जितनी अच्छी नौकरी उतना ही दहेज। कहने को कोई कुछ भी कहे लालसा और लालच के पांव चादर से भी ज्यादा लम्बे होते है।
गरीबी और अभाव में रह कर कोई लड़का अगर अच्छे नौकरी में आ गया तो पिता, जिसकी बहती छीछन वो खुद कभी नहीं पौंछ पाता था, आज अपेक्षा करने लगता है कि लोग आयें और रूयेदार टावेल से उसकी नाक पोछे।
जिसने गरीबी में रह कर खुद अपनी बेटियों का व्याह नाक रगड़ रगड़ कर आरज़ू मिन्न्त करके किया होता है, अचानक लड़के के अच्छे नौकरी में आते ही वो सब भूल जाता है हवा में उड़ने लगता है।
उसे चाहिए होती है बहू के साथ चार पहिया गाड़ी, लाखों रूपया और जेवरात।
वो अपनी रूसवाई के दिन, जिल्ल्त भरी जिन्दगी के दिन भूल जाता है। जब उसने अपनी बेटी व्याही थी तो कैसे गिड़गिडाया था। दरवाजे दरवाजे भटका था।लोगों की रूसवाई सही थी। देखने दिखाने में हजारों रूपया नाश्ते में उड़ा चुका होता है।
ये दस्तूर है, सामाजिक तस्वीर है।आज जब वो अपने बेटे को व्याहता है सारा दर्द भूल चुकता होता है अब वो बादशाह होता है, जो शहजादे की शादी में शहर की बड़ी से बड़ी होटल में सारा इंतजार चाहता है।
ऐसा सोचने से पहले वो अपने घर की छानी में लगे गिनती के खपरैल की संख्या भूल चुकता है।
करो भाई अच्छे दिन आये है ।तुम्हें भी तो हक है बराबरी का।उस आनन्द को लेने का, जिसे तुम कल तक आसपास देखते आये हो। आखिर घाव पर मरहम लगाने से ही घाव ठीक होता है, कुरेदने से नहीं।
सरकारी नौकरी में आ चुके लड़के या अच्छे जाब में जा चुके लड़कों को तलाशने के लिये बेटी का पिता अपनी चप्पल रगड़ता है।लाखों नगद का आफर देता है।बेटी सुखी रहे। बच्ची का सुखी जीवन खरीदने का सौदा करता फिरता है।
एक जमाना था जब बच्ची को घर संभालने की शिक्षा दी जाती थी।सिलाई कढाई पाककला और किसी भी परिस्थिति से निपटने में निपुण रहने की कला सिखाई जाती थी। बेटियाँ परिवार के सभी सदस्यों के बीच एडजेस्ट करके चलने को अभयस्त होती थी।
समय बदला। परम्परायें टूटी। संयुक्त परिवार विधटित हुये। एकल परिवारों का जन्म हुआ। मतलब परस्त मानसिकता धुसने लगी। संस्कारों के दोहन की जगह स्वार्थ का दोहन शुरू हुआ।
बेटे ने आई ए एस, यू पी एस सी का फार्म भर दिया, घर की।बचकानी बातों से आधा अफसर वो घर में बैठे बैठे बन जाता हो बाकी बचा कोचिंग क्लास वाले बना देते है। पलंग पर चाय नाश्ता आने लगता है। लल्ला को पढाई में डिसटरवेन्स पसन्द नहीं।
ठीक इसी तरह स्वावलंबी होने के नाम पर बेटियों को अवांछित स्वतंत्रता उन्हें धोवी की गदही जैसा बना डालती है। कहो तो ऐसा बोलोगे कि बोलता है।
अब बात आती है व्याह की।रोजगार पा चुका लड़का पटवारी, फारेस्ट गार्ड, बाबू बन चुका बालक अब शीशे की माफिक हीरे में तराशा जाता है।
विवाह में भी अब परिवर्तन होना चाहिए। सरकारी नौकरी मिलती नहीं। लड़का बेरोजगार। रोजगार वालो की बोली नीलामी होती है।
मत हो परेशान। मै कहता हूँ मत हो परेशान। दोनों पक्ष जो शादी में खर्च करते है। पटाखे फोड़ देते है।शहर के हर उस आदमी को रिसेप्सन पर बुलाते है जिसके बगल में खड़े होकर फोटो खींच जाने से वाहवाही की उम्मीद लगाये रहते है। मत करो ऐसा।
दोनों पक्ष मिल कर बराबर दस दस लाख मिला कर छोरे को रोजगार करा दो। स्टेन्ड कर दो उसे। उसे बिटिया व्याह कर दो।पूतो फलो दूधो नहाओ।
घर बसा दो, घर बना दो। भाड़ में गयी सारी पंचायत। दोनों एक जैसे है खींच लेंगे अपनी गाडी।
नामुराद हो चुकी इस व्यवस्था को बदलने में हर्ज ही क्या है जब हमने पहले ही सब कुछ बदल दिया है तो।
पलंग पर बैठ कर जीमने बाले लड़को और स्वावलम्बन के नाम पर आजादी की स्वतंत्रता पा चुकी बच्चियो के छत्तीस नहीं सौ गुण मेल खायेंगे।
वक्त हमेशा बदलाव की नसीहत देता है।
"ठाकुर की कलम से"
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