पाकिस्तान अंधे रास्ते पर: सऊदी अरब को उधार वापसी और चीन द्वारा बिना बंधक के ऋण देने से इनकार

पाकिस्तान अंधे रास्ते पर: सऊदी अरब को उधार वापसी और चीन द्वारा बिना बंधक के ऋण देने से इनकार
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अभी अगस्त का महीना पूरा भी नही हुआ, एक दम से वैश्विक राजनीति, कूटनीति और विभिन्न शक्तियों के टकराव, जुड़ाव और होने वाले विस्फोट की नाद तेज़ी से पास आती सुनाई पड़ने लगे है। यदि स्थितियां इस तेज़ी से संकेतों का संप्रेषण करेगी तो मुझे लगता है कि मुझे अपनी 'विध्वंस व विनाश से न्यू वर्ल्ड आर्डर का सृजन' वाली श्रंखला को संछिप्त में ही, जल्दी से समाप्त करना पड़ेगा।

वर्तमान में, वैश्विक कूटनीति में जिस प्रकार से विभिन्न राष्ट्रों के बीच के संबंधों को राष्ट्र, पुनः परिभाषित किये जाने की प्रक्रिया में डाल रहे है, उससे तो यही समझ मे आता है कि वर्ष 2020, विश्व को भविष्य के एक निश्चयात्मक टकराव की तरफ दिशा दे चुका है। प्रायः, सामने हो रही घटनाओं का तारतम्य भूतकाल से तो निकाल लिया जाता है लेकिन उससे होने वाली भविष्य की घटनाओं के प्रारभ्य को, वर्तमान द्वारा गर्भित किये जाने को, वर्तमान ही नही समझ पाता है।

मेरे लिए भविष्य का गर्भधारण, वर्तमान का पाकिस्तान कर रहा है। आज वैश्विक सँभवनाओ का केंद्रबिंदु, पाकिस्तान है। अमेरिका द्वारा प्रयोजित व सऊदी अरब द्वारा संरक्षित, संयुक्त अरब अमीरात(यूएई) द्वारा, इजराइल के अस्तित्व को राजनैतिक स्तर पर सार्वजनिक रूप से स्वीकारना, मध्यपूर्व एशिया की महत्वपूर्ण घटना है। इसने, वृहत्तर इजराइल की परिकल्पना को यथार्थ का स्कंध मिल गया है। हालांकि यह जो हुआ है, उसका निर्णय पूर्व में ही, अमेरिका व उसके सहयोगियों द्वारा किया जाचुका था लेकिन इसकी घोषणा का समय निर्धारण, अन्य परिस्थितियों के निर्माण के लिए किया गया है।

मैं अब पाकिस्तान पर आता हूँ क्योंकि अगले कुछ दिनों या फिर महीनों में, पाकिस्तान द्वारा लिए गए निर्णय, पाकिस्तान के साथ, भारत, चीन और मध्य पूर्व एशिया को प्रभावित करने वाले है। आज, पाकिस्तान असमंजस्य में है। द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद उत्पन्न हुए शीतयुद्ध में पाकिस्तान की भौगोलिक स्थिति बहुत महत्वपूर्ण हो गयी थी और पाकिस्तान की उत्पत्ति का वह बड़ा कारक भी था। जब से पाकिस्तान का जन्म हुआ है तब से ही पाकिस्तान ने अपनी भौगोलिक स्थिति को अपनी विदेशनीति का केंद्र बनाकर, विश्व की शक्तियों, विशेषतः अमेरिका से भुनाया है। पाकिस्तान की इसी भौगोलिक स्थिति ने पाकिस्तान को भूराजनीति में, भारत के विरुद्ध सभी तरह की उद्दंडता करने का सफल अवसर भी दिया है। अपने जन्म से ही पाकिस्तान कश्मीर फोबिया से ग्रस्त रहा है और उसकी विदेश नीति और सुरक्षा नीति भारत केंद्रित रही है। इसी कारण वहां के तंत्रों में सेना हावी होती चली गयी है। वहां, 'कश्मीर बनेगा पाकिस्तान' का नारा, इस तरह बेचा गया है कि यह झूठ उनके अस्तित्व का ही अंग बन गया है। यह एक विष की तरह पाकिस्तान के समाज मे पूरी तरह फैल गया है। पाकिस्तान में जब जिया उल हक की तानाशाही आयी तो उसके साथ, पाकिस्तानी समाज के कट्टर इस्लामीकरण की प्रक्रिया भी शुरू होगयी थी। समाज मे मुल्ला मौलवी प्रतिस्थापित होते रहे और उनके समर्थन से पाकिस्तान की शासन व्यवस्था में सेना का सीधा नियंत्रण होगया, इसी को इस्टैब्लिशमेंट कहा जाता है।

इसका परिणाम यह हुआ कि पिछले 4 दशकों में राष्ट्र निर्माण कोई प्राथमिकता ही नही रही जिसके कारण पाकिस्तान का समाज कुपमंडुप और उसका सारा तंत्र जड़ हो चुका है। आज, भारत की आक्रामक कूटनीति से अलग थलक पड़ा पाकिस्तान न सिर्फ राष्ट्रों से मित्रता को तरस गया है बल्कि आर्थिक रूप से टूट चुका है। अमेरिकी डॉलर और सऊदी अरब व यूएई से मिलने वाली खैरात का आदि बन चुका पाकिस्तान, भिखारी मानसिकता का शिकार हो गया है। इसी दरिद्रता से लिपटे पाकिस्तान में अब भारत विरोधी भावनाओ की जगह हिन्दू विरोधी भावनाओ ने स्थान ले लिया है और तंत्र में अपने अस्तित्व को बनाये रखने के लिए पाकिस्तानी सेना, जनता को उसके 'कश्मीर मनोग्रस्ति' (कश्मीर ओबसेशन) से बाहर नही निकलने दे रही है। 

वर्तमान में पाकिस्तान जिस अंधमोड पर दिगभ्रमित, अपने को खड़ा पारहा है, वह इसी कश्मीर और हिन्दुफोबिया का परिणाम है। भारत द्वारा 5 अगस्त 2019 को जम्मू कश्मीर से धारा 370 को समाप्त कर, केंद्रीयशासित प्रदेश बनाये जाने के बाद, पाकिस्तान के राजनीतिज्ञों, नीतिकारों और बुद्धजीवियों को लकवा मार गया है। पाकिस्तानी प्रधानमंत्री इमरान खान की पूरी आंतरिक नीति से लेकर विदेश नीति, कश्मीर पर ही केंद्रित होकर रह गयी है। जिन झूठे सपनो पर पाकिस्तान की जनता के साथ स्वयं इमरान खान अब तक जीते आये है, उस सपने के टूटने के बाद भी वे वर्तमान की सच्चाई स्वीकार करने की स्थिति में नही रह गए है। जहां विश्व, पिछले दशकों की नीतियों का पुनर्निर्माण कर वर्तमान के सत्य से संवाद स्थापित कर रहा है वही पर पाकिस्तान भूतकाल में जड़वत खड़ा, कालविरुद्ध हो चुका है।

सऊदी अरब द्वारा कश्मीर के मामले को लेकर, पाकिस्तान का समर्थन न किये जाने से इमरान खान बहुत आहत हुये थे। उन्हें इस मामले में तुर्की और मलेशिया का समर्थन मिला तो इमरान खान ने आगे बढ़कर तुर्की और उसके राष्ट्रपति एरडोगन को गले लगा लिया। इमरान खान ने एरडोगन की मुस्लिम उम्मा(जनता) का नेतृत्व करने की महत्वकांक्षा को भी स्वीकार कर, आगे बढाने का काम किया। यह सब करते वक्त, वह यह जान बूझ कर भूल गए कि मुस्लिम उम्मा और ओएसीसी का नेतृत्व सऊदी अरब करता है और सऊदी अरब के राजकुमार मोहम्मद बिन सलमान(एमबीएस), जो परोक्ष रूप से शासन भी कर रहे है और एरडोगन के बीच सम्बंध अच्छे नही है। 

पाकिस्तान के नए बढ़ते हुये तुर्की प्रेम से कुपित एमबीएस ने पाकिस्तान को दिए गए 3 अरब डॉलर वापस मांग लिए और जो उधार में तेल दिया जाता था, उसको भी रोक दिया। पाकिस्तान ने सऊदी की इस मांग के समाचारों को पहले छिपा लिया था। जब सऊदी ने दबाव बनाया तो पाकिस्तान ने 3 अरब डॉलर में से 1 अरब डॉलर, चीन से उधार देकर वापिस कर दिया। सऊदी अरब द्वारा पैसा मांग लेने से कुपित पाकिस्तान के विदेशमंत्री शाह कुरैशी ने टीवी को दिए गए साक्षत्कार के माध्यम से सऊदी अरब की, कश्मीर मामले में समर्थन न किये जाने से उलाहना की और ओआईसी (आर्गेनाईजेशन ऑफ ओस्लामिक कन्ट्रीज) से अलग समूह बनाने की चेतावनी दे डाली। कुरैशी के इस वक्तव्य से सम्पूर्ण कूटनीतिज्ञ जगत में हलचल मच गई क्योंकि एक तो यह वक्तव्य सार्वजनिक दिया गया था और दूसरा यह पाकिस्तान की विदेशनीति में बड़े बदलाव के संकेत के साथ तुर्की के साथ ब्लॉक बनाये जाने की धमकी भी थी। इसके जवाब में सऊदी अरब की सार्वजनिक कोई प्रतिक्रिया नही आई लेकिन पाकिस्तान में काफी लंबे समय तक रहे एक वरिष्ठ व प्रभावी कूटनीतिज्ञ ने एक लेख लिखा, जिसमे पाकिस्तान को यह याद दिलाया गया कि सऊदी अरब ने, पाकिस्तान की समय समय पर आर्थिक से लेकर अंतराष्ट्रीय मंच पर मदद की है। उस लेख से स्पष्ट था कि एमबीएस बहुत नाराज है और दोनो देशों के सम्बंध खराब होने के रास्ते पर है। 

सऊदी अरब की नाराजगी से घबडा कर, जल्दी से सम्बंध सामान्य करने की दिशा में पाकिस्तान के सेनाध्यक्ष जनरल बाजवा ने कमान संभाली और एमबीएस को सफाई देने के लिए रियाद, सऊदी अरब की यात्रा पर गये। लेकिन वहां, सऊदी राजकुमार एमबीएस ने उनसे मिलने से मना कर दिया। वहां उनके छोटे भाई शाह खालिद मिले जिन्होंने पूर्व के भांति ही पाकिस्तान से कश्मीर का राग अलापने को बंद करने को काश और साथ मे शेष बचे 2 अरब डॉलर की वापसी रोकने व उधार पर पाकिस्तान को तेल देने की व्यवस्था को बढाने का कोई आश्वासन नही दिया। जनरल बाजवा की पाकिस्तान वापसी पर, विदेशमंत्री शाह कुरैशी भागे भागे चीन गये ताकि शेष 2 अरब डॉलर चीन से उधार लेकर, सऊदी अरब को वापस किया जासके। कुरैशी जब बेंजिंग पहुंचे तो उन्हें झटका लगा क्योंकि उनको हवाई अड्डे पर कोई प्रोटोकॉल नही दिया गया। उनकी अगवानी एक चीनी पुलिस कर्मचारी ने की, जो किसी भी शासकीय आगंतुक के लिए बेज्जती थी। 

कल बेंजिंग, चीन से समाचार आरहे है कि पाकिस्तानी विदेशमंत्री कुरैशी से चीनी राष्ट्रपति शी ने, सऊदी अरब की पुनरावृत्ति करते हुए मिलने से मना कर दिया और साथ मे बिना बंधक के 2 अरब डॉलर का ऋण देने से भी मना कर दिया है। चीन ने पूर्व में गिलगिट बाल्टिस्तान को 50 वर्ष के लिए लीज पर लेने के अपने एक पुराने प्रस्ताव को फिर आगे रख दिया है। इस बार उन्होंने 2 अरब डॉलर के ऋण के विरुद्ध गिलगिट बाल्टिस्तान का वह हिस्सा मांग लिया है जिसकी सीमाएं एक तरफ अफगानिस्तान व दूसरी तरफ पीओके की सीमाओं से मिलता है। यह चीन का प्रस्ताव बड़ा दूरगामी है। चीन भविष्य में पीओके पर भारत का अधिकार होजाने पर भी भारत और अफगानिस्तान के बीच के रास्ते को बन्द करना व गिलगिट बाल्टिस्तान में भारत द्वारा कब्ज़ा किये जाने की संभवना को भी समाप्त कर देना चाहता है।

अब जब पाकिस्तान दिवालिया वाली स्थिति में पहुंच गया है तो क्या पाकिस्तान 2 अरब डॉलर के लिए चीन का प्रस्ताव स्वीकार कर लेगा, यह प्रश्न विचारणीय है। मैं समझता हूँ जितना सीधा सपाट चीन का प्रस्ताव है वह नवीन वैश्विक यथार्थता को देखते हुए, पाकिस्तान के लिए निर्णय लेना बड़ा दुष्कर कार्य है। 2014 में नरेंद्र मोदी जी की सरकार आने के बाद भारत गिलगिट बाल्टिस्तान पर अपना वैधानिक दावा करता रहा है और ब्रिटिश पार्लियामेंट ने भी 1947 बंटवारे के बाद गिलगिट बाल्टिस्तान को जम्मू कश्मीर का हिस्सा व भारत का अधिकार क्षेत्र माना है। 

फिलहाल, पाकिस्तान के विदेशमंत्रालय ने कल विदेशमंत्री कुरैशी के पूर्व के वक्तव्य से उलट, सऊदी अरब की सराहना की है और ओएसीसी पर भी आस्था जताई है। 

मेरे लिए इस वक्तव्य का कोई मायने नही है क्योंकि इस पूरे प्रकरण में प्रधानमंत्री इमरान खान ने खामोशी ओढ़ रक्खी है। पाकिस्तान के मामलों के विशेषज्ञों की राय यही है कि विदेशमंत्री का वक्तव्य, उनका निजी विचार न होकर, प्रधानमंत्री इमरान खान की स्वीकृति से दिया गया था और क्योंकि शाह कुरैशी, एसस्टेब्लिश्मेन्ट के आदमी है, इसलिये जनरल बाजवा भी सऊदी अरब से अलग, तुर्की के साथ जाने के संकेत देने के निर्णय मे शामिल थे।

मेरा आंकलन है कि आगे आने वाला समय सम्पूर्ण भारतीय उपमहाद्वीप पर भारी पड़ने वाला है और भारत व भारतीय जनता को कीमत देने के लिए मानसिक रूप से तैयार रहना चाहिए।

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