तथाकथित पंडित जवाहर लाल नेहरू के आदर्श विचार

*तथाकथित पंडित जवाहर लाल नेहरू*

विचार 

एक बार नेहरू पंजाब के तब के सीएम प्रताप सिंह कैरो के साथ भाखड़ा नांगल बांध देखने जा रहे थे। पंडित जी की गाड़ी के नीचे आ कर एक गिलहरी मर गयी। कैरो ने पूछा कि पंडित जी, आख़िर गिलहरी जैसी फ़ुर्तीली प्राणी क्यूं गाड़ी के नीचे आ गयी भला?

नेहरू का यह जवाब देखिए - बीच सड़क पर आ कर गिलहरी यह तय ही नही कर पायी कि उसे आख़िर जाना कहां है, इसलिए उसका ये हाल हुआ। वह असमंजस की स्थिति से अलग होकर बायें या दायें जहां भी जाना तय करती वह सही ही होता, ग़लत बस अनिर्णय की स्थिति होती है, ख़ास कर तब जब आप बीच सड़क पर हों। 

आचरण 

इकॉनमी : अर्थव्यवस्था स्वदेशी हो या विदेशी?
नेहरू : होना तो चाहिये स्वदेशी लेकिन चलो मिक्स कर देते हैं। मिश्रित अर्थव्यवस्था। 

भाषा : हिंदी हो या अंग्रेज़ी?
नेहरू : होना तो हिंदी चाहिये। चलो अंग्रेज़ी भी (ही) रखते हैं। 

आरक्षण : होना चाहिये? 
नेहरू : होना तो नही चाहिए लेकिन चलो दस वर्ष के लिये रखते हैं, फिर हटा देंगे। 

कश्मीर : अभिन्न अंग है न?
नेहरू : है तो सही लेकिन विशेष अभिन्न अंग बनाइये। ‘विशेष अभिन्नता’ घिसते-घिसते घिस जायेगी। 

विदेश नीति : रूस या अमेरिका?
नेहरू : होना तो फ़लाना-ढिमकाना चाहिये। पर ये भी और वो भी रखते हैं। बोले तो गुट निरपेक्ष। 

विभाजन के बाद : मत के आधार पर देश के दो (तीन) टुकड़े हुए हैं।  विधर्मी अपने देश चले गए। अब भारत का धर्म?
नेहरू : होना तो जो सो चाहिये। पर लिखो मत संविधान में (बेटी लिख दे इसकी गुंजाइश रहे) पर हम सेखुलर रहेंगे।

वसीयत : क्या करना चाहिये?
नेहरू : राख गंगा में प्रवाहित हो लेकिन धार्मिक आधार पर नही। क्योंकि फ़लाना-ढिमकाना। 

स्मरणांजलि। 

(काश .... इकोनोमी, भाषा, आरक्षण आदि मामले में नेहरू ने अपना ही सबक़ याद रखा होता. वे अच्छे शासक भी हो सकते थे अगर धर्म आदि के बारे में भी निर्णायक होते तो.)

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