मांगकर लेते रहे वोट पंद्रह साल से सुशासन के नाम पर और नीतीश नहीं वे कुर्सी कुमार बन बैठे।

मांगकर लेते रहे वोट पंद्रह साल से सुशासन के नाम पर और नीतीश नहीं वे कुर्सी कुमार बन बैठे।

नन्हंकिरबा मोदी ने बर्बाद किया भूमिहारों का सम्मान फिर हमने खून का घुंट पीकर भूमिहार ब्राह्मण समाज ने भाजपा का दामन नहीं छोड़ा।

उधर जय श्री राम 🏹 के नाम पर हमने किया एकमुश्त वोट सोचा था कि अच्छे दिन आने वाले हैं।

डबल इंजन की सरकार रही किंतु दिवंगत मुखिया जी के हत्यारे को खुली छूट देने के वास्ते?

आपने खुद से पूछा है अकेले में कि जहानाबाद और भोजपुर के कुरूक्षेत्र में लड़नेवाला रणवीरों का क्या हुआ?

साहब जमानत की आस में कुछ जेल में ही मर गए।
कुछ निकले भी तो क्या अपने बच्चे की जिम्मेदारी से ही मुकर गए।
अरे कोई क्यों लड़ेगा समाज के लिए जब समाज के प्रबुद्ध लोग ही उनसे दगाबाजी कर गए?
दिला दिया हमने मुखिया जी की हत्या को इंसाफ?
कृष्णा नंद के हत्यारों के साथ हमारे लोग ही जुड़ गए?

उत्तर प्रदेश में मुलायम मायावती तो बिहार में लालू नीतीश के हाथों हम अपना जमीर सरेंडर कर गए।

कैसी सरकार? कैसा पुलिस प्रशासन? कैसी विडंबना?
कैसी व्यवस्था? कैसी जांच पड़ताल है जो केंद्रीय अन्वेषण ब्यूरो ने कातिलों के गिरेबान पर अबतक हाथ नहीं डाला?

और न जाने क्यों संसद जाकर भूल आए हैं भूमिहार नेता और जन प्रतिनिधि ब्रह्मर्षि समाज के समक्ष किए गए वो कस्मे वादे?
तभी तो दिन दहाड़े हत्या होती है अयाचकों की?

जो खाए थे कसम हमारे जनप्रतिनिधियों ने वोट लेते समय विकास के वास्ते?
हम मांग रहे  हैं इन्साफ उनसे मुखिया जी की कुर्बानी का?
अगर हम परशुराम के वंशज हैं तो आपस में अहम् की लड़ाई कर्मों?

क्या हम इसलिए टूटते हैं अपनों से खुद का नाम बड़ा करने के वास्ते?
अपने परिवार का घर भर कर अपनी जय करते हैं समाज को सदा सर्वदा के लिए भूल जाने के वास्ते?

कभी ओला वृष्टि कभी बाढ़ तो कभी सूखे से मरते भू समाज के किसान और सीमा पर लड़नेवाले और मरते उनके पुत्र भूमिहार जवानों के वास्ते?

आज नहीं आसान रहा है हाल अन्ना जैसे सच्चे देश भक्त भारत माँ के असली बेटों के रास्ते?
जो थामते हैं आज  दामन सच का-झूठी आजादी से लड़ने के वास्ते?

अदलिया है दिल बिछाए क़ातिलों के वास्ते कुछ भूख और सूखे से तो कुछ कर्ज और बेकारी से मर जाएँगे?
जो बचे हैं देशभक्त आज वो सरहद पर आतंकियों की गोली से मरकर शहीद कहलाएंगे?
फिर नेताजी उनके शव पर माल्यार्पण करने आएँगे?
वो खादी के कपड़ों में गांधी टोपी लगाकर सेल्फी वाला फोटो खिचाएंगे?

फिर देश की सियासी पार्टी उसे धर्म जाती से जोड़कर अपना बनाएगी?
और देश के तमाम पापी मंत्रीजी उनके लहूलुहान मगर पवित्र शव पर भारत माता की जय लिखकर उसका फेसबुक पर कवर पेज बनाएँगे और उसे भी वोट मांगने का जरिया बनाएंगे?
फिर आएगा चुनाव जब तब हम मुर्ख और मंदबुद्धि की तरह हर बात को भूल जाएँगे?
धर्म के नाम पर बँट जाएंगे?
वोट देने जरूर जाएँगे पर अपनी जाति के नेताजी को ही जिताएंगे?
फिर क्या ख़ाक प्रजातंत्र को बदल पाएंगे?
बस पछताते और हाथ मलते रह जाएंगे?
यह सोच कर कि अच्छे दिन कभी न आएंगे?

बदलाव चाहिए तो आगे आएँ अंध भक्ति और चमचई को छोड़कर अपने हक के लिए आवाज उठाएँ नहीं तो गिड़गिड़ाते हुए दूसरों का कहार बन जाएँ।

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