मोरारी (बापू ) एक विकृति का नाम है जो धर्म जगत में अनिर्णय की स्थिति में पनपती है।"*

*"मोरारी (बापू ) एक विकृति का नाम है जो धर्म जगत में अनिर्णय की स्थिति में पनपती है।"*

कुछ वर्षों पूर्व इसी मुरारी ने एक युगल का विवाह श्मसान में चिता के फेरे पड़वा कर संपन्न कराया था और दंभयुक्त दुराग्रही वचन कहते हुए स्वयं को सर्वोच्च सत्ता बताते हुए इस कुकृत्य को उचित भी ठहरा दिया था। 

पुरी शंकराचार्य परमपूज्य स्वामी निश्चलानन्द जी महाराज ने इस धूर्त को तब बहुत लताड़ा था किंतु ये महाबेशर्म और ढीठ व्यक्ति उनके प्रश्नों से बचकर निकल लिया। 

काशी में एक बार एक लड़की ने प्रश्न किया था कि, "बेटियों को पिता के अंतिम संस्कार का अधिकार क्यों नहीं है???"

तब बहुत ही अहंकार से ये बोला था कि, "शास्त्र कौन होता है तुम्हें रोकने वाला??? मैं किसी शास्त्र को नहीं मानता... मै तुम्हें अधिकार देता हूँ कि अपने परिजनों की अंत्येष्टि करो।"

वहीं उपस्थित एक वेदज्ञ ब्राह्मण ने तत्काल प्रश्न किया, "क्या आपको पक्का पता है कि शास्त्र ने इस संबंध में निषेध किया है??? आपने शास्त्र पढ़े हैं???"
फिर उस ब्राह्मण ने स्मृति ग्रंथों में से उद्धरण प्रस्तुत करते हुए बताया कि किन परिस्थितियों में बेटियों, बहनों, पत्नी, माता इत्यादि को परिजनों को अग्नि देने का अधिकार है और बिना शास्त्र अध्ययन के किसी को क्या अधिकार है कि वो शास्त्रों को तुच्छ घोषित करे, वो भी व्यासपीठ से!!!! 

इस पर ये दुर्बुद्धि मुरारी बगलें झांकने लगा और इसकी जिहादी भांड मंडली ने संगीत आरंभ कर इसे बचा लिया। कुछ देर में आयोजकों के गिरोह ने उस ब्राह्मण को पंडाल से बाहर कर दिया। 

अयोध्या में ये धूर्त वैश्याओं को लेकर नौटंकी करने पहुँच गया था जबकि राममंदिर आंदोलन में इसका कोई योगदान नहीं रहा। कारसेवकों की हत्या पर भी इसके मुख से परम सेकुलर शब्दावली में शांति संदेश आए थे। 
ये नीच वेदों में संशोधन की बात भी करने लगा है आजकल। इससे पता चलता है कि हिन्दू समाज किस भयंकर नींद में पड़ा है। एक दो कौड़ी का भांड वेदों में संशोधन करेगा??? 

इसकी संगीत मंडली में अधिकतर जिहादी भांड भर्ती किये गए हैं जो कव्वाली इत्यादि को रामकथा में प्रविष्ट करा रहे हैं। 

इसके जिहादी तबलची ने इसकी पुत्री से निकाह किया है और आजकल वही इसके धन का प्रबंधन देख रहा है। 

देवप्रतिमाओं में भी इसने छेड़छाड़ करना आरंभ कर दी है। 
आपने इसकी कथाओं में पीछे ध्यानस्थ हनुमानजी का चित्र देखा होगा। 

हनुमान को गदा व पर्वतयुक्त दिखाने के पीछे कारण है कि वो सत्य की रक्षा हेतु शक्ति के प्रतीक के रूप में जनमानस में स्थापित हों। उस अवधारणा को तोड़ने के लिए इसने उन्हें ध्यानस्थ दिखाने की परंपरा डाली और धूर्तता से हंसते हुए बुद्ध के साथ हनुमान को मिक्स कर विचित्र दर्शन दे दिया। 

इसके गाँव में भी इसने राम लक्ष्मण को शस्त्रविहीन कर दिया है। 

ये हिंदुओं को नपुंसक बनाने के एजेंडे पर काम कर रहा है। 
अधिकांश हिन्दू जनता को ये पता ही नहीं है। विशेषतः घरों में बैठे धार्मिक चैनलों पर सत्संग कार्यक्रमों की अफीम चाट रहे बुजुर्गों को। 

मेरी माँ मुझे गालियाँ देती थी कभी कि मैं इन संत महात्माओं को लेकर सदैव अपमानजनक शब्दावली का प्रयोग क्यों करता हूँ। 

देश की करोड़ों बुजुर्ग महिलाओं की तरह ही उसे भी संत की परिभाषा पता नहीं है जो उसके प्रारब्ध की बात है, इसमें मेरा दोष नहीं है। 

किंतु धीरे धीरे उसकी आँखें खुल रही हैं और अब मेरे घर में कोई भी इस जिहादी भांड दलाल को संत नहीं मानता है। 

किंतु देख रहा हूँ कि करोड़ों लोगों की आँखों पर अभी भी पट्टी बंधी है। 

मैं आपको एक ही बात विचार करने के लिए कहूँगा.... "जिस मजहब ने श्रीराम का मंदिर ढहाया, जिस राममंदिर के लिए १० लाख से ज्यादा लोगों का रक्त अयोध्या व आसपास बहा, जिनमें हजारों साधुओं का रक्त भी है, ऐसे मजहब के गुणगान उसी राम की कथा में करना धर्म है कि अधर्म??? 

जो व्यक्ति ऐसा पाप करता है वो संत है कि जिहादियों का दलाल??? 

उसे पूजना चाहिए या बहिष्कार करना चाहिए??? 

इन प्रश्नों के उत्तर पर निर्भर करता है कि आपकी भावी पीढ़ियों का धर्म बचेगा कि नहीं। 

ब्यथित मन से,
ठाकुर की कलम से

Comments