एक ऐतिहासिक सफ़ेद झूठ जिसे हमारी पाठ्यपुस्तकों का हिस्सा बना दिया गया...
पिछले 73 बरस से देश के वामपंथी कांग्रेसी इतिहासकार "मुगल शासक" "मुगल शासन" का राग अलापते रहे, यही पाठ पढ़ाते रहे. इतिहास की मोटी मोटी पोथी लिख डाली गई. उसके पीछे मंशा यही थी कि उन आक्रमणकारी हत्यारों लुटेरों की असली पहचान छुपाई जाए. उनको यहीं का, इसी मिट्टी का साबित किया जाए. यदि उनकी असली पहचान बतायी जाती तो उनके अत्याचार के बल पर कराए गए धर्म परिवर्तन की कलई खुल जाती.
कभी शब्दकोष में ढूंढ़िये तो ज्ञात होगा कि मुगल शब्द मंगोलों के लिए है. मंगोल जनजाति के लोगों के लिए. लेकिन भारत में बाबर से बहादुर शाह तक सब को मुगल कहा गया. जबकि मूलतः वो तुर्क थे. उनके अत्याचारों के कारण जिन्होंने धर्म परिवर्तन किया वो ना मंगोल थे ना तुर्क. वो शुद्ध रूप से भारतीय थे. लेकिन उनको भी मुगल कहा और लिखा जाने लगा. उनकी वास्तविक पहचान "भारतीयता" की हत्या कर दी गयी. यह सच है कि दो ढाई सौ सालों तक यह कुकर्म अंग्रेजों द्वारा किया गया. ऐसा करने के पीछे विभाजन की उनकी कुटिल नीति वाले, उनके अपने कारण थे. लेकिन महत्त्वपूर्ण सवाल यह है कि अंग्रेजों के उस कुकर्म उस सफ़ेद झूठ को आजादी के बाद भी लगातार क्यों पढ़ाया जाता रहा.? उसे मान्यता क्यों दे दी गई.?
पिछले दिनों इसी विषय पर पाकिस्तान में छिड़े विवाद पर वहां के प्रसिद्ध लेखक विचारक पत्रकार हसन निसार ने मुगल..... मुगल.... का राग अलापने वाले नेताओं कठमुल्लाओं को तथ्यों सहित जमकर जूतांजलि दी...
प्रस्तुत वीडियो में आप भी सुनिए और अंत तक ध्यान से सुनिए हसन निसार के उस वक्तव्य को...
Comments
Post a Comment