विध्वंस व विनाश से न्यू वर्ल्ड आर्डर का सृजन(13): कुवैत, सद्दाम हुसैन और अमेरिका
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1980 के दशक के अंत होते होते, सोवियत यूनियन के राष्ट्रपति और सोवियत कम्युनिस्ट पार्टी के जनरल सेक्रेटरी मिखाईल गर्बोचेव की ग्लॉसनोट की नीति व उसके द्वारा कम्युनिस्ट पार्टी व शासकीय तंत्र का जनता पर से कठोर नियंत्रण को कम किये जाने का प्रभाव, सभी कम्युनिस्ट राष्ट्रो पर पड़ गया था। सोवियत यूनियन की सेना की हार कर, अफगानिस्तान से वापसी और साथ मे वहां बढ़ते हुये आंतरिक संकट व गिरती अर्थव्यवस्था का सीधा प्रभाव जहां 1991 में यूगोस्लाविया के विघटन में दिखा वही पर मध्यपूर्व एशिया में बिल्कुल अलग तरह से दृष्टिगोचर हुआ।
1970 के दशक से ही मध्यपूर्व एशिया में इराक, सोवियत यूनियन का सबसे करीबी साथी था। सोवियत यूनियन और इराक के बीच सम्बंध कितने प्रगाढ़ थे यह इससे समझा जासकता है कि 1973 में दोनो राष्ट्रो ने 15 वर्षीय 'मित्रता व सहयोग' की संधि ( ट्रीटी ऑफ फ्रेंडशिप एंड कॉपरेशन) की थी। 1980 में जो 8 वर्षीय इराक-ईरान युद्ध हुआ, उसमे इराक ने जो सैन्य सामग्री आयात की, उसका 32% उसने अकेले सोवियत यूनियन से लिया था। इस युद्ध मे इराक की अर्थव्यवस्था चरमरा गई थी और 1990 तक उस पर 14 बिलियन डॉलर की देनदारी खडी हो गयी थी। इराक ने यह धन, ईरान से हुये युद्ध में हो रहे खर्चे के लिए लिया था। हालांकि इराक एक तेल निर्यातक राष्ट्र था लेकिन कुवैत द्वारा बहुतायत में तेल उत्पाद करने के कारण, इराक को तेल से कम आय हो रही थी।
इराक ने अपने इसी वित्तीय संकट से उभरने के लिए 2 अगस्त 1990 में कुवैत पर आक्रमण कर के, दो दिनों में ही उसे विजित कर लिया। इराक के राष्ट्रपति सद्दाम हुसैन की इस घृष्टता की पूरे विश्व मे तीखी प्रतिक्रिया हुई और इसके परिणामस्वरूप 3 अगस्त 1990 को संयुक्त राष्ट्र संघ की सिक्योरिटी कौंसिल ने इराक के विरुद्ध प्रस्ताव पास करके उसे कुवैत से निकल जाने को कहा और ऐसा न होने पर उसके विरुद्ध कार्यवाही करने की चेतावनी दी। सोवियत यूनियन ने इराक के विरुद्ध पारित इस प्रस्ताव के साथ, आवश्यकता पड़ने पर सैन्य कार्यवाही द्वारा इराक पर, सैन्य सामग्री को लेकर प्रतिबंध लगाने के निर्णय का समर्थन किया था।
इस कड़ी चेतावनी पर इराक के राष्ट्रपति सद्दाम हुसैन ने कोई ध्यान नही दिया और कुवैत से निकलने की जगह, उसे इराक के पांचवा प्रांत बना कर, इराक में विलय कर लिया। इसका परिणाम यह हुआ कि संयुक्तराष्ट्र संघ की सिक्योरिटी कौंसिल ने 29 नवम्बर 1990 को प्रस्ताव पास किया कि यदि इराक 15 जनवरी 1991 तक, कुवैत से नही हटता है तो संयुक्तराष्ट्र संघ अधिकृत, अमेरिका के नेतृत्व में गठित संयुक्त सेना, जिसे 'मित्र राष्ट्र सेना' कहा गया, सैन्य कार्यवाही करेगी। यहां यह महत्वपूर्ण है की एक तरफ संयुक्तराष्ट्र संघ में सोवियत यूनियन, इराक के विरुद्ध हो रहे प्रस्तावों का समर्थन कर रहा था तो दूसरी तरफ सोवियत यूनियन, इराक की सैन्य सहायता भी कर रहा था। सोवियत यूनियन की सेना जिसे रेड आर्मी कहा जाता था, उसके सैन्य अधिकारी और विशेषज्ञ इराक की सेना को प्रशिक्षण और सहयोग दे रहे थे। सोवियत यूनियन की इस परोक्ष सहायता के कारण ही सद्दाम हुसैन हठधर्मी हो गया था। उस वक्त सद्दाम हुसैन को सोवियत यूनियन के अंदरूनी हालातों की वास्तविकता का पता नही था और इसी के अभाव में सद्दाम, सोवियत यूनियन से जरूरत से ज्यादा अपेक्षा कर बैठा था।
इसका परिणाम यह हुआ कि 16 जनवरी 1991 को संयुक्तराष्ट्र संघ द्वारा अधिकृत मित्र राष्ट्र सेना ने इराकी सैन्य ठिकानों पर हवाई आक्रमण कर दिया और इराकी वायुसेना को ध्वस्त कर दिया। बाद में थलसेना ने कुवैत में प्रवेश किया और 25 फरवरी को कुवैत आधिकारिक रूप से फिर से स्वतंत्र हो गया। भविष्य में 2003 में होने वाले गल्फ वॉर के बीज, अमेरिका के नेतृत्व में मित्र राष्ट्र की सेना की कुवैत में हुई सैन्य कार्यवाही से ही पड़े थे।
सोवियत यूनियन का प्रभाव कम होता जारहा था और इराक में सद्दाम हुसैन और हठधर्मी और बड़बोला होता जारहा था। सद्दाम हुसैन की बाथ पार्टी एक सोशलिस्ट व धर्मनिरपेक्ष पार्टी थी और 1979 में जब उसने इराक में सत्ता संभाली ही तब उसका राजनैतिक चरित्र धर्मनिरपेक्ष ही था लेकिन इराक ईरान युद्ध के बीच ही उसने इराक को एक धर्मनिरपेक्ष राष्ट्र से धीरे धीरे इस्लामिक राष्ट्र बना दिया था। फिर कुवैत में मिली हार के बाद और अमेरिका की मध्यपूर्व एशिया का लेकर की गई भूराजनैतिक गलतियों ने सद्दाम हुसैन को कट्टर इस्लामिक शक्तियों का संरक्षक बना दिया।
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