#सनातन_आर्थिक_चिंतन
हमारे संस्कृति में जितनी परंपरा है उसका सामाजिक महत्व तो है ही, साथ ही एक आर्थिक पक्ष भी है। चाहे वह कोई धार्मिक अनुष्ठान हो या मृत्यु भोज ही।
हमारे शास्त्रों में धन की तीन गति बताई गई है। दान, भोग, नाश।
दान सर्वोत्तम है। लेकिन इसके साथ एक बंधन भी है। दान हमेशा सुपात्र को दिया जाना चाहिए। आपके द्वारा दिये गए दान का उपयोग अधर्म, अत्याचार, आतंक, व्यभिचार जैसे तमाम सामाजिक-धार्मिक बुराइयों को बढ़ाने में नहीं होना चाहिए। दान उसे दें जो उसका पात्र हो और जिसको उस दान की जरूरत हो। इसे आपका धन जरूरतमंदों तक पहुंच जाता है। आर्थिक गतिविधि बढ़ती है और समाज में संपन्नता आती है।
आप दान नहीं कर सकते हैं तो धन का भोग कीजिये। भोग के द्वारा भी आप जरूरतमंदों तक अपने धन को पहुंचाते है। आर्थिक गतिविधियों के विकास में मदद करते है। शादी में मंडप वाला, टैंट वाला, बिजली वाला, बैंड वाला, मिठाई वाला.... सब तक पैसा पहुँचता है सबको रोजगार मिलता है। बस, इतना ही ध्यान रखने की जरूरत है आपका भोग सामाजिक व धार्मिक मर्यादाओं व परंपराओं के अनुकूल हो।
अगर आप दान या भोग नहीं कर सकते है, अत्यधिक कंजूस है, तो धन का नाश तय है। या तो प्राकृतिक आपदाओं के द्वारा, चोर-डाकू-,लुटेरों के द्वारा या कुल में जन्म लिए किसी कुपात्र संतान के द्वारा धन का नाश होना तय है।
जब आप शादी-ब्याह, धार्मिक अनुष्ठान, मृत्यु-भोज आदि कार्यो में धन खर्च करते हैं तो बस इतना ही ध्यान रखना है कि "चादर की लंबाई से ज्यादा पांव नहीं फैलाना है।" आपके पास संचित धन है, जिसको खर्च कर सकते हैं इन कार्यो में तो जरूर कीजिये।
सही रुप में धर्म समाज यहीं है।
ReplyDeleteसही लिखा है, आपने।