तीन दिन से तुम आई नहीं थी....
न मंदिर... न क्लास... न मेरे घर...
बिना किसी झिझक के, दरभंगा टॉवर के पास शिवाजी नगर के तुम्हारे लॉज में चला आया था।
याद नहीं, कोई छुट्टी का समय था शायद... लॉज लगभग पूरा खाली था। तुम्हारे कमरे के बाहर ही...कुछ अजीब... कुछ भरा भरा सा महसूस हो रहा था... ज़िंदगी का ज़िन्दगी से मिलना कैसा होता है तुम जानती हो ना..!!
दरवाजा हल्के धक्के से ही खुल गया था..!! तुम पिछले तीन दिन से हाई फीवर से बेसुध थी...न कमरे से बाहर निकली... ना कोई बाहर से अंदर आया था।
"धराआआआआ.... ये क्या हाल कर लिया है तुमने.... एक बार कॉल नही कर सकती थी...??"
लगभग चीखते हुए झपटा था मैं, पर...पर तुम तो बेसुध थी...ना ख़ुद का होश ना कपड़ो का ख़याल!! बस उसी बेहोशी में बड़बड़ा रही थी...
"आकाश... मेरे आकाश... तुम आओगे ना... आ जाओ ना... तप रही-जल रही तुम्हारी धरा आकाश...!"
"धरा... मैं आ गया धरा...देखो ना... तुम्हारा आकाश आ गया.."
बड़ी मुश्किल से तुम्हारा सिर अपनी गोद में ले पाया था...! पानी पिलाने की कोशिश नाकाम रही, बस अपनी तपती धरा को गोद में लिए रोता रहा..!!
अचानक... फुसफुसाते हुए अर्ध बेहोशी में ही कहा था तुमने.." बुद्धू... मरने वाली नही हूँ... तुम आकर ज़िंदगी जो दे गए। अब ज़िंदगी की बाहों में कोई मरता है क्या मेरे आकाश....??"बोलते-बोलते फिर बेहोश हो गई थी तुम।
मैं धीरे से गोद से उतारा तुम्हें, बेड पर लिटाया, कपड़े ठीक किये तुम्हारे, कम्बल ओढ़ाया और डॉक्टर लेने भागा। थोड़ी ही देर में डॉ दास को साथ लेकर लौटा, तुम तब तक बेहोश ही रही, डॉ ने चेक करते ही हड़बड़ाहट से कहा, बुखार दिमाग तक चढ़ रहा है, सबसे पहले जल्दी से पानी से पूरा शरीर पोछना होगा या अच्छा होगा यदि थोड़ी देर तक इन्हें सिर से नहला दिया जाए।
वक़्त नहीं था... ना कुछ सोचना था... ना कोई झिझक थी..!! डॉ को कुर्सी देकर, उनके सामने ही पूरे अधिकार से तुम्हें गोद में उठा लिया और बाथरूम की ओर चल पड़ा।
#धरा...जन्मों के रिश्ते में संकोच... का क्या स्थान..?? आत्मा के संबंध शिष्टाचार के मोहताज नही होते...ना ही सिंदूर के... ना मंगलसूत्र के...!! फिर हम तो जन्मों-युगों के सहयात्री.. थे... क्या तुम्हारे साँस से मेरी...और मेरी साँस से तुम्हारी ज़िंदगी नही चलती धरा..!!
बाथरूम में धीरे से तुम्हें दीवार से लगाकर बिठाया। एक एक कर तुम्हारे सारे वस्त्र उतारे, दस मिनट तक तुम्हें अच्छे से पोछता नहलाता रहा..!! ठंड... तेज़ बुखार...सिहरन से बार बार तुम लिपटती रही मुझसे... अर्ध बेहोशी में कई बार खरोंचा भी मुझे।
एक बात स्वीकार करूँ धरा...?? "उस दिन...उस वक़्त...सम्पूर्ण नारी के प्रति सबसे पवित्रतम दृष्टि से देखा था मैंने... और तुममें नारी का निर्मलतम रूप देखा था।"
बेवकूफ हैं वो लोग...जो निर्वसन नारी में वासना ढूंढ़ लेते हैं।
फिर तुम्हारे कपड़े लेकर आया। तब तक तुम लगभग होश में आ चुकी थी। थोड़ी संकोच भरी... सलज़्ज़ मुस्कान के साथ इशारे से तुमने कपड़े माँगे, मैंने उतने ही प्यार से मौन झिड़कते हुए तुम्हें मना किया, और... सारे कपड़े... ख़ुद से तुम्हे पहनाया... तुम्हारे बाल ठीक किए... फिर मेरा सहारा लिए तुम कमरे में आई।
मैं तुम्हें बेड पर बिठाकर कुर्सी पर जा ही रहा था कि... पूरे अधिकार से तुमने... मेरा हाथ जोड़ से पकड़ लिया... मानों... पलों की दूरी भी मृत्यु समान हो। मैं वही बेड पर तुम्हारे पास बैठ गया।
डॉ ने एक बार फिर चेक किया... कुछ दवाईयाँ दी...!! इंजेक्शन लगते वक़्त तो तुमने ऐसे पकड़ रखा था मुझे... कि जितना गहरा इंजेक्शन गया शरीर में, उतना ही गहरा तुम्हारा नाखून भी गया मेरे शरीर में। फिर अपना दर्द भूलकर तुम मेरे दर्द से रोने लगी थी।
डॉ चले गए थे... तुम अब कुछ ठीक सी थी।
"आकाश...."
"हूँ"
"किसी दिन यूँ ही मर गई तो....??"
"अरे... क्या बोल रही हो पागल..."
"आकाश...'
"हाँ"
"सचमुच मैं पागल हूँ ना...!! किस हालात में आज तुमने मेरी आत्मा के साथ साथ... मेरे पूरे शरीर को भी छूकर... पवित्र कर दिया आकाश...और... और मैं तुम्हें छूकर... तुम्हें थोड़ा सा भी मलिन नही कर सकी...!!"
"धरा...."
"हूँ"
" आज... ऐसा लगा था...हजारों हर शृंगार एक साथ खिलकर झर गए हों....जैसे स्वर्ग का पारिजात... किसी अमरबेल सी लिपटी हुई थी मुझसे...जैसे... जन्मों की मेरी पूजा साकार हो गई थी..!! आज आकाश ने... अपनी धरा में... सम्पूर्ण नारी का निर्मलतम रूप देखा है...."
"बुद्धू हो तुम....कहते कहते मुस्कुरा पड़ी थी तुम..."
और मैं... तुम्हारे उस मुस्कुराते होठों पर... चुपचाप अपने होठ रख दिया....!!!!!
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