2004 में जब यूपीए की सत्ता में वापसी हुई और सोनिया गाँधी के प्रधानमंत्री बनने रास्ता सुब्रमण्यम स्वामी ने रोक दिया तब सोनिया ने ख़ुद को ऐसे पेश किया कि उन्होंने खुद ही प्रधानमंत्री पद ठुकरा दिया है, उसके बाद सोनिया की शान (?) में कांग्रेसियों ने एक एक करके जो क़सीदे गढ़ने शुरू किए, उनको त्याग की मूर्ति और जाने क्या क्या बताया वो दृश्य कांग्रेसी चाटुकारिता की मिसाल बन गया।
प्रणब दा के संघ मुख्यालय में भाषण को मीडिया द्वारा भरपूर कवरेज दिए जाने से कांग्रेसी बेहद ग़ुस्से (!) में थे और इसको सरकार के इशारे पर कवर करने का आरोप लगा रहे थे लेकिन सोनिया को महान बताने वाले बेशर्मी, चापलूसी से भरे उस अधिवेशन के कवरेज पर कुछ नहीं बोल रहे, उसका भी सीधा प्रसारण सभी चैनलों ने किया था।
सत्ता वापसी और प्रधानमंत्री पद की हसरत लिए सोनिया गांधी का सपना जब टूटा तो एकबारगी उनको यक़ीन नहीं हुआ कि उनके साथ ऐसा हुआ है। सोनिया को प्रधानमंत्री बनने से रोकने वाले राष्ट्रपति भी कोई कांग्रेसी या भाजपाई न होकर सच्चे देशभक्त स्व. डॉ अब्दुल क़लाम थे सो कांग्रेस और सोनिया के पास तिलमिलाने और खिसियाने के सिवाय और कोई चारा नहीं बचा था, लिहाज़ा अपने अपमान को त्याग का नाम देकर एक तमाशा आयोजित किया गया जिसे न केवल देश में बल्कि पूरे विश्व में देखा गया।
इस टूटे सपने को पूरा करने के लिए सोनिया को एक ऐसे व्यक्ति को प्रधानमंत्री बनाना था जो केवल दिखने को प्रधानमंत्री हो लेकिन उसका रिमोट पूरी तरह से सोनिया के हाथ में हो, सोनिया के मास्टरप्लान की राह में सबसे बड़ा काँटा प्रणब मुखर्जी ही थे। कांग्रेस के कुछ गिने चुने लोगों में से एक प्रणब मुखर्जी ही उस वक़्त प्रधानमंत्री पद के सबसे सशक्त दावेदार थे लेकिन वो सोनिया के 'निजी मापदंडों' पर खरे नहीं उतरते थे। सोनिया गांधी अच्छी तरह जानती थी कि प्रणब मुखर्जी उनकी हाँ में हाँ नहीं मिलाएंगे, क्योंकि प्रणब दा स्वयं एक दमदार शख्सियत थे, बहुत वरिष्ठ नेता थे, सो उनको राष्ट्रपति भवन भेज दिया गया।
सोनिया ने मनमोहन सिंह को प्रधानमंत्री चुना और मनमोहन सिंह ने भी सोनिया के इस एहसान को जमकर चुकाया। 10 सालों तक मनमोहन सिंह "रबर स्टैम्प" बने रहे, ख़बरें तो यही हैं कि मनमोहन सिंह को फाइलों पर केवल दस्तख़त करने होते थे बाक़ी सारा काम सोनिया और उनके खासमखास अहमद पटेल करते थे।
2004 से 2014 तक के यूपीए के शासनकाल को अगर इस देश का काला अध्याय कहा जाय तो कुछ ग़लत नहीं होगा। इसी काल में अरबों खरबों के घोटालों को अंजाम दिया गया, देश भर में सबसे ज़्यादा आतंकी हमले हुए, 26/11 जैसा आतंकी हमला हुआ लेकिन पाकिस्तान पर केवल क्रिकेट की पाबंदी लगाकर इसकी इतिश्री कर ली गई। देश की सुरक्षा, मान मर्यादा सब कुछ दाँव पर लगा दी गई। आज अभिव्यक्ति की आज़ादी, असहिष्णुता की बात करने वाली कांग्रेस खुद कितनी निरंकुश थी ये 2004-2014 के कालखंड को देखकर समझा जा सकता है।
अपने घर में खाना बनाने वाली प्रतिभा पाटिल को राष्ट्रपति बनाकर सोनिया ने उनको अनगिनत 'सनसनीखेज राजों के राज़दार" बने रहने का इनाम दिया था। एक राष्ट्रपति के तौर पर करोड़ों रुपये घूमने फिरने पर खर्चने, गंभीर से गंभीर अपराधियों की दया याचिका स्वीकार करके उनकी मौत की सज़ा को उम्रकैद में बदलने और रिटायरमेंट के बाद ट्रक भरकर उपहार अपने घर ले जाने के सिवाय प्रतिभा पाटिल की और कोई उपलब्धि देश को याद नहीं है।
वहीं राष्ट्रपति के तौर पर प्रणब मुखर्जी ने ऐसे कई अपराधियों की मौत की सज़ा को बरक़रार रखा यहाँ तक कि याक़ूब मेमन की दया याचिका ठुकराने वाले प्रणब दा ही थे। उसके बाद लाखों करोड़ों की फ़ीस वसूलने वाले वकीलों की फौज को एक आतंकी के लिए आधी रात को सुप्रीम कोर्ट खुलवाने के ऐतिहासिक कारनामें को भी देश ने देखा।
प्रणब दा की यही दृढ़ता सोनिया को अपने मंसूबों में अक्षरशः कामयाब होने नहीं देती। जिस राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ को राहुल गांधी और पूरी कांग्रेस पानी पी पीकर कोसती है उसी संघ के मुख्यालय में विशेष अतिथि के तौर पर शामिल होकर और संघ प्रमुख डॉ हेडगेवारजी को भारत माता का सच्चा सपूत बताकर प्रणब दा ने जीवनभर के बोझ को कुछ तो हल्का किया ही है।
पुनःश्च - एक कट्टर कांग्रेसी अपने जीवन की सांध्यबेला में 'दास जनपथ' की ज़ंजीरों से स्वयं को मुक्त कर गया।
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