*"शिक्षक दिवस, आज के परिपेक्ष्य में जरूरी क्यों?"*

*"शिक्षक दिवस, आज के परिपेक्ष्य में जरूरी क्यों?"*

शिक्षक वह दीपक है जो हमारे अंदर ज्ञान का उजाला भरते हैं।
शिक्षक किसी भी देश के विकास में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।
शिक्षक बिना किसी भेद – भाव के सभी छात्रों को शिक्षा प्रदान करते हैं। शिक्षक वे हैं जो हमें गिरते हुए पकड़ते हैं और हमें जीवन का सबसे महत्वपूर्ण सबक देते हैं। शायद यह समाज के लिए उनके योगदान की एक छोटी मान्यता है।
यही कारण है कि एक दिन को अलग करना महत्वपूर्ण है जब शिक्षकों को उनकी मान्यता दी जाती है। हम अपने जीवन में शिक्षकों के योगदान का सम्मान करने के लिए शिक्षक दिवस मनाते हैं। बच्चों की परवरिश में शिक्षकों द्वारा किए गए कर्तव्य बेहद महत्वपूर्ण हैं और इस तरह से शिक्षक दिवस के साथ मान्यता प्राप्त करना पेशे और समाज में उनकी भूमिका को पहचानने की दिशा में एक कदम है।

प्रत्येक वर्ष 5 सितंबर को
राष्ट्र शिक्षक दिवस मनाता है। शिक्षकों को समर्पित ये दिन भारत के पूर्व राष्ट्रपति डॉ सर्वपल्ली राधाकृष्णन के जन्मदिन के अवसर पर मनाया जाता है। शिक्षा के क्षेत्र में कई अहम योगदान देने वाले सर्वपल्ली राधाकृष्णन को 1952 में भारत रत्न की उपाधि भी दी गई थी। आधिकारिक तौर पर 5 सितंबर 1962 से भारत में शिक्षक दिवस मनाने की शुरुआत हुई। एक बार पूर्व राष्ट्रपति से सवाल किया गया कि वो अपना जन्मदिन किस तरह मनाना चाहते हैं तो इस पर उन्होंने कहा था कि अगर मेरे जन्मदिन को शिक्षक दिवस के रूप में मनाया जाए तो उन्हें बेहद प्रसन्नता होगी। तब से प्रत्येक वर्ष इस दिन स्कूल व कॉलेजों में उत्सव का माहौल रहता है।

एक शिक्षक अपना संपूर्ण जीवन हमें ज्ञान और सही रास्ता दिखने में लगा देते हैं। 
महान संत कबीरदास जी ने भी कहा है कि यदि शिक्षक और भगवन दोनों सामने हो तो हमें पहले शिक्षक का चरण स्पर्श करना चाहिए। क्योंकि शिक्षक ही हमें ज्ञान दे कर भगवान तक पहुंचने का रास्ता दिखते हैं।

गुरू गोविन्द दोऊ खड़े, काके लागूं पांय।
बलिहारी गुरू अआपने गोविन्द दियो बताय।।

गुरू और गोबिंद (भगवान) एक साथ खड़े हों तो किसे प्रणाम करना चाहिए – गुरू को अथवा गोबिन्द को? ऐसी स्थिति में गुरू के श्रीचरणों में शीश झुकाना उत्तम है जिनके कृपा रूपी प्रसाद से गोविन्द का दर्शन करने का सौभाग्य प्राप्त हुआ।

टीचर्स डे सभी छात्रों के लिए बहुत महत्व रखता है। इस दिन हम अपने शिक्षकों को बता सकते हैं कि उनका योगदान और मार्गदर्शन हमारे जीवन में कितना महत्व रखता है। इस दिन शिक्षकों और छात्रों का रिश्ता और भी मजबूत हो जाता है।

एक्चुएल हों या वर्चुएल, गुरुओं की भरमार है, शिक्षार्थी आज जितनी तरह के गुरुओं, ज्ञान स्रोतों से ज्ञानार्जन कर रहा है वैसा पहले कभी नहीं था, गुरुओं की भूमिका अचानक बदली है और वे नयी चुनौतियों से दरपेश हैं, गुरुओं के लिये यह गरिमा का समय है तो गाढ़ा वक्त भी है। समय की बलिहारी है, गुरु जो देव स्वरूप दुर्लभ थे आज गली-गली चहुंओर हैं। आज हर विद्यार्थी, शिक्षार्थी, ज्ञान साधक और जिज्ञासु शोधकर्ता दतात्रेय बना हुआ है। सबके हिस्से कई कई गुरु हैं। अंधेरे से निकलकर प्रकाश की ओर ले जाने वाला या कहें अपनी शिक्षा की रोशनी से जीवन-पथ आलोकित करने वाले गुरुओं की आज जितनी भरमार है कभी नहीं थी। कुछ एक्चुअल हैं तो कुछ वर्चुएल। कुछ मुख्य हैं तो कुछ सहायक तो कई अतिरिक्त। कभी जीवन-पथ प्रकाश से रोशन हेतु एक दो अथवा कुछ गुरु ही पर्याप्त थे या उन्हीं से काम चलाना पड़ता था। आज अनगिनत हैं तो जीवन-पथ जगमग ही नहीं चकाकौंध हो गया है। इस चुंधियाई अवस्था में यह समझना और फैसला करना मुश्किल है कि हम जो चाहते थे वह या नहीं चाहते थे वह बनाने में किस गुरु का योगदान कितना है?

निस्संदेह यहां गुरु ने बुद्धि चातुर्य का कार्य किया। यह गुरु की ही सम्यक बुद्धि का सुफल ही था कि उसने गोविंद की तरफ इशारा कर दिया वरना गुरुओं की संख्या और भिन्नता इतनी ज्यादा है कि काको लागूं पांव जैसे सवाल के किसी एक जवाब पर बवाल हो सकता था, सबके पांव गहे नहीं जा सकते थे, एक के पांव पड़ने से काम न चलता विवाद बढ़ता और उचित प्रतिसाद न दे पाने से पश्चाताप होता अलग से, सो इस पचडे से गुरु ने बचा दिया। अब गुरु ही इतने हैं कि श्रद्धा का न्यायपूर्ण कोटा कम पड़ जाता है।

आज 2020 के पूर्वार्ध में शिक्षक की प्रकृति में और शिक्षा प्रणाली और व्यवस्था के क्षेत्र में जो सहभागिता अब तक रही है उसमें भारी बदलाव दिखता है।  इस दर्द के बावजूद कि देश की प्राथमिक शालाओं से लेकर आईआईटीज तक में शिक्षकों की भारी कमी है, कहना पड़ता है कि आबादी के अनुपात में शरीरी और अशरीरी हर तरह के गुरु तेजी से बढे़ हैं। विभिन्न तरह की योग्यता विशेषज्ञता, दावों के साथ भांति भांति के गुरुओं के बीच जो होड़ आज है वह हो सकता है कभी ऋषियों, मुनियों के बीच रही होगी पर इतनी तीखी और इतनी उजागर नहीं।

अब शिक्षकों के आसान विकल्प हैं। आवश्यक नहीं कि वह जीते जागते शिक्षक से ही सीखें। वैसे भी आज कक्षा में खड़ा शिक्षक उस कक्ष में उपस्थित सबसे स्मार्ट या विषय का सर्वज्ञ जैसा जानकार हो इसका दावा नहीं किया जा सकता। कुछ विद्यार्थी भी इतने स्रोतों से ज्ञानार्जन के बाद कक्षा में बैठे हो सकते हैं कि वे उस विषय विशेष की अद्यतन जानकारी शिक्षक से बेहतर रख सकते हैं। हालत यह है कि शिक्षक भी आज विद्यार्थी है, बहुधा तो वह वहीं से सीख रहा होता है जहां से उसका विद्यार्थी यानी इंटरनेट से, मानो गुरु और उसका शिष्य किसी महागुरू के गुरु भाई हुए।

शिक्षक दिवस आता है, स्कूलों में शिक्षक आपस में मिलकर इसे मनाते हैं, विद्यार्थियों का चंदा इसमें शामिल होता है, उनको भी इसमें शामिल होने को कहा जाता है, कुछेक श्रद्धा और सम्मानवश तो कुछ परंपरा के अनुसार तो कई गुरूजी से बेहतर संबंध के लाभ की सोच गिफ्ट भी दे आते हैं। प्रधानमंत्री बच्चों से मन की बातें करते हैं, कुछ बयान, घोषणाएं और समारोह तथा समाचार, बस इतनी सी खानापूर्ति। शिक्षक दिवस बीत जाने पर एकाध स्वर यों भी उठते हैं। अब वह वह न तो पहले जमाने वाले गुरु जी रहे और न ही विद्यार्थी। कोई उन्हें समझाये कि विद्यार्थी तो बरस दर बरस बदलाव से गुजरता है वह पहले जमाने वाला कैसे रह सकता है और जब पहले जमाने वाला कुछ न रहा, न किताब, न कक्षा, न स्कूल तो ये शिक्षक भी पहले जैसा क्यों रहें। शिक्षकों का अनुशासन तो गायब हो चला है, बहुत फ्रेंडली हो गये हैं। गुरु जी के गुरुतर साख में वाकई बड़ी गिरावट आयी है।

अआज के परिपेक्ष्य में फैसला गुरु के हाथ नहीं रहा कि वह किसे सुपात्र समझता है। अर्जुन को सिखायेगा, एकलव्य को नहीं।

असल बात तो यह है कि शिक्षा, शिक्षक, शिक्षण सभी संक्रमण के दौर से गुजर रहे हैं। शिक्षा में तकनीकि, विज्ञान और वैश्वीकरण और बदलाव की बाढ़ कुछ ऐसी आयी है कि शिक्षक उससे पार नहीं पा रहा। तकनीकि और व्यवसाय ने शिक्षा का व्यवसायीकरण पहले से ज्यादा तो किया ही इसे ज्यादा पर्सनलाइज्ड और एडॉप्टिव बना दिया है। तकनीकि उनकी सहायक तो है पर कहीं कहीं उन्होंने इसको प्रतिद्वंदी मान लिया है या बना लिया है। नयी भूमिकाओं ने उनके लिये अचानक ही नयी नयी कई चुनौतियां पेश की हैं। उनकी दो दशक पुरानी पढ़ाई मौजूदा जरूरतों और बदलाव के साथ तालमेल के लिये काफी नहीं है। वह अद्यतन कंटेंट और नॉलेज के साथ संबद्ध करने में सक्षम नहीं हैं जो पढा रहे हैं जैसे पढ़ा रहे हैं वह अधिकतर विद्यार्थी की रुचि और आवश्यकता के खिलाफ होती है। वे मूलतः गुरु कहे जाने के अलावा भी कई कार्य कर रहे हैं। पैसे पर आधारित शिक्षा यह भाव तो जगाती ही है कि हम यह खरीद रहे हैं सो भोक्ता के भाव से प्रतिष्ठा तो कम होगी ही। उधर फर्जी डिग्रियों, कारपोरेट की चचमाती नौकरी के लालच में अच्छे अकादमिक पृष्ठभूमि वालों का शिक्षा में कैरियर न देखने और शिक्षा के निजीकरण में अपनी सुविधानुसार कम वेतन पर अल्पज्ञ शिक्षक रखने जैसे बहुतेरे कारण ऐसे हैं जिसने वर्तमान में शिक्षक ही नहीं शिक्षा व्यवस्था और प्रणाली की पुरानी गरिमा को धूमिल किया है।पर यह वक्ती बात है। शिक्षकों की गरिमा तो नहीं गिरी पर पहले की तरह भक्ति भाव अवश्य बहुत कम हुआ है।

शिक्षक दिवस के दिन शिक्षकों के प्रयासों को सराहा जाता है। वे दिमाग को आकार देते हैं, और हम हर साल दुनिया भर में शिक्षक दिवस के रूप में समाज के विकास में उनके योगदान का जश्न मनाते हैं। हालाँकि, हम साल 5 अक्टूबर को अंतर्राष्ट्रीय शिक्षक दिवस मनाते हैं, जबकि भारत में 5 सितंबर को शिक्षक दिवस मनाया जाता है।

शिक्षक समग्र विकास में कई भूमिकाएँ निभाते हैं

वे बच्चों और छात्रों को नेतृत्व कौशल के लिए मार्गदर्शन करते हैं
वे भविष्य में उन्हें ढालने वाले युवाओं में अनुशासन पैदा करते हैं
साथ ही, वे अपने छात्रों को आध्यात्मिक और भावनात्मक मार्गदर्शन प्रदान करते हैं।
शिक्षक अपने दिन में कई तरह की चुनौतियों से गुजरते हैं जैसे समुदाय द्वारा अनुचित संस्कृति के साथ-साथ अपने छात्रों के अनुशासनात्मक मुद्दों से निपटना।

शैक्षिक दुनियाँ में अब शैक्षणिक के तरीकों में तकनीकी इतनी हावी हो गई है कि पारंपरिक शिक्षकों पर टेक्नोस्मार्ट टीचर बनने का भी दबाव आ गया है। जाहिर है अब शिक्षकों को अपनी भूमिका बदली हुई स्थितियों में निभाने के लिए तैयार हो जाना चाहिए।

कोरोना ने एक झटके में दुनियाँ भर के अध्यापकों को वर्चुअल टीचर में बदल दिया है। इस समय लाखों-करोड़ों टीचर दुनियाँ के किसी ना किसी कोने में हर समय ऑनलाइन रहते हैं। क्योंकि एक झटके में वर्चुअल दुनियाँ स्कूल और कॉलेज की कक्षाओं में बदल गई है।

सवाल है क्या इससे शिक्षकों की भूमिका में भी कुछ बदलाव आया है ? क्या इससे शिक्षकों के प्रति छात्रों की भावनाओं में भी कुछ परिवर्तन हुआ है ? इस सवाल का सटीक जवाब तो आसान नहीं है लेकिन इस बात को तो महसूस कर ही सकते हैं कि अब पढ़ने और पढ़ाने वालों के बीच तकनीकी महत्वपूर्ण भूमिका में आ गई है। भविष्य की पीढ़ियां अब शिक्षकों से कहीं ज्यादा शैक्षिक तकनीक से शिक्षित होंगे। दूसरे शब्दों में अब विज्ञान एक माउस क्लिक प्रक्रिया का हिस्सा है। 
शिक्षक को बदलना होगा, क्योंकि शिक्षकों के हिस्से की बड़ी भूमिका तकनीकी के खाते में चली गई है। देर सवेर कोरोना खत्म तो होगा ही लेकिन अब पढ़ने पढ़ाने की नई भूमिका आने वाली है।

यह अब एक कड़वा सच है कि भविष्य की पीढ़ियों को शिक्षित करने के लिए मौजूदा शिक्षा व्यवस्था को बदलना होगा। दरअसल एक दौर था जब छात्रों और शिक्षकों के बीच सिर्फ उम्र का ही अंतराल नहीं होता था, बल्कि शैक्षिक ज्ञान का ज्ञान और समझदार भी एक अंतराल होता था। इसलिए शिक्षक जो कुछ पढ़ाते थे, जो कुछ बताते थे, या जो कुछ सिखाते थे, छात्र उस पर आंख मूंदकर भरोसा करते थे। क्योंकि उनके पास अपने शिक्षक से ज्यादा कोई प्रभावशाली स्त्रोत ज्ञान का अपनी पढ़ाई के लिए नहीं होता था। लेकिन अब ऐसा नहीं है, क्योंकि छात्र तकनीक के इस्तेमाल में उनसे कहीं ज्यादा स्मार्ट हैं।

जिन टीचरों के पास अपने छात्रों को पढ़ाने का एक जबरदस्त और लंबा अनुभव है। लेकिन शिक्षकों के पास आज तकनीकी के इस्तेमाल और उसके जरिए बेहतर परफॉर्मेंस करने का अनुभव अपने छात्रों से कम है। इस वजह से भी मौजूदा छात्रों और शिक्षकों की दुनिया काफी हद तक बदल रही है।

शिक्षकों पर बढ़ रहे दबाव ऐसा नहीं है कि यह तमाम बदलाव नहीं होने चाहिए। बदलाव तो होने से थे, चाहे कोरोना आया या न आया होता। लेकिन इतनी तेजी से एक झटके में नहीं होना था, जैसा कोरोना के कारण हुआ है। यही वजह है कि आनन-फानन में अध्यापकों ने छात्रों को ऑनलाइन पढ़ाने का जिम्मा तो ले लिया, लेकिन वह इस बात को जान गए कि आज की एक्स वाई जेड और अल्फा बीटा जेनरेशन को उनके लिए पढ़ाना इतना आसान नहीं है। यह अकारण नहीं है कि बहुत सारे प्राइवेट अध्यापकों ने ऑनलाइन टीचिंग से अपने हाथ पीछे खींच लिए हैं। सरकारी अध्यापकों की मजबूरी यह है कि वह इस जोखिम को नहीं ले सकते, लेकिन परेशान वह भी हैं। दरअसल इस परेशानी की वजह से छात्र से ज्यादा तेजी से बदलते टेक्नोलॉजी है।

छात्र टेक्नोलॉजी के साथ ज्यादा फ्रेंडली हैं और अध्यापकों के लिए यह जटिल पहेली है। सिर्फ देश ही नहीं पूरी दुनिया में इन दिनों नए-नए तरीकों के शिक्षकों की भारी कमी महसूस हो रही है। क्योंकि बहुत ही स्मार्ट टीचर्स की जरूरत आन पड़ी। भले ही उनके तरीकों से अपने विषय की जानकारी ना हो, लेकिन तकनीक में उन्हें जेड जेड जेनरेशन से आगे जाना पड़ेगा। अब यह है कि शिक्षक दिवस शिक्षकों के सामने एक नई चुनौती के रूप में सामने आया है। अब शिक्षकों को या तो जल्द से जल्द स्मार्ट टेक्नास्मार्ट होना पड़ेगा या फिर टीचिंग से अलविदा कहना होगा।

गर्वित और बदलाव के मन से,
ठाकुर की कलम से

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