प्रधानमंत्री द्वारा पिछले देश के नाम संबोधन का निहितार्थ मेरे विचारों में, मेरे कलम से!
मेरे प्यारे भाईयों बहनों,
मैंने 2 माह से अधिक आप लोगों की सेवा में अपना तन मन धन सब अर्पण कर दिया, ताकि मैं इस महा व्याधि से आप लोगों की रक्षा कर सकूं।
मेरे समक्ष बडा प्रश्न था, कि सर्वप्रथम किसके प्राण बचाऊं?
देश के या फिर देशवासियों के !
और मैंने देशवासियों को चुना। और हर सम्भव प्रयास किया कि अपने कर्तव्यों पर खरा उतरूं। और किया भी ।
मैंने आप सभी को सभी नियम व आत्मरक्षा के उपाय बता दिये हैं।
उनका प्रयोग भी बताया है।
भाईयो बहनों,
अब मुझे अपने देश, अपनी मातृभूमि की रक्षा करनी है। तो क्या आपका दायित्व नही बनता कि कम से कम अपनी सुरक्षा स्वयं करें।
आपको मात्र इतना करना है कि, आप उन्ही नियमों का पालन करते रहिये जो लाकडाऊन के पिछले तीन चरणों में किया है।
""निश्चित ही हम इस कोरोना नामक व्याधि का समूल नाश कर देंगे।""
अब मुझे जाना होगा।
मुझे मेरी मातृभूमि पुकार रही है,
मेरा देश मुझे पुकार रहा है।
मुझे जाना होगा। अर्थ व्यव्स्था चरमरा रही है। देश पिछड़ रहा है।
अब मुझे उसकी रक्षा करने जाना होगा।
भाईयों बहनों
आपसे मेरा निवेदन है कि
""आप अपना परिवार सम्भालिऐ और मै मातृभूमि संभालता हूं।""
क्योंकि,,,,,
""""""""""है कसम मुझे इस मिट्टी की मै देश नही झुकने दूंगा।""""""""
मेरी समझ में तो माननीय प्रधान मंत्री जी के पिछले उद्बोधन से यही प्रतीत होता है। बाकि आपकी समझ में क्या आया आप देख लीजिए।
•••••••••○●● ब्रह्मं तेजो बलं बलं●●○••••••••
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