*मोदी की #विदेश_नीति और #कूट_नीति #चीन के गले मे हड्डी बनकर अटक गई है।*
"किसी ने सत्य कहा है कि अगर तुम शांति चाहते हो तो युद्ध के लिए तैयार रहो।"
#करोना महामारी के प्रकोप से पूरी दुनिया त्रस्त होकर जब वुहान वायरस के जनक चीन को जम कर कोस रही हो ।
सारी दुनियाँ में धोखेबाज चीन के खिलाफ अवधारणा जन्म ले रही हो ।
विश्व की नामी कम्पनियां जब डरपोक चीन से जाने का और भारत मे बसने का मन बना ही चुकी हैं ।
जब बलूचिस्तान में पाकिस्तान विरोधी हिंसक प्रदर्शन से जिहादी पाकिस्तानी सरकार हिली हो ।
भारत के सैन्य कमांडर का बयान की हमारा लक्ष्य पीओके उतरी कश्मीर है । कश्मीर में आतंकवाद की चूले हिल रही हो और बलूचिस्तान कश्मीर के हालात के कारण जिहादी वायरस चीन के वन बेल्ट वन रोड पर खतरा मंडरा रहा हो ।
भारत मे चीनी उत्पाद के प्रति बढ़ती घृणा से मलेच्छ चीन में आर्धिक मंदी की घण्टी बजने लगी हो ।
लद्धाख में 73 वर्षों में भारतीय सेना पहली बार जोजिला दर्रे से पहुंची हो ।
लद्धाख में सड़क निर्माण के लिए भारी संख्या में श्रमिक पहुंच गए हो । गोलवान घाटी में सड़क निर्माण पहली बार शुरू हुआ हो ।
भारत-नेपाल सीमाओं के पास भारत ने एक 80 किलोमीटर लंबी सड़क उत्तराखंड-नेपाल सीमा के पास घटियाबगढ़ से लिपुलेख दर्रा के बीच बना ली हो जो मानसरोवर (चीन) के लिए सबसे छोटा रास्ता होगा । जिसके कारण विश्वासघाती चीन के पेट मे मरोड़ पड़ रहे हों ।
नेपाल की वामपन्थी सरकार की चीन को खुश करने की हरकत के बाद भी नेपाल की जनता भारत के साथ खड़ी हो ।
हांगकांग के चीन विरोधी प्रदर्शन चीन के दबाव के बाद भी बढ़ रहे हों ।
तो चीन का खीज कर हिंसक होना समझ आता है। बरगलाया चीन कूटनीति में भारत से पिछले तीन वर्षों में हार रहा हो तो हिंसा पर उतारू होगा ही । वैसे भी मार्क्सवादी चीन का आखिरी दाँव हिंसा ही रहता है । भारत की सेना, सरकार और जनता तैयार है । अब की बार चीन को मजबूत भारत से मुकाबला करते हुए भारी आर्थिक और सैन्य कीमत चुकानी पड़ेगी ।
*"अगर तुम्हारे हृदय में ज्वालामुखी धधक रहा हो, तो तुम हाथों में फूलों के खिलने की कामना नही कर सकते "*
यहां यह भी समझना आवश्यक है कि 40 वर्ष तक भारत चीन के बीच हिंसक टकराव इसलिए नही हुआ कि चीन भारत से डरता था, या चीन भारत को अपने से मजबूत समझता था । परन्तु उसे अपने तथाकथित सुपर पावर का घमंड रहा है । आज जब भारत ने सड़क निर्माण चीन बॉर्डर तक करके चीन को चुनौती दी तो चीन परेशान हुआ । जिनपिंग भारत आया भी पर लद्दाख से अरुणाचल तक सड़के पुल सुरंग बनने रुके नही । चीन को भारत की ताकत का अहसास पहली बार हुआ और वो अपनी डराओ और दनदनाओ की नीति से हट कर सीधे गुत्थमगुत्था हो गया ।
सोचो अपने को सुपर पावर से कम न समझने वाले चीन को भारत ने सीधेसीधे ललकार दिया है । पाकिस्तान नेपाल श्रीलंका के कंधों में बंदूक रख कर अपनी धौंस दिखाने वाले चीन को आज भारतीय कूटनीति ने बेनकाब कर, सीधी झड़प पर मजबूर कर दिया, भारत की हिम्मत से चीन की गुर्राने की हेकड़ी ही खत्म हुई है । जहां चीन पाक नेपाल के रास्ते भारत को कमजोर करना चाहता था वही नक्सलवादियों, अर्बन नक्सल और वामपन्थियों के सहारे भी भारत मे अस्थिरता फैला रहा था । लड़ाई झड़प तभी होती है जब सारी चाले असफल हो जाएं । चीन विफल होने के बाद ही सीधे लड़ने के लिये मजबूर हुआ है ।
आज भारतीय सेना तैयार है 1962 की तरह हथियारों, वर्दी और जूतों से जूझ नही रही है । भारतीय सेना का हौंसला भी बुलन्द है ।
यह मोदी सरकार की भावनात्मक एवं बौद्धिक सूझबूझ का ही परिचायक है कि जो चीन अपनी विस्तारवादी नीति के चलते दक्षिण चीन सागर, हिंद महासागर एवं लद्दाख में धौंस दिखा रहा हो उसे भारतीय कूटनीति और सैन्य पराक्रम से दो चार होना पड़ रहा है। गलवान प्रसंग की गूंज अब वैश्विक स्तर पर सुनाई देगी जो दक्षिण चीन महासागर के चौदह देशों के लिए कहीं न कहीं संबल का प्रतीक भी बनेगी। इसलिए इसे हम मोदी विरोधियों की वैचारिक दरिद्रता कहेंगे और पराभव की कुंठा भी। समयपूर्व नतीजे गढ़ लेना उचित नहीं होता धैर्य रखें व्यग्र न हों
-मोदी है तो मुमकिन है।
-मोदी है तो आशाएं हैं।
-मोदी है तो प्रबल से प्रबलतम प्रतिउत्तर की चाहत है
ठाकुर की कलम से
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