चीनी कोरोना वायरस: विनाश से सृजन का बीज है

चीनी कोरोना वायरस: विनाश से सृजन का बीज है
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जबसे चीनी कोरोना वायरस का भारत में एक वैश्विक महामारी के रूप में प्रदार्पण हुआ है तब से जीवन थम गया है। इस महामारी ने पूरे मानव समाज को जकड़ लिया है। आज, हमारे दैनिक जीवन का केंद्र बिंदु भारत के विभिन्न अंचलों में कारोना वायरस के प्रसार, उससे संक्रमित लोगो की संख्या व परिणामस्वरूप हो रही लोगो की मृत्यु की संख्या है। आज हम सब, सामान्य जीवनव्यापन की उत्कंठा लिए हुये एक सांख्यकी बन चुके है। यद्यपि यह वैश्विक महामारी जिसे कोविड 19 भी कहा जाता है, मानव जीवनकाल में आई पहली वैश्विक महामारी नही है लेकिन 21वी में आयी यह वैश्विक महामारी, अब तक कि आयी सभी महामारियों से ज्यादा विश्व की जनसंख्या के साथ, उसकी मूलभूत समाजिक, राजनैतिक व आर्थिक संरचना में परिवर्तन लाने वाली है। 

मै जब लॉकडौन के एकांत में कोरोना वायरस से होने वाले परिवर्तनों को लेकर आत्मचिंतन कर रहा हूँ तो उन वैश्विक महामारियों का भी स्मरण हो जारहा है जिनके बारे में मैने अपने युवाकाल में पढा हुआ था। उसमे सबसे कुख्यात यूरोप का ब्लैक प्लेग था, जो 14वीं शताब्दी में फैली थी। अपने संक्रमण के प्रथम दौर में इससे हुई मृत्यु ने नगरों की दो तिहाई से तीन चौथाई आबादी तक साफ कर दी थी। इतिहासकारों का मत है कि इस चक्र में यूरोप में 2.5 करोड़ (अर्थात् कुल आबादी के चौथाई) लोगो की मृत्यु हुई थी। इससे भारत मे सन् 1898 से 1918 के बीच 1 करोड़ लोगो की मृत्यु हुई थी। 

इसके बाद ही 1918 में 20वी शताब्दी की सबसे भयावह वैश्विक महामारी स्पेनिश फ्लू फैला जिससे विश्व की एक तिहाई जनता संक्रमित हुई थी और बहुत कम अंतराल में लगभग 2.5 करोड़ लोग मृत्यु को प्राप्त हुए थे। विशेषज्ञों का आंकलन है कि इस महामारी में 4 से 5 करोड़ लोग मरे थे। इससे अकेले भारत मे 1.75 करोड़ लोग मारे थे जो इस वक्त भारत की 6% जनसंख्या थी। इसके बाद भारत मे
1940 के दशक में हैजा फैला था, जिसकी भयवता आज भी ग्रामीणांचल की स्मृतियों में है। इसकी बारे में तो स्वयं अपने बुजर्गों से सुना है कि जब यह फैला था तो हर तरफ मृत्यु का नाद ही सुनाई देता था। भारत उस वक्त ब्रिटिश साम्राज्य से स्वतंत्रता का संघर्ष कर रहा था और ब्रिटेन द्वितीय विश्वयुद्ध में फंसा था। ऐसे में पूरे परिवार के परिवार के साथ साथ गांव के गांव साफ होगये थे। 

इसके बाद जिस वैश्विक महामारी ने विश्व को प्रभावित किया वह एड्स/एचआईवी है, जिसका सबसे पहले प्रभाव हमारी पीढ़ी पर पड़ा था। हालांकि इसका उदय 1970 के मध्य में होगया था लेकिन भारत मे इसके बारे में 1980 के दशक में पता चला था। मुझे आज भी याद है कि इसके बारे में मैने सबसे पहले इंडिया टुडे के एक अंक में पढ़ा था। यह लेख न्यूयॉर्क में उनके गेस्ट कोरेस्पोंडेंट( यह कोई बुधवार थे) ने लिखा था। उस वक्त अमेरिका में उसको लेकर वहां के नागरिकों की चिंता व वहां के समाज का एड्स पीड़ित को लेकर पूर्वाग्रहों को, चित्र समेत चित्रण किया था। इस महामारी ने विश्व को समलैंगिकता को न सिर्फ समाजिक स्वीकार्यता प्रदान कराई बल्कि कंडोम के प्रयोग को यौनजीवन की अनिवार्यता भी बना दी है। एड्स के उपचार को ढूढने में विश्व अब तक अरबो डॉलर खर्च कर चुका है लेकिन अभी तक विज्ञान इसकी कोई भी रामबाण औषधि या उपचार सामने लाने में समर्थ नही हो पाया है। इससे पीड़ित व्यक्ति का उपचार तो किया जाता है लेकिन इसका समूल निवारण अभी तक संभव नही हुआ है। भारत मे एड्स की महामारी ने उसके समाज के ढांचे को प्रभावित नही किया है इसलिए इसका संज्ञान ही नही है कि पिछले 4 दशको में करीब 4 करोड़ व्यक्ति इससे मर चुका है। 

इन सब वैश्विक महामारी को देखते हुए मैं समझता हूँ कि चीनी कोरोना वायरस द्वारा फैली वैश्विक महामारी इन सबसे अलग है। यह पहली महामारी है जिसकी प्राकृतिक रूप से उत्तपन्न होने पर ही संदेह है। इसका संक्रमण क्योंकि हवा के माध्यम से है इसलिए बहुत कम समय मे सम्पूर्ण विश्व में पहुंच गया है। इस महामारी की भयानकता ने मनुष्य व उसके राजनैतिक नेतृत्व को इतना किंकर्तव्यविमूढ़ कर दिया है कि उसने मानुषिक सहज व्यवहार की शरण लेते हुए, इस महामारी से छुपने के लिए स्वयं को ही बंदी बनाना श्रेयस्कर लगा है। वैसे तो विश्व भर के वैज्ञानिक कोरोना वायरस के रोकथाम के लिए वैक्सीन बनाने की होड़ में लगे है लेकिन मेरा आंकलन है कि निकट भविष्य में इसके आने की संभावना नही है। यदि आ भी गयी तो विश्व के वैक्सिनकरण में दशक लग जाएंगे। 

मैं समझता हूँ कि कारोना महामारी को रोकने के लिए हर राष्ट्र ने अपनी तरफ़ से सद्प्रयास ही किये है। किसी भी राष्ट्र के पास इस तरह की महामारी को रोकने का न पूर्व अनुभव था और न ही इतिहास में उनके पास कोई उदाहरण था। ऐसे में हर्ड इम्युनिटी से लेकर लॉकडौन तक सभी प्रयास, आलोचना के पात्र नही हो सकते है। जिन लोगो ने यह सब निर्णय लिए है उन सबने यह कटु सत्य स्वीकार कर लिया था कि चीनी कोरोना वायरस का कोई तोड़ नही है और इसी के साथ अब जीना है। जिन राष्ट्रों की स्वास्थ्य सेवाएं विकसित है उन्होंने इस वायरस से अपनी जनता की 3% से 5% की मृत्यु होना कठोर ह्रदय से स्वीकारा हुआ है। 

भारत ऐसे राष्ट्र जहां की स्वास्थ्य सेवाएं अविकसित है और उसकी जनता भी स्वयं में अनुशासित नही है, उसके लिए लॉकडौन ही उपाय था। मोदी जी द्वारा यह लॉकडौन का निर्णय, लोगो को मृत्यु से बचाने के लिए नही बल्कि इस वैश्विक महामारी के प्रसार की गति को धीमी करने के लिए और उस मिले हुये कम समय मे अधिकतम रूप से इससे बचने के साधनों व उपचार की व्यवस्था के निर्माण करने के लिए, लिया गया है। 

आज भारत की जनता को अपनी तन्द्रा से उठ कर इस कटु सत्य को स्वीकार करना होगा कि हमे इस कोरोना वायरस के साथ ही जीना है। हमारे लिए यह वायरस नही बदलेगा बल्कि हमको बदलना होगा और यह बदली व्यक्तिगत जीवन से लेकर सामाजिक व आर्थिक क्षेत्र में होगी। जो बदलेगा वही जीवित रहेगा और जीवन दे पायेगा। 

यदि आज भी जो यह सोंच कर कोई चलेगा की भविष्य के समीकरण, भूतकाल के पहिये पर चलेंगे, वह अंधकूप की तरफ जायेगा। यह इसलिये क्योंकि कोरोना तो अब रहेगा ही और उसके साथ ही पूर्व की समाजिक से लेकर वाणिज्य व्यवस्था में इतना ज्यादा परिवर्तन आने वाला है कि यदि इस पर कल्पना के घोड़े भी दौड़ाए जाए तब भी मनीषियों के लिए, सही सही 2020/30 के दशक का आंकलन कर पाना संभव नही है। इस दशक में हमारी आपकी ज़िंदगी मे आने वाले बदलाव, अब तक आये बदलावों से ज्यादा व्युत्क्रमण होंगे। इस बदलाव में, इन सब के साथ हमारे आगे बढ़ने के सभी प्रयोग सही ही होंगे यह भी संभव नही है। मैं देख रहा हूँ कि अगले 10 वर्षों में कोरोना वायरस एवं उसके म्युटेंट्स से जनित विभिन्न स्वास्थ समस्याओं के कारण व इसको लेकर राष्ट्रों के बीच टकराव एवं उससे उत्पन्न आर्थिक विभीषका के परिणामस्वरूप, विश्व की 15% जनसंख्या का समाप्त होना निश्चित है। भारत मे यह संख्या 20% तक पहुंच जाए तो इसमे कोई आश्चर्य की बात नही होगी।

आज के हम भारतीय, युग मंथन दशक के यात्री है। मुझको यह बराबर आभास हो रहा है कि आज जो मेरे प्रिय, मित्र और साथी यहां पर या व्यक्तिगत जीवन मे है उनमें से एक तिहाई लोग 2031 नही देखें पाएंगे। मैं इस कटु सत्य को स्वीकार करके ही आगे की संभावना टटोल रहा हूँ। मेरे लिए जीवन का मूलमंत्र यही है कि हमे स्वयं ही सुरक्षित रहना है। हमे इस आपदा से निकलने का स्वयं ही प्रयास करना है क्योंकि किसी भी वैचारिक विलासिता के पास इसका कोई समाधान नही है।

मेरा दृढ़ विश्वास है कि कारोना वायरस का वैश्विक महामारी रूप में आना संपूर्ण विश्व के स्वरूप व व्याप्त व्यवस्थाओं, मर्यादाओं और मान्यताओं में मूलभूत परिवर्तन का प्रारंभ है। यह वायरस नही बल्कि विनाश से सृजन का बीज है।

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