3&toc.depth=1&brand=ucpress&anchor.id=d0e4900#X)
[6] Indo-Aryan races: a study of the origin of Indo-Aryan people and institutions : Chanda, Ramaprasad
(https://archive.org/details/Indo-aryanRacesAStudyOfTheOriginOfIndo-aryanPeopleAndInstitutions/page/n173)
[7] Hindu Tribes and castes
Hindu Tribes And Castes Vol 1 : Sherring : Free Download, Borrow, and Streaming : Internet Archive (https://archive.org/details/in.ernet.dli.2015.469749/page/n63)
[8] Census of india 1901, Census of India, 1901 : India. Census Commissioner : Free Download, Borrow, and Streaming : Internet Archive (https://archive.org/details/cu31924071145571/page/n405)
[9] East India (Census) [microform] : General report of the census of India, 1901
( https://archive.org/details/pts_eastindiacensusg_3720-1115/page/n513)
[10]Census of India 1931 (Census Of India 1931 Vol.7 Bihar And Orissa Pt.1 Report : Lacey, W.g. : Free Download, Borrow, and Streaming : Internet Archive)
[11]. Statistical Account Of Bengal Vol.12 : Hunter, W.w. : Free Download, Borrow, and Streaming : Internet Archive (https://archive.org/details/in.ernet.dli.2015.534069/page/n197)
[12]. A Statistical Account Of Bengal Vol.xiii : W.w.hunter : (https://archive.org/details/in.ernet.dli.2015.279433/page/n237)
[13]. Report of a tour in Bihar and Bengal in 1879-80. Vol. 15 : (https://archive.org/details/pli.kerala.rare.12155/page/n121)
[14]. A Manual of the Land Revenue Systems and Land Tenures of British India : Baden Henry Baden -Powell : Free Download, Borrow, and Streaming : Internet Archive (https://archive.org/details/amanuallandreve01powgoog/page/n247)
[15]. Report On The Census Of Bengal(1872) : Beverley, H. : Free Download, Borrow, and Streaming : Internet Archive (https://archive.org/details/in.ernet.dli.2015.94529/page/n217)
[16]. Bengal District Gazetteers Sahabad : O’malley L. S. S. : Fre (https://archive.org/details/in.ernet.dli.2015.206888/page/n59)e Download, Borrow, and Streaming : Internet Archive
[17]. Bengal District Gazetteers Darbhanga : O’malley L. S.s. : Free Download, Borrow, and Streaming : Internet Archive (https://archive.org/details/in.ernet.dli.2015.206867/page/n55)
[18] Journal of the American Oriental Society by American Oriental Society
https://archive.org/details/journalvolume04socigoog/page/n90
[19] Memoirs on the History, Folk-Lore, and Distribution of the Races of the North Western Provinces of India, Vol. 1
https://archive.org/details/memoirsonhistory01henr/page/24
[20] Imperial Gazetteer Of India Vol 2
https://archive.org/details/in.ernet.dli.2015.281524/page/n225
[21] The Imperial Gazetteer Of India Vol Xxiii Singhbhum
https://archive.org/details/in.ernet.dli.2015.61214/page/n285 (tekari raj)
[22] Journal Of The Asiatic Society Of Bengal 1904 Vol Lxxiii Part I
https://archive.org/details/in.ernet.dli.2015.280545/page/n191 (Hathua raj)
अनुरोध:- मेरा सभी इंटरनेट पोर्टल्स से यह अनुरोध है की वो भूमिहार ब्राह्मण के साथ साथ बाभन शब्द का भी प्रयोग करे। यह शब्द हमारे समाज से सदियों से जुड़ा है और हमारे समाज के प्राचीनता को दर्शाता है। भूमिहार ब्राह्मण / बाभन लोगो को अपने राजसी उपाधियों के साथ साथ एक समान उपनाम भी अपनाना चाहिए जिनसे उनमे एकता आये। बाभन शब्द शायद एक समान उपनाम की कमी को पूरा करे। बाभनो में बहुत सारे राजसी उपाधियों के कारन काफी भ्रम पैदा होता है इसलिए समान उपनाम हमारे समुदाय में एकता लाएगा । राजसी उपाधियाँ बाभनो के अलावा अन्य समुदाय के लोग भी लगते हैं, ये बस भूस्वामी होने का बोध कराता है
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