लोगों के मरने से राष्ट्र नहीं मरते, सभ्यताएँ नहीं मरतीं. पर सभ्यताओं के मरने की कीमत लोग सदियों तक चुकाते हैं।
लोगों के मरने से राष्ट्र नहीं मरते, सभ्यताएँ नहीं मरतीं. पर सभ्यताओं के मरने की कीमत लोग सदियों तक चुकाते हैं।
प्रथम विश्वयुद्ध में हर फ्रेंच परिवार ने अपना कम से कम एक पुरुष खोया था।
आज उसके लिए यह एक ऐतिहासिक मेमोरी से अधिक कुछ भी नहीं है।
द्वितीय विश्वयुद्ध में रूस ने अपनी एडल्ट पॉपुलेशन का 10% खो दिया था।
#यहूदियों ने अपनी आधी जनसंख्या खो दी थी।
आज यहूदियों के पास एक स्वतंत्र और सशक्त देश है, जापान पर दो दो एटम बम गिरे जापान उसकी आह भी नहीं भरता।
अगर कोरोना से भारत में 10 या 20 लाख लोग भी मर जाएँ तो भी यह पूरे देश के इतिहास में पलक झपकने से ज्यादा कुछ नहीं होगा. वे लोग जिन परिवारों के होंगे, उनके लिए यह एक ट्रेजेडी होगी पर 99% लोग एक वर्ष के बाद उससे नाममात्र को ही प्रभावित होंगे. जीवन चलता रहेगा राष्ट्र बढ़ता रहेगा।
पर अगर कुछ लोग उस बहाने से देश में अव्यवस्था और अविश्वास फैलाने में सफल हो जाएँगे तो उसके परिणाम सदियाँ और पीढ़ियाँ भुगतेंगी. अगर इस बहाने से देशद्रोहियों के हाथ में सत्ता चली जायेगी तो वे देश के टुकड़े टुकड़े कर देंगे इतिहास को चीर कर रख देंगे।
आज इस विषम परिस्थिति में मीनमेख निकालना आसान है. यह क्यों हुआ और वह क्यों नहीं हुआ?
गाड़ी में तीन आदमी क्यों बैठें पर बाइक पर दो लोग क्यों नहीं बैठें ये सारी बहस निरर्थक प्रलाप है. कुछ 19-20 के साथ देश को चलाने के अथक प्रयास किये जा रहे हैं. उसमें नुक्स निकालना बन्द करके सरकार का साथ दें।
अगर आज से दो महीने पहले आप यह माँग करते कि कोरोना फैलाने वालों, थूकने और पत्थर फेंकने वालों को गोली मार दी जाए, लॉकडाउन तोड़ने वालों को जेल में डाला जाए और अफवाहें फैला कर भीड़ जुटाने वालों पर देशद्रोह का मुकदमा चलाया जाए तो उसका कुछ अर्थ था।
इन माँगों के क्रियान्वयन की व्यवहारिक समस्याओं के बावजूद सैद्धान्तिक रूप से यह कुछ अर्थ रखता और संभवतः सरकार पर पॉजिटिव दिशा में दबाव बनाता पर आज सिर्फ नुक्स निकालने का कोई अर्थ नहीं है।
आज आपकी आलोचना दिशाहीन और नपुंसक है, अगर उसमें समाधान के स्वर नहीं हैं।
आपके पास कोई समाधान है तो उसे व्यवहारिक रूप से बताइए।
वरना यह सूखी सूखी टोकाटाकी आपको सिर्फ उन्हीं गिद्धों के साथ खड़ा करती है जो हमारी लाशें गिरने के इन्तज़ार में खड़े हैं।
ठाकुर की कलम से
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