*आखिर क्यों ताइवान ने अपने नए पासपोर्ट से चीन का नाम हटा दिया?*
एक तरफ चीन अपना हिस्सा बताकर ताइवान को अंतर्राष्ट्रीय मंचों (International Forum) से बेदखल कराने पर तुला है, तो दूसरी तरफ ताइवान अपने आप को एक आज़ाद देश के तौर पर स्थापित करने के लिए।
Covid-19 के बहाने के साथ चीन का नाम पासपोर्ट से हटाने का मतलब क्या ताइवान के नज़रिये से एक तरह से चीन का बॉयकॉट (Boycott China) है?
हाल में ताइवान ने अंग्रेज़ी कवर वाला जो नया पासपोर्ट (Taiwanese Passport) डिज़ाइन फाइनल किया है, उसमें से 'रिपब्लिक ऑफ चाइना' (Republic of China) गायब है! हालांकि कवर पर चीनी अक्षर ज़रूर लिखे हुए हैं। चीन का उल्लेख हटाकर इस पासपोर्ट पर 'ताइवान' और बड़े अक्षरों में लिखा गया है। साथ ही, ताइवान का राष्ट्रीय चिह्न इस पासपोर्ट (Taiwan's New Passport) पर दर्ज है। अब सवाल ये खड़ा हो रहा है कि आखिर ताइवान ने यह कदम क्यों उठाया?
चीन आक्रामक तौर पर ताइवान को अपने ही हिस्से के रूप में प्रचारित कर रहा है और ताइवान पर हमले तक के लिए तैयार है, तब ताइवान के इस कदम का क्या मतलब निकलता है? इससे पहले यह जानना भी ज़रूरी है कि ताइवान सरकार ने इस साल अप्रैल में कहा था कि मौजूदा पासपोर्ट से यह भ्रम था कि पासपोर्ट धारक रिपब्लिक ऑफ चाइना से हैं या पीपुल्स रिपब्लिक ऑफ चाइना से।
इसके बाद ताइवानी सरकार ने जुलाई में विदेश मंत्रालय को पासपोर्ट बदलने के लिए कहा था और स्पष्ट निर्देश थे कि पासपोर्ट पर चीन के बजाय ताइवान को तरजीह मिलना चाहिए। अगले साल से पासपोर्ट बदलने के फैसले के साथ ही ताइवान ने ट्रांसपोर्ट मंत्रालय से चीनी एयरलाइन्स को भी 'ताइवानी एयरलाइन्स' करने की संभावना पर विचार करने को कहा है।
रॉयटर की रिपोर्ट में कहा गया है कि कोरोना वायरस काल में जब ताइवानी लोग हवाई जहाज़ों से यात्रा कर रहे थे, तब पासपोर्ट पर 'रिपब्लिक ऑफ चाइना' लिखे होने से उन्हें काफी मुश्किलों का सामना करना पड़ा क्योंकि कई देशों ने चीनी नागरिकों के प्रवेश पर प्रतिबंध तक लगा रखे थे। दूसरी तरफ, ताइवान उन देशों में शुमार रहा, जहां कोविड 19 पर काबू बेहतर ढंग से पा लिया गया था।
अपने कई पड़ोसियों की तुलना में सफलता पूर्वक कोरोना वायरस पर काबू पाने के लिए सुर्खियों में रह चुके ताइवान को पासपोर्ट के डिज़ाइन की वजह से कई समस्याएं झेलना पड़ीं। लेकिन क्या बात केवल इतनी सी है?
क्या पासपोर्ट से चीन का नाम हटाने के पीछे सिर्फ यही वजह है कि ताइवानियों को चीनी नागरिकों जैसे सख्त प्रतिबंध झेलने पड़े?
वास्तव में कोरोना काल में ताइवानी नागरिकों के साथ चीनियों जैसा जो सलूक हुआ, पासपोर्ट में बदलाव के लिए वो केवल एक ट्रिगर बना। इस तरह के बदलाव के बारे में ताइवानी सरकार कोरोना आउटब्रेक के पहले से विचार कर रही थी। विशेषज्ञों के मुताबिक इस संकट की घड़ी में ताइवान को 'चीन' के नाम के साये से मुक्त होकर अपनी संप्रभुता हासिल करने का रास्ता नज़र आया।
ज़ाहिर तौर पर ताइवान के इस कदम के बाद वह चीन के साथ संप्रभुता की जंग में सीधे तौर पर शामिल हो जाएगा क्योंकि चीन उसकी ज़मीन पर अपना दावा छोड़ने को कतई तैयार नहीं है। कोरोना काल में भी कई मौकों पर चीन ने साफ कहा कि ताइवान उसी का हिस्सा है इसलिए किसी भी अंतर्राष्ट्रीय मंच पर ताइवान अपनी तरफ से अलग से कोई बात नहीं कर सकता। खासकर विश्व स्वास्थ्य संगठन के सम्मेलन में चीन ने यह स्टैंड लिया था।
ताइवानी सरकार पूरी तरह से इस पक्ष में है कि वो अलग देश के तौर पर पहचान कायम कर सके। ऐसे में ताइवान के लोगों का मन क्या कहता है? 2015 में एक लहर दौड़ी थी, तब ताइवानी लोग अपने पासपोर्ट पर लिखे 'रिपब्लिक ऑफ चाइना' की जगह पर एक स्टिकर चिपकाते थे, जिस पर 'रिपब्लिक ऑफ ताइवान' लिखा होता था। चीन ने इस ट्रेंड का सख्त विरोध कर लोगों को प्रवेश न देने की धमकी दी थी और 2016 में मकाउ और हांगकांग ने ऐसे पासपोर्ट वाले ताइवानियों को एंट्री नहीं दी थी।
इसी तरह, सिंगापुर ने भी कुछ ताइवानियों को स्टिकर लगाने के कारण डिपोर्ट कर दिया था। अमेरिका ने भी ऐसे स्टिकरों के पासपोर्ट वालों को एंट्री न देने की चेतावनी दी थी। यह ट्रेंड तो खत्म हुआ लेकिन चीन के प्रति ताइवानियों के मन में खटास बरकरार रही।
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