तुम किसी बुद्ध को देखो, तुम पाओगे कि वे चलते हैं और चलने को भी प्रेम करते हैं। अगर तुम बोधगया जाओ जहां निरंजना नदी के किनारे बोधिवृक्ष के नीचे बैठे हुए बुद्ध ज्ञान को उपलब्ध हुए थे तो वहां तुम पाओगे कि उनके चरण-चिन्ह सुरक्षित हैं।
बुद्ध एक घंटा ध्यान करते थे और फिर आसपास में घूमते थे। बौद्ध शब्दावली में उसे चक्रमण कहते हैं। वे बोधिवृक्ष के नीचे बैठते थे, फिर घूमते थे; लेकिन उनका घूमना भी ध्यान जैसा ही होता था--शांत और पवित्र...।
किसी ने एक बार बुद्ध से पूछा कि आप ऐसा क्यों करते हैं, कभी आप आंख बंद करके ध्यान करते हैं और कभी चलते हैं। बुद्ध ने कहा कि शांत होने के लिए बैठना आसान है, इसलिए मैं चलता हूं। लेकिन मैं वही शांति साथ लिए हुए चलता हूं। मैं बैठता हूं, लेकिन भीतर वही रहता हूं--शांत..। मैं चलता हूं, लेकिन भीतर की शांति वैसी ही बनी रहती है। आंतरिक गुण सदा एकरस है। वे सम्राट से मिलें कि भिखारी से, बुद्ध बुद्ध ही रहते हैं, उनका आन्तरिक गुण एक सा बना रहता है। भिखारी से मिलते समय वे कुछ दूसरे नहीं हो जाते हैं, सम्राट से मिलते समय वे दूसरे नहीं हो जाते हैं। वे वही रहते हैं। भिखारी ना--कुछ नहीं है, सम्राट बहुत--कुछ नहीं है। और सच तो यह है कि बुद्ध से मिलते समय सम्राटों ने अपने को भिखारी महसूस किया है और भिखारीयों ने अपने को सम्राट उनका स्पर्श, उनकी मनुष्यता, उनकी गुणवत्ता एक ही रहती है।
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