मुस्लिम भाइयों का दर्द

अपने मुस्लिम भाइयों का दर्द अब देखा नहीं जाता। कल शाम को सारे छतों पर चढ़े दूरबीन से आसमान में झांक रहे थे लेकिन चाँद नहीं दिखा

एलान कर रखा था कि अल्लाह ताला ने इस बार ईद के लिए 24 तारीख़ मुक़र्रर कर रखी है सारी तैयारी हो चुकी थी। लेकिन ऐन मौक़े पर चाँद धोखा दे गया ये हर साल की दिक़्क़त है हर साल ईद एक-दो दिन आगे-पीछे हो जाती है चाँद की सेटिंग शायद काफिरों के साथ है तभी तो हिंदू पंचांग वालों ने पहले से ही तारीख़ छाप रखी थी

उनको पता था कि ईद 24 को नहीं, 25 को होगी हज़ार साल पहले भी ईद का चाँद कितने बजकर कितने मिनट पर दिखा था किसी भी मंदिर के पुजारी या ज्योतिषी से पूछ लीजिए दो मिनट में जोड़-घटाकर बता देगा जब आपके ही मुल्क के कुछ लोग इतना कुछ जानते हैं तो आप हर साल ये कष्ट क्यों उठा रहे हैं? 

तलवार से डरकर अपने पूर्वजों का धर्म छोड़ा था, पंचांग छोड़ने को किसने बोला था अब छोड़ ही दिया है तो क्यों न ईद का मुहूर्त हर साल किसी पंडित से निकलवा लिया जाए इससे गंगा-जमुनी तहज़ीब भी पैदा होगी और साइंस के ज़माने में जहालत की इस सालाना नुमाइश से भी बच जाएँगे गलती आपकी नहीं है 

गलती उन अरबी कबीलों की है जिन्होंने ये मज़हब बनाया था तलवार के दम पर फैला तो लिया, लेकिन अक्ल कहां से लाते? किताब में तो लिख दिया था कि धरती चपटी है जब आपकी धरती चपटी है तो कैसे पता चलेगा कि चाँद कब उगेगा और सूरज कब निकलेगा? लेकिन आपको किसने रोका है यह देश आपके पूर्वजों का है तो पंचांग भी आपके पूर्वजों का ही है। 

ख़ुद पर गर्व कीजिए कि आप उस सनातन संस्कृति का हिस्सा हैं, जो 10 हज़ार साल से चाँद-सूरज ही नहीं, तारों तक के उगने और अस्त होने का हिसाब रखती रही है।

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